डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
नेपाल में आई अचानक विनाशकारी बाढ़ ने उत्तर प्रदेश के हिमालयी नदियों से जुड़े इलाकों के लिए भी खतरे की चेतावनी दी है। चिंता केवल नेपाल से आने वाली गंडक नदी तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों से निकलने वाली भागीरथी, अलकनंदा और काली-शारदा जैसी नदी प्रणालियों में भूस्खलन, बर्फ या चट्टान खिसकने और मलबे से नदी का रास्ता रुकने की घटनाएं भी अचानक बड़ी बाढ़ का कारण बन सकती हैं।नेपाल में आई अचानक विनाशकारी बाढ़ ने उत्तर प्रदेश के हिमालयी नदियों से जुड़े इलाकों के लिए भी खतरे की चेतावनी दी है। चिंता केवल नेपाल से आने वाली गंडक नदी तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों से निकलने वाली भागीरथी, अलकनंदा और काली-शारदा जैसी नदी प्रणालियों में भूस्खलन, बर्फ या चट्टान खिसकने और मलबे से नदी का रास्ता रुकने की घटनाएं भी अचानक बड़ी बाढ़ का कारण बन सकती हैं।नेपाल की ताजा घटना में बर्फ, चट्टान और मलबा खिसकने से नदी के रास्ते में अस्थायी रुकावट बनने और फिर अचानक भारी जलप्रवाह के संकेत मिले हैं। ऐसी रुकावट प्राकृतिक बांध का रूप ले सकती है। इसके टूटते ही पानी के साथ बोल्डर व मलबा तेज रफ्तार से नीचे की घाटियों और मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है।
उत्तराखंड में भी भूस्खलन से नदी रुकने और बाद में प्राकृतिक अवरोध टूटने की घटनाएं हो चुकी हैं। हालिया धराली हादसे ने भी दिखाया कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ढलान, ग्लेशियर और मलबे में हलचल अचानक विनाशकारी बहाव का रूप ले सकती है।उन्होंने सक्रिय बाढ़ मैदानों, पुराने नदी मार्गों और प्राकृतिक जल निकासी क्षेत्रों के करीब अंधाधुंध निर्माण को बड़ा जोखिम बताया। उनके अनुसार केवल तटबंध पर्याप्त नहीं हैं।नेपाल से उत्तराखंड तक पूरे हिमालयी कैचमेंट में उपग्रह निगरानी, जलस्तर मापने वाले यंत्र, रिमोट सेंसर और रियल टाइम चेतावनी प्रणाली मजबूत करनी होगी, ताकि ऊपरी क्षेत्रों में नदी रुकने या प्राकृतिक अवरोध बनने की सूचना तत्काल निचले जिलों तक पहुंच सके।नेपाल और तिब्बत में हुई त्रासदी के बाद अब गंगा व पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने गंगोत्री ग्लेशियर के गोमुख और केदारताल में बन रही छोटी-छोटी झीलों पर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि समुद्रतल से करीब चार से पांच हजार मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बारिश अधिक होने से अब यह झीलें कभी भी जनपद के लिए बड़ी आपदा का रूप ले सकती है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सभी सुपरा ग्लेशियर झीलें हैं।यह अधिकांश अस्थाई होती है इसलिए इनसे बड़ा खतरा नहीं होता है। गंगोत्री ग्लेशियर पर गोमुख वाले क्षेत्र में गंगा के उद्गम वाले स्थान के आसपास ग्लेशियर मलबे पर छोटी-छोटी झीलें बनी हुई हैं। दूसरी ओर केदारताल क्षेत्र में इसी प्रकार की झीलें हैं। इस पर पर्यावरणविद का कहना है कि गंगोत्री घाटी सहित ग्लेशियर पूर्व से ही संवेदनशील स्थान रहा है।गंगोत्री ग्लेशियर के गोमुख क्षेत्र व केदारताल के आसपास बनी यह झीलें कभी भी बड़ी आपदा का रूप ले सकती है क्योंकि चार से पांच हजार मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पहले हल्की बारिश होते ही बर्फ गिरती थी। अब वहां बारिश अधिक हो रही है। इससे इन झीलों में पानी की मात्रा बढ़ रही है।अब गोमुख के ग्लेशियर मलबे पर बनी झीलें कभी भी बड़ी आपदा का रूप ले सकती है। इसलिए इनकी निगरानी के साथ ही अर्ली वार्निंग सिस्टम जल्द स्थापित होना चाहिए। गंगा विचार मंच के प्रांत संयोजक व गोमुख से लौटे ग्राम प्रहरी ने प्रदेश सरकार से इन झीलों का गहन अध्ययन करने की मांग की है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक का कहना है कि यह सुपरा ग्लेशियर झीलें हैं। यह अधिकांश अस्थाई होती है। इसलिए इनसे अधिक खतरा नहीं है। लांगटांग–लिरुंग पर्वत पर ग्लेशियर के ढहने से यह आपदा आई। लेकिन इस घटना की पूरी और सटीक जानकारी सामने आने में कई महीने लग सकते हैं। विशेषज्ञों की तरफ से पहले ही चेतावनी दी जा रही है कि यह कोई एक बार होने वाली घटना नहीं है।एक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लीड्स विश्वविद्यालय के ग्लेशियल बाढ़ विशेषज्ञ ने बताया है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से पहाड़ गर्म हो रहे रहे हैं। इससे पर्माफ्रॉस्ट (जमी हुई बर्फ) और ग्लेशियर तेजी से पिघल रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसकी वजह से इस तरह की घटनाओं की संभावना और संभवतः इससे भी बड़ी घटनाएं भविष्य में ज्यादा बढ़ सकती है। शोधकर्ताओं ने अनुमान जाताया है कि दुनिया भर में करीब 1.5 करोड़ लोग ऐसे इलाकों में रह रहे हैं, जहां उन पर इस तरह की आपदाओं का खतरा है। एशिया में हिमालय, काराकोरम, हिंदूकुश और आसपास की पर्वत श्रृंखलाएं सबसे ज्यादा जोखिम क्षेत्रों में शामिल हैं। हालांकि, अमेरिका और कनाडा में रहने वाले लोगों पर भी खतरा है।डॉ. कैरिविक ने चेतावनी दी है कि उत्तरी अमेरिका में भी नेपाल जैसी घटना हो सकती है। हालांकि, वैज्ञानिक अभी भी इस आपदा को समझने में लगे हुए हैं। वर्तमान प्रमाण में संकेत मिलता है कि नेपाल में विनाशकारी बाढ़ संभवतः ग्लेशियर के ढहने से आई थी। लांगटांग–लिरुंग पर्वत पर ग्लेशियर के ढहने से यह आपदा आई। लेकिन इस घटना की पूरी और सटीक जानकारी सामने आने में कई महीने लग सकते हैं। विशेषज्ञों की तरफ से पहले ही चेतावनी दी जा रही है कि यह कोई एक बार होने वाली घटना नहीं है।एक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, के ग्लेशियल बाढ़ विशेषज्ञ ने बताया है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से पहाड़ गर्म हो रहे रहे हैं। इससे पर्माफ्रॉस्ट (जमी हुई बर्फ) और ग्लेशियर तेजी से पिघल रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसकी वजह से इस तरह की घटनाओं की संभावना और संभवतः इससे भी बड़ी घटनाएं भविष्य में ज्यादा बढ़ सकती है। शोधकर्ताओं ने अनुमान जाताया है कि दुनिया भर में करीब 1.5 करोड़ लोग ऐसे इलाकों में रह रहे हैं, जहां उन पर इस तरह की आपदाओं का खतरा है। एशिया में हिमालय, काराकोरम, हिंदूकुश और आसपास की पर्वत श्रृंखलाएं सबसे ज्यादा जोखिम क्षेत्रों में शामिल हैं। हालांकि, अमेरिका और कनाडा में रहने वाले लोगों पर भी खतरा है।
ने चेतावनी दी है कि उत्तरी अमेरिका में भी नेपाल जैसी घटना हो सकती है। हालांकि, वैज्ञानिक अभी भी इस आपदा को समझने में लगे हुए हैं। वर्तमान प्रमाण में संकेत मिलता है कि नेपाल में विनाशकारी बाढ़ संभवतः ग्लेशियर के ढहने से आई थी।वैज्ञानिकों ने यह भी चेतावनी दी है कि पर्वतीय इलाके एक अन्य खतरे के प्रति तेजी से संवेदनशील होता जा रहे हैं, जिसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहा जाता है। यह तब होता है, जब ग्लेशियर से पिघला पानी एक बड़ी झील का निर्माण कर देता है और यह झील एक पतले तथा अस्थिर प्राकृतिक बांध के पीछे रुकी रहती है। अगर ग्लेशियर का कोई हिस्सा ढह जाए या पिघले हुए पानी का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाए, तो यह प्राकृतिक बांध टूट सकता है। इसके बाद पानी का एक बेहद शक्तिशाली प्रवाह पहाड़ से नीचे की तरफ तबाही मचा सकता है।
हालांकि, वैज्ञानिक फिलहाल यह नहीं मान रहे हैं कि नेपाल और तिब्बत में आई भयानक बाढ़ की वजह से आई थी, क्योंकि उपग्रह तस्वीरों में भूस्खलन से पहले इस क्षेत्र में किसी बड़ी झील के बनने के प्रमाण नहीं मिले हैं। फिर भी दुनिया भर में ग्लेशियर अब ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस तरह की बाढ़ के खतरे में डाल रहे हैं, जो नेपाल में देखी गई घटना जितनी ही या उससे भी अधिक घातक साबित हो सकतीहै। वैज्ञानिकों ने नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित अपने शोधपत्र में नवीनतम मॉडलिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया है और यह पता लगाया कि का खतरा किन इलाकों में सबसे ज्यादा है। उन्होंने शोध में पता लगाया कि इस खतरे में रहने वाले 1.5 करोड़ से ज्याजा लोगों में आधे से ज्यादा लोग सिर्फ चार देशों, भारत, पाकिस्तान, पेरू और चीन में रहते हैं।
हाई माउंटेन एशिया जिसमें हिमालय, काराकोरम, हिंदूकुश और आसपास की पर्वत श्रृंखलाएं शामिल हैं और यह सबसे ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों में है। इन इलाकों में लोग सबसे ज्यादा जोखिम में हैं और ग्लेशियल झीलों के सबसे पास रहते हैं। इन इलाको में 10 किलोमीटर से कम दूरी पर 10 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं। दुनिया में GLOF के खतरे में आने वाली जनता में से करीब 62 फीसदी लोग हाई माउंटेन एशिया में रहते हैं। इनमें करीब 30 लाख भारत में और 20 लाख पाकिस्तान में हैं।नेपाल में ही करीब 20 ग्लेशियर झीलें संवेदनशील हैं। इसके बावजूद पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए साझा और प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम नहीं है। नजरअंदाज किया गया तो आने वाले समय में विकास परियोजनाएं खुद आपदा के जोखिम को बढ़ाने वाली साबित हो सकती हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही हैलेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











