डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
सरकार भले ही पहाड़ों में बेहतर शिक्षा देना का दावा और वादा कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है. एक और जहां स्कूलों की बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें खड़ी कर दी गई हैं. वहीं कई ऐसे विद्यालय भी हैं, जो आज भी शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं.अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को लेकर आये दिन लोग पहाड़ों से पलायन कर रहे हैं. कई बार लोगों को अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने को भी मजबूर होना पड़ता है. जिसका मुख्य कारण लोगों की मूल-भूत आवश्यकतायें हैं. आज हर व्यक्ति अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहता है, लेकिन सरकारी दावे और वादे उनके मंसूबों पर पानी फेर रहे हैं. ऐसा ही एक मामला सूबे की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण से आया है. यहां नौनिहाल शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं.उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों की शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए नवोदय विद्यालयों की स्थापना की गई. लेकिन वर्तमान में शिक्षकों की कमी के चलते पढ़ने वाले विद्यार्थियों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. गैरसैंण में वर्ष 2009 में स्थापित राजीव गांधी नवोदय विद्यालय के रिक्त पदों को लेकर अभिभावकों ने उप जिलाधिकारी गैरसैंण से मिलकर अपनी समस्यायें रखी.इस दौरान अभिवावकों ने चिंता जताते हुए कहा कि, 5 माह बाद बच्चों की बोर्ड परीक्षायें होने वाली हैं, लेकिन विषयाध्यापकों के न होने से बच्चों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. अभिभावकों ने एक माह के भीतर शिक्षकों की तैनाती न होने पर आंदोलन किए जाने की बात कही. वर्तमान में विद्यालय में इंटर स्तर पर भौतिक विज्ञान तो हाईस्कूल स्तर पर गणित, विज्ञान व सामाजिक विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण शिक्षकों के पद रिक्त चल रहे हैं. वहीं बोर्डिंग व्यवस्था में चलने वाले विद्यालय में महिला मेंटनर का पद भी लंबे समय से रिक्त चल रहा है, जिससे यहां पढ़ने वाली छात्राओं को अपनी परेशानियां बताने के लिए कोई उचित माध्यम तक उपलब्ध नहीं है. राज्य सरकार ने पलायन को रोकने के लिए भले ही लाख कोशिशें की हों, पर उसकी सारी कोशिशें जमीनी स्तर पर खोखली ही नजर आती हैं। सरकारों द्वारा चुनावी घोषणा पत्रों और विज्ञापनों के माध्यम से भले ही कई बार पलायन को रोकने के लिए उपाय किए गए हों लेकिन पलायन की रफ्तार कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। कोरोनाकाल में ऐसा लग रहा था कि अब लोगों को अपने ही राज्य में सुविधाएं मिल सकेंगी और सरकार ने भी इस ओर कदम उठाना शुरू कर दिया था। अप्रवासियों को वापस लाने के लिए अनेक योजनाओं का भी श्रीगणेश किया गया। लेकिन ये सारी कोशिशे भी धरी की धरी ही रह गई। राज्य सरकार की ओर से पर्यटन, स्वरोजगार, बागवानी समेत कई क्षेत्रों में नए अवसर तलाशने की कोशिश की गई लेकिन अभी तक ये सारी कोशिशें जमीनी स्तर पर कहीं दिखाई नहीं देती हैं। लोगों का बदस्तूर अपना गांव-घर छोड़कर बाहरी राज्यों में जाना जारी है, इसे तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक गांवों में रोजगार के अवसर पैदा नहीं किए जाएंगे साथ ही ग्रामीण इलाकों में भी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं को पहुंचाना होगा। शिक्षा और स्वास्थ्य के स्तर को बेहतर करना होगा। उत्तराखण्ड को अलग राज्य बनाने के लिए आम जनता बड़ी मशक्कत और जद्दोजहद में लगी थी। वह उत्तराखण्ड राज्य बनाकर अपने सपनों को हकीकत में बदलना चाहती थी। उसका सपना था उत्तराखण्ड में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़कें, परिवहन आदि की समुचित व्यवस्था हो। लोग उत्तराखण्ड को एक खुशहाल राज्य बनाना चाहते थे। लेकिन आम जनता के इस संघर्ष में घुसपैठिये भी थे जो समाज की संवेदनशीलता का फायदा उठाना चाहते थे और अपना निजी स्वार्थ सिद्ध करना चाहते थे। इसमें कुछ बुद्धिजीवी और राजनैतिक दल शामिल थे। उत्तराखण्ड राज्य अलग बन जाने के बाद सत्ता पर यह बुद्धिजीवी और राजनीतिक पार्टी काबिज हो गये। जनता ने एक-एक कर पार्टियों को सत्ता में पहुंचाया लेकिन आम जनता के सपने पूरे न हो सके और जनता अपनी खुशहाल जिन्दगी के लिए तरस गयी। पहाड़ों से होने वाला पलायन तेज होता गया। यह आज तक रुकने का नाम नहीं ले रहा है। आये दिन विद्यालयों का बंद होना चिंता का विषय बना हुआ है। इन पहाड़ों में या तो शिक्षा या अनपढ़ता – दो रास्ते बने हुए हैं। जनता किस रास्ते का चुनाव करे, उसकी समझ से परे की बात है। उत्तराखंड की सीमाएँ तिब्बत एवं नेपाल से लगी होने के कारण सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इस क्षेत्र को आवागमन एवं आर्थिकी की दृष्टि से सुदृढ़ करना होगा जिससे ऐसे इलाके पलायन के कारण खाली न हों। आजादी के सात दशक से ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी आज उत्तराखंड के कई गांवों में आज तक सड़क नही पहुच पाई है । जनता जनप्रतिनिधियों से कहते कहते थक गई लेकिन सड़क आज तक नही पहुच पाई जिस कारण जनता पहाड़ो से पलायन को मजबूर है। अलग राज्य के गठन का उद्देश्य यह था कि पहाड़ के लोगों को स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं बेहतर रूप से मिल सकें राज्य की गुणवत्ता शिक्षा के लिए केवल नई नीति नहीं बल्कि नीयत बदलने की आवश्यकता है। सरकारी विद्यालयों में घटती छात्र संख्या और सीखने के प्रतिफल जैसे मानकों में उत्तराखंड की कमजोर स्थिति के लिए किसी एक पक्ष को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।इसके लिए शिक्षक, अधिकारी, अभिभावक और जनप्रतिनिधि सभी समान रूप से जिम्मेदार हैं। यदि राज्य को पंजाब, हिमाचल और केरलम जैसे राज्यों की श्रेणी में लाना है तो शिक्षा को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आधार मानते हुए जमीनी स्तर पर गंभीर प्रयास करने होंगे।
लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











