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आस्था ही नहीं इतिहास भी सहेजे है नंदादेवी मेला

30/08/25
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
पूरे प्रदेश भर के लोगों में मां नंदा के प्रति अटूट आस्था है। हर बरस जगह-जगह लगने वाले नंदोवी मेले में उमड़ने वाला सैलाब अटूट आस्था को प्रदर्शित करता है। मगर सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा का नंदादेवी मेले का अपना खासा महत्व है। यहां नंदादेवी मंदिर स्थापना के पीछे एतिहासिक तथ्य जुड़े हैं और यहां मां नंदा को प्रतिष्ठित करने का श्रेय चंद शासकों को है।कुमाऊं में मां नंदा की पूजा का क्रम चंद शासकों के जमाने से माना जाता है। किवदंती व इतिहास के मुताबिक सन् 1670 में कुमाऊं के चंद शासक राजा बाज बहादुर चंद ने बधाणकोट किले से मां नंदा देवी की स्वर्ण प्रतिमा लाए और उसे यहां मल्ला महल में स्थापित किया। तब से उन्होंने मां नंदा का कुलदेवी के रूप में पूजन शुरूकिया।इसके बाद में राजा जगत चंद को जब बधानकोट विजय के दौरान नंदादेवी की मूर्ति नहीं मिली, तो उन्होंने खजाने से अशर्फियों को गलाकर मां नंदा की प्रतिमा तैयार कराई और प्रतिमाओं को भी मल्ला महल स्थित नंदादेवी मंदिर में स्थापित कर दिया। सन् 1690 में तत्कालीन राजा उद्योत चंद ने पार्वतीश्वर और उद्योत चंद्रेश्वर नामक दो शिव मंदिर मौजूदा नंदादेवी मंदिर में बनाए। आज भी ये मंदिर उद्योत चंद्रेश्वर व पार्वतीश्वर के नाम से प्रचलित हैं। मल्ला महल (वर्तमान कलक्ट्रेट परिसर) में स्थापित नंदादेवी की मूर्तियों को भी सन् 1815 में ब्रिटिश हुकुमत के दौरान तत्कालीन कमिश्नर ट्रेल ने उद्योत चंद्रेश्वर मंदिर में रखवा दिया।प्रचलित मान्यताओं के अनुसार एक दिन कमिश्नर ट्रेल नंदादेवी चोटी की ओर जा रहे थे, तो राह में अचानक उनकी आंखों की रोशनी चली गई। लोगों की सलाह पर उन्होंने अल्मोड़ा में नंदादेवी का मंदिर बनवाकर वहां नंदादेवी की मूर्ति स्थापित करवाई, तो रहस्यमय ढंग से उनकी आंखों की रोशनी लौटी। इसके अलावा कहा जाता है कि राजा बाज बहादुर प्रतापी थे। जब उनके पूर्वजों को गढ़वाल पर आक्रमणों के दौरान सफलता नहीं मिली, तो राजा बाज बहादुर ने प्रण किया कि अगर उन्हें युद्ध में विजय मिली, तो नंदादेवी की अपनी इष्ट देवी के रूप में पूजा करेंगे। नंदादेवी मंदिर अल्मोड़ा की मंदिर की निर्माण शैली भी काफी पुरानी है। यहां उद्योत चंद्रेश्वर मंदिर की स्थापना 17वीं शताब्दी के अंत में मानी जाती है। उद्योत चंद्रेश्वर मंदिर के ऊपरी हिस्से में एक लकड़ी का छज्जा है। मंदिर में बनी कलाकृति खजुराहो मंदिरों की तर्ज पर है। ये मंदिर संरक्षित श्रेणी में शामिल हैं। उत्तराखंड की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर का प्रतीक मां नन्दा देवी मेला एक बार फिर अल्मोड़ा में पूरे धूमधाम के साथ शुरू हो गया है। जैसे ही ढोल-दमाऊं की गूंज और लोकगीतों की स्वर लहरियाँ शहर की गलियों में गूंजने लगीं, वैसे ही पूरा वातावरण श्रद्धा और उल्लास से भर उठा। नन्दा मेला केवल धार्मिक आस्था का पर्व ही नहीं, बल्कि कुमाऊं की संस्कृति, लोककला और लोकसंगीत का अनूठा संगम भी है। मेले में पारंपरिक हस्तशिल्प, लोकनृत्य प्रस्तुतियाँ और स्थानीय व्यंजनों की भरमार रहती है, जो इसे और भी खास बना देती हैं। करीब 1000 साल पुरानी परंपरा से जुड़े इस महोत्सव का आयोजन हर वर्ष भाद्रपद मास में किया जाता है। यह मेले न केवल धार्मिक महत्व लिए होते हैं बल्कि यहां की लोक कलाओं, लोकनृत्यों और पारंपरिक हस्तशिल्प को भी बढ़ावा मिलता है। उत्तराखंड में नन्दा देवी को “राज्य की आराध्य देवी” के रूप में पूजा जाता है, और अल्मोड़ा का यह महोत्सव मां के प्रति श्रद्धा और भक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक है। मेला परिसर में कलाकारों द्वारा नृत्य, लोकगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है। व्यापारियों के लिए भी यह मेला बड़ी आर्थिक संभावनाएं लेकर आता है क्योंकि दूर-दराज़ से आए लोग स्थानीय उत्पादों और स्मृति चिन्हों की खरीदारी करते हैं। अल्मोड़ा का नंदा देवी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर है जो पीढ़ियों से समाज को जोड़ती आ रही है। यह मेला भक्ति, आस्था, परंपरा और आधुनिकता का ऐसा अद्भुत संगम है, जो अल्मोड़ा की पहचान बन चुका है।28 अगस्त से 3 सितंबर तक जब नगर के हर कोने में घंटियों की ध्वनि, लोकगीतों की गूंज और श्रद्धालुओं की भीड़ होगी, तब अल्मोड़ा सचमुच सांस्कृतिक राजधानी की तरह जगमगाएगा. ओ नंदा- सुनंदा तू दैण है जाए,,,,,,,,माता गौरी अंबा तू दैण है जाए….. यानि कुमाऊं के लोग इस गीत से माता नंदा – सुंनदा को याद करते हैं. उत्तराखंड की कुल देवी यानि माता नंदा- सुंनदा, नंदा देवी महोत्सव या जिसे हम नंदाष्टमी के नाम से भी जानते हैं. उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र अल्मोड़ा और नैनीताल में सितम्बर के महीने में नंदाष्टमी का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है, मां नंदा और सुनंदा की उपासना के लिए केले के पेड़ यानि कदली वृक्ष से खास तरह की मूर्तियां बनाई जाती हैं. भाद्र शुक्ल पक्ष की अष्टमी को परंपरागत व धार्मिक माहौल में मनाया जाने वाला नंदाष्टमी पर्व पूरे उत्तराखंड को एक सूत्र में पिरोता है। नंदा देवी मेला सितंबर के महीने में मनाया जाने वाला एक सांस्कृतिक उत्सव है. यह त्यौहार अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर, भवाली और जोहार के दूर-दराज के इलाकों में मनाया जाता है।  मान्यता है कि मां नंदा आज भी भक्तों को स्वप्नों में आकर दर्शन देती हैं साथ ही उनकी मनोकामना भी पूरी करती हैं. कुमाऊं के पहले कमिश्नर ट्रेल से लेकर वर्तमान कमिश्नर आईएएस भी अपने परिवार पर माता नंदा सुनंदा का आशीर्वाद मानते हैं. मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि माँ नंदा देवी के ऐतिहासिक मंदिर का पुनर्निर्माण एवं सौंदर्यीकरण कार्य पारंपरिक पर्वतीय शैली के अनुरूप वृहद रूप से किया जाएगा। सरकार विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से डीनापानी में नंदादेवी हस्तशिल्प ग्राम की स्थापना भी करेगी। इस क्राफ्रट विलेज द्वारा मुख्यमंत्री सशक्त बहना उत्सव योजना के अंतर्गत स्थानीय महिला उद्यमियों द्वारा बनाए गए उत्पादों सहित विभिन्न ताम्र वस्तुओं, ऐपण कला, काष्ठशिल्प और अन्य पारंपरिक हस्तशिल्प को भी बढ़ावा मिलेगा साथ ही इन उत्पादों को देश-विदेश के बाजार से भी जोड़ा जा सकेगा।। देवभूमि उत्तराखंड की पावन वादियों में इन दिनों श्रद्धा और उत्साह का अनूठा संगम दिखाई दे रहा है. नैनीताल में शुरू हुआ नंदा देवी महोत्सव न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह कुमाऊं की सांस्कृतिक धरोहर को भी जीवंत करता है. इस पर्व के दौरान झांकियों, डोलों और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ एक ऐसी परंपरा सामने आती है जो सैकड़ों वर्षों से लोगों की आस्था से जुड़ी हुई है. ऐसी ही एक परंपरा है लाल और सफेद झंडों की प्रथा, जिन्हें कुमाऊं की भाषा में ‘निशान कहा जाता है.पुराने समय में जब उत्तराखंड के राजा युद्ध पर निकलते थे, तो उनके दल के साथ ये झंडे विजय और पहचान का प्रतीक बनकर चलते थे. लाल और सफेद रंग के ये निशान न केवल सेना की हिम्मत बढ़ाते थे, बल्कि दुश्मनों को भी चेतावनी देते थे कि यह कोई साधारण दल नहीं बल्कि एक सशक्त राज्य का प्रतिनिधि है. समय बदला तो इन झंडों ने युद्ध क्षेत्र से निकलकर धार्मिक उत्सवों और पारंपरिक विवाहों में अपनी जगह बना ली. आज भी कुमाऊं के बड़े पर्वों में इन्हें आस्था और सम्मान के साथ उठाया जाता है. *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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