
डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
श्याम प्रसाद मुखर्जी के पिता की एक शिक्षाविद के रूप में लोकप्रियता भी खूब थे। डॉक्टर मुखर्जी की पढ़ाई लिखाई बेहतर तरीके से हुई थी। 1917 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की और 1921 में बीए की उपाधि प्राप्त कर चुके थे। जब जम्मू कश्मीर से अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म किया जा रहा था, तब भाजपा की ओर से एक व्यक्ति का नाम खूब लिया जा रहा था। वह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। श्याम प्रसाद मुखर्जी के लिए यह बात खूब कही जाती है कि वह जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने यह सपना देखा था, उस वक्त जम्मू कश्मीर का अलग झंडा और संविधान हुआ करता था। वहां के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहते थे। संसद में भी अपने भाषण के दौरान डॉ मुख़र्जी जम्मू कश्मीर से धारा 370 खत्म करने की जोरदार वकालत करते रहते थे। 1952 जम्मू की एक विशाल रैली के दौरान श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस संकल्प लिया था कि मैं यहां के लोगों को भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा। अपने इस संकल्प को सिद्ध करने के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तत्कालीन नेहरू सरकार को भी चुनौती दे दी थी। अपने इस संकल्प पर वह जीवन भर अडिग और अटल रहे अपनी इस संकल्प को पूरा करने के लिए 1953 में बिना परमिट लिए ही वह जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल गए। जहां उन्हें गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया गया था। तभी 23 जून 1953 को उनकी रहस्यमई परिस्थितियों में मौत हो जाती है। भले ही श्याम प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू कश्मीर के लिए अपनी कुर्बानी दे दी हो, लेकिन उन्होंने ऐसी संकल्प ली थी जिसे आज पूरा कर मोदी सरकार खुद को गौरवान्वित महसूस कर रही है। भाजपा लगातार यह नारा भी देती रही है कि जहां बलिदान हुए मुखर्जी, वह कश्मीर हमारा है। भाजपा के लिए कश्मीर में एक झंडा और एक संविधान एक अहम मुद्दा था। यही कारण था कि जब 2019 में नरेंद्र मोदी की सरकार एक बार फिर से पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई तो सबसे पहले उसने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के इस संकल्प को पूरी करने की प्रक्रिया शुरू की और सफलता भी पाई। श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1921 को कोलकाता में हुआ था। वे शिक्षाविद होने के साथ-साथ चिंतक और भारतीय जनसंघ के संस्थापक भी थे। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे म प्रसाद मुखर्जी के पिता की एक शिक्षाविद के रूप में लोकप्रियता भी खूब थे। डॉक्टर मुखर्जी की पढ़ाई लिखाई बेहतर तरीके से हुई थी। 1917 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की और 1921 में बीए की उपाधि प्राप्त कर चुके थे। 1923 में लॉ की उपाधि अर्जित करने के बाद वे विदेश चले गए और 1926 में इंग्लैंड से बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। श्याम प्रसाद मुखर्जी शिक्षा के क्षेत्र में लगातार कार्य करते रहें। 33 वर्ष की अल्पायु में वे कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति बन गए। एक विचारक और प्रखर शिक्षाविद के रूप में उनकी उपलब्धि पूरे देश में लगातार बढ़ती जा रही थी। उनके कार्यों की चर्चा हो रही थी। भले ही डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर कार्य कर रहे थे। उनकी रूचि भी इस दिशा में बढ़ती जा रही थी। हालांकि, देश के प्रति भी उनके अंदर एक अलग भावना जागृत हो रही थी। जिस प्रकार से सरदार पटेल ने अखंड भारत की कल्पना की थी, उसी अखंड भारत की संकल्पना को साकार करने के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दिया। श्याम प्रसाद मुखर्जी का रुझान धीरे-धीरे राजनीति की ओर बढ़ता चला जा रहा था। हालांकि यह बात भी सच है कि मुस्लिम लीग की राजनीति की वजह से बंगाल का वातावरण दूषित हो रहा था जोकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी के लिए एक बड़ी पीड़ा थी। यही कारण था कि उन्होंने हिंदुओं को एकजुट करने की कोशिश की। श्यामा प्रसाद मुखर्जी धर्म के नाम पर देश के विभाजन के कट्टर विरोधी थे। कहते तो यह भी है कि जब भारत का विभाजन हो रहा था तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसका विरोध किया था। इतिहासकारों ने यह भी कहा है कि वे श्यामा प्रसाद मुखर्जी ही थे जिन्होंने विभाजन के दौरान आधा पंजाब और आधा बंगाल को भारत के लिए बचा लिया था। आजादी के बाद वे महात्मा गांधी और सरदार पटेल के अनुरोध पर भारत के पहले मंत्रिमंडल में शामिल हुए। उन्हें जवाहरलाल नेहरू किस सरकार में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री की जिम्मेदारी दी गई। 1950 में जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली के बीच एक समझौता हुआ। इस समझौते से श्यामा प्रसाद मुखर्जी इतने नाराज हो गए कि उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गुरु गोलवलकर जी से उन्होंने परामर्श लेकर जनसंघ की स्थापना की। 21 अक्टूबर 1951 को जनसंघ की स्थापना की गई। जनसंघ की स्थापना का उद्देश्य अखंड भारत की कल्पना था। देश के पहले आम चुनाव में जनसंघ के तीन सांसद चुने गए। उनमें से एक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे। वे लगातार जवाहरलाल नेहरू की नीतियों की आलोचना करते थे। जनसंघ का स्पष्ट मानना था कि भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने आएगा। डॉ. मुखर्जी के अनुसार अखंड भारत देश की भौगोलिक एकता का ही परिचायक नहीं है, अपितु जीवन के भारतीय दृष्टिकोण का द्योतक है, जो अनेकता में एकता का दर्शन करता है। जनसंघ के लिए अखंड भारत कोई राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि यह तो हमारे संपूर्ण जीवनदर्शन का मूलाधार है। पांच अगस्त 2019 को जब केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से विशेष संवैधानिक दर्जा हटाया और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया, तो यह स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे साहसिक और दूरगामी फैसलों में से एक था. सात साल बीत जाने और आठवें वर्ष में प्रवेश करने के इस मौके पर, इस निर्णय का आकलन न तो आत्मसंतुष्ट जयघोष के साथ होना चाहिए न ही रूढ़िवादी संदेह के साथ बल्कि एक ईमानदार, विद्वत्तापूर्ण तराजू पर तौलकर. दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इस कदम को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया. देशभर में इसका व्यापक स्वागत हुआ. लेकिन सात साल पर्याप्त समय है यह पूछने के लिए: क्या हासिल हुआ, क्या अभी अधूरा है और भविष्य की समृद्धि के आगे अब भी कौन-सी छायाएं मंडरा रही हैं.अनुच्छेद 370 हटाने के पक्षधरों का तर्क था कि यह प्रावधान अलगाववाद, भ्रष्टाचार और एक वंशवादी राजनीतिक अर्थव्यवस्था को बनाए रखने का कानूनी बहाना बन गया था. इसमें आम कश्मीरी गरीब रहा जबकि एक छोटा-सा तंत्र मालामाल हुआ. सात साल बाद इस तर्क का सबसे मजबूत प्रमाण पर्यटन क्षेत्र में मिलता है. साल 2023 से 2025 के बीच जम्मू-कश्मीर में कुल 7.85 करोड़ पर्यटक आए, जबकि 2016-18 की समान अवधि में यह संख्या मात्र 4.76 करोड़ थी. वर्ष 2024 में अकेले रिकॉर्ड 2.35 करोड़ पर्यटक पहुंचे, जिनमें 65,452 विदेशी शामिल थे. यह कोविड-काल की मंदी से एक नाटकीय वापसी और वादी में सामान्य जीवन बहाली का प्रतीक बना. बुनियादी ढांचे में निवेश, केंद्रीय कल्याण योजनाओं का विस्तार, और अनुच्छेद 35ए के भेदभावपूर्ण अधिवास प्रावधानों को हटाना, इन सबको वास्तविक एकीकरण और आर्थिक मुख्यधारा में शामिल करने के कदमों के रूप में पेश किया गया. एक दशक के अंतराल के बाद 2024 में हुए विधानसभा चुनाव ने भी इस नई व्यवस्था को लोकतांत्रिक वैधता प्रदान की.लेकिन सबसे बड़ी अधूरी प्रतिबद्धता स्वयं राज्य के दर्जे की बहाली है. जब सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 हटाने को वैध ठहराया, तो उसने स्पष्ट रूप से केंद्र को निर्देश दिया कि विधानसभा चुनाव के बाद ‘जल्द से जल्द’ राज्य का दर्जा बहाल किया जाए. मुख्यमंत्री के नेतृत्व में एक निर्वाचित सरकार अक्टूबर 2024 से सत्ता में है. इसके बाद भी जम्मू-कश्मीर उपराज्यपाल के अधीन एक केंद्र शासित प्रदेश ही बना हुआ है. अब्दुल्ला ने पार्टी लाइन से ऊपर उठकर कांग्रेस अध्यक्ष समेत 40 से अधिक राजनीतिक नेताओं को पत्र लिखकर संसद से राज्य का दर्जा बहाल करने का कानून बनाने की अपील की है. नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी तो और आगे बढ़कर अनुच्छेद 370 और 35ए की बहाली की मांग करते हैं, जबकि कांग्रेस ने ‘हमारी रियासत,हमारा हक’ के बैनर तले विरोध मार्च के साथ एक समानांतर अभियान शुरू किया है. अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट में समय-सीमा तय कर राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई हुई, हालांकि अदालत ने इसका तरीका और समय-सीमा केंद्र के विवेक पर छोड़ दिया. अदालत ने हाल ही में यह भी टिप्पणी की कि राज्य के दर्जे पर कोई भी फैसला पहलगाम हमले के सुरक्षा प्रभावों को नजरअंदाज नहीं कर सकता.यहीं पर विद्वत्तापूर्ण निष्पक्षता को समर्पण के बिना सहानुभूति दिखाने की जरूरत है. बिना पूर्ण विधानसभा वाले किसी अन्य केंद्र शासित प्रदेश को इतने लंबे समय तक राज्य का दर्जा न देने का कोई उदाहरण भारत के संघीय संवैधानिक ढांचे में नहीं मिलता है. जम्मू-कश्मीर में तो विभाजन के करीब सात साल बाद और एक निर्वाचित सरकार के सत्तासीन होने के डेढ़ साल बाद भी यह प्रश्न लंबित है. सुरक्षा तर्क समझ में आते हैं, लेकिन अनिश्चितकालीन देरी उस लोकतांत्रिक वैधता को ही कमजोर करता है, जो 2024 के चुनाव से हासिल होनी थी. यह जोखिम भी उठाता है कि अलगाववादी विमर्श को यह संदेश मिले कि मुख्यधारा की चुनावी राजनीति वास्तविक सत्ता नहीं दे सकती. नई दिल्ली की सतर्कता समझ में आती है, लेकिन राजनीतिक सावधानी को स्थायी संवैधानिक विसंगति नहीं बनने देना चाहिए.











