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नारद जयंती: नारद, जिन्हें पहला पत्रकार माना जाता है

14/05/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
नारद जयंती साल 2025 में 13 मई को है। नारद मुनि को हिंदू पौराणिक कथाओं में एक महत्वपूर्ण पात्र माना जाता है। नारद मुनि भगवान विष्णु के परम भक्त थे। संगीत और शास्त्रों का इन्हें पूरा ज्ञान था। नारद मुनि ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में से एक थे। नारद ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मर्षि की पदवी प्राप्त की थी। इन्हें देवर्षि भी कहा जाता है यह पद उन मुनियों को मिलता है जो तीनों कालों के ज्ञाता होते हैं देवर्षि नारद को सृष्टि का पहला पत्रकार कहा जाता है। इसकी वजह यह है कि नारद तीनों लोगों में विचरण कर सकते थे और एक लोक के संदेश को दूसरे लोक तक पहुंचा सकते थे। देवताओं और असुरों के बीच देवर्षि नारद समाचारों का आदान प्रदान करते थे। हिंदू धर्म के शास्त्रों में आपको कई ऐसे प्रसंग मिल जाएंगे जहां नारद मुनि सूचनाओं के संचारक और एक पत्रकार की भूमिका में हैं। इसीलिए नारद को सूचनाओं का देवता भी कहा जाता है। महाभारत के सभापर्व में नारद मुनि के व्यक्तित्व के बारे में काफी कुछ लिखा गया है। सभापर्व में वर्णित है कि नारद उपनिषदों के मर्मज्ञ और वेदों के जानकर थे। इतिहास पूराणों के साथ ही पूर्व कल्प (भूतकाल) की बातों को भी नारद जानते थे। व्याकरण, ज्योतिष और आयुर्वेद के भी वो प्रकांड विद्वान थे। इसके साथ ही योग और संगीत की विद्या को भी नारद भलीभांती जानते थे इसलिए नारद देवताओं से लेकर दानवों तक और मनुष्यों के साथ ही सभी प्राणियों के पूज्य थे। तीनों लोकों में नारद मुनि को सम्मानित किया जाता था। नारद मुनि आजीवन अविवाहित रहे। माना जाता है कि वो भगवान की भक्ति में और उनकी सेवा में समर्पित रहना चाहते थे इसलिए उन्होंने विवाह नहीं किया। पुराणों में वर्णित एक प्रसंग के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी ने नारद से विवाह करने की बात कही थी, लेकिन नारद मुनि ने इनकार कर दिया। पिता के कई बार कहने पर भी जब नारद नहीं माने तो ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र नारद को श्राप दे दिया कि तुम आजीवन अविवाहित ही रहोगे। नारद मुनि को एक महान वीणावादक माना जाता है। देवर्षि वीणा बजाने में माहिर थे और उनकी वीणा की ध्वनि से देवता, ऋषि-मुनि और समस्त प्राणी मंत्रमुग्ध हो उठते थे। माना जाता है कि स्वयं संगीत की देवी माता सरस्वती ने नारद को संगीत की शिक्षा दी थी। नारद मुनि को एक महान वीणावादक माना जाता है। देवर्षि वीणा बजाने में माहिर थे और उनकी वीणा की ध्वनि से देवता, ऋषि-मुनि और समस्त प्राणी मंत्रमुग्ध हो उठते थे। माना जाता है कि स्वयं संगीत की देवी माता सरस्वती ने नारद को संगीत की शिक्षा दी थी।  इस दिन पत्रकारिता से जुड़े लोग नारद जी की प्रतिमा को सामने पुष्प अर्पित करते हैं और उनकी निष्पक्षता से सीख लेकर लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को मजबूत करने का काम करते हैं. नारद मुनि एक दिव्य ऋषि और ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं। वहीं उनको ‘देवर्षि’ की उपाधि भी प्राप्त है। नारद मुनि तीनों लोगों में विचरण करते हैं और ऋषियों, मुनियों, देवताओं और असुरों के बीच संवाद का माध्यम बनते हैं। नारद मुनि के हाथों में वीणा रहती है और मुख पर हमेशा ‘नारायण-नारायण’ का उच्चारण रहता है नारद मुनि को संचार, संवाद और लोक-कल्याणकारी भक्ति का भी प्रतीक माना जाता है। नारद मुनि न सिर्फ दिव्य घटनाओं को जोड़ने वाले सूत्रधार हैं, बल्कि वह भक्ति के मार्ग पर चलने वाले सशक्त प्रचारक भी हैं। पत्रकारों, वक्ताओं, संगीत प्रेमियों और भक्ति मार्ग के साधकों के लिए नारद जयंती एक प्रेरणादायक पर्व है। नारद जयंती केवल एक ऋषि की जयंती नहीं है, बल्कि यह सत्य, संवाद, भक्ति और धर्म के महत्व को पहचानने का दिन है। यह दिन हमें सिखाता है कि संवाद केवल सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि यह परिवर्तन, जागरूकता और आत्मविकास का माध्यम हो सकता है। नारद मुनि के जीवन से हम ये सूत्र सीख सकते हैं:सत्य बोलने का साहस रखें, भले ही वह अप्रिय क्यों न हो। वे जहां भी जाते थे, वहीं कोई न कोई बड़ा परिवर्तन या कथा जन्म लेती थी- जैसे भक्त प्रह्लाद की कथा, महर्षि वाल्मीकि का जीवन परिवर्तन, और नारद भक्ति सूत्र की रचना।सूचना और संवाद समाज और धर्म को दिशा देने में सक्षम हैं। उन्होंने ही कृष्ण-उद्धव संवाद और नारद पुराण जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में योगदान दिया।नारद जी का जीवन बताता है कि भक्ति में निरंतरता और समर्पण जरूरी है। जीवन में विवेक और विनम्रता बनाए रखें, क्योंकि ज्ञान के साथ अहंकार नहीं होना चाहिए।दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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