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कभी स्कूल नहीं गए लेकिन ऐसा लिख गए कि…

20/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
शेर सिंह बिष्ट जी का जन्म १३ अक्टूबर १९३३ को ग्राम ‘माल’ अल्मोड़ा में एक कृषक परिवार में हुआ था।बचपन में ही पिता बचे सिंह बिष्ट का निधन हो गया और १३ साल की उम्र में घर से ‘शेरदा ‘ आगरा चले गये।१३ अगस्त १९५० को शेरदा A.S.C कम्पनी में भर्ती हो गए।१९६१ मे शेरदा क्षय रोग से ग्रस्त हो गये और पूना के आर्मी हास्पिटल में ढाई साल तक अपना उपचार कराते रहे! शेरदा को इसी हास्पिटल में सन् १९६२ के भारत चीन युद्ध में घायल अनेक फौजी जवानों के साथ रहने का मौका मिला।उन घायल जवानों की कहानी उन्हीं की जुबानी सुनकर शेरदा का ह्रदय पसीज उठा जिसकी परिणति ‘ये कहानी है नेफा लद्दाख की’ कविता संग्रह के रूप में प्रकाशित हुई। जिसे शेरदा ने उन्हीं जवानों के बीच बांट दिया। यहीं से शेरदा की कविता यात्रा आरंभ हुई।उसके बाद शेरदा ने ‘ दीदी -बैंणी ‘,हंसणै बहार, हमार मैं- बाप, कविता छापी। उसके बाद शेरदा गीत एवं नाटक प्रभाग सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (भारत सरकार) के नैनीताल केन्द्र में एक कलाकार के रूप में कार्य करने लगे कुछ समय पश्चात उनकी ‘मेरी लट पटी’ नामक कविता संग्रह छपी।इसमें उनकी कविता-मुर्दाक बयान,एक स्वैंण देखनऊ,हसूं की डाड़ मारू,मौत और मनखी, द्वि दिनक डयार,जैसी कविताएं पढ़ी तो पता चला कि शेरदा तो कुछ और ही है। मुझे लगता है कि शेरदा ने जीवन को बहुत ही करीब से देखा और उसके हर पहलू पर कविताएं लिखी। जीवन की क्षण भंगुरता,नश्वरता पर भी उन्होंने कविताएं लिखी कविता में कठोर सत्य को उन्होंने उद्घाटित किया है मुर्दाक बयान कविता में –
जनूकैं मैंल एक बटया
उनूल मकै न्यार करौ
जनूकैं मैंल भितेर धरौ
उनूल मकै भ्यार धरौ
बेई तक आपण आज
निकाओ निकाओ है गे
पराण लै छुटण नि दी
उठाओ उठाओ है गे
शेरदा कहते है कि यह माया का फेर भी गजब है और आदमी उसमे उलझता ही चला जाता है और ये उलझन मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होती।शेरदा आगे लिखते है कि-
चै चै बेर अंगवाव नि हालो
खून मैं के फर्क छू
अनवार लै तूमरी निहोली ज्यूंनि मैं के फर्क छू।
शेरदा ने दिल से अपनी माटी से प्यार किया! यहां के लोगो से प्यार किया।पहाड़ के दुख दर्द से, दूनिया के सत्यों को अपने दिल कि आवाज से प्रकट किया। शेरदा कि सबसे बड़ी विशेषता उनका अभिव्यक्ति कौशल था।शेरदा ने हास्य व्यंग सहित गम्भीर विषयों पर भी कविताएं लिखी।शेरदा कि कविताओं में जहां एक ओर हिंदी के कवि संत कबीर की वाणी है तो वहीं महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के स्वर भी है।यही कारण है कि कुमाऊंनी कवियों में उनकी अपनी एक अलग पहचान है। अलग ठसक है या यूं कहूं की अपना एक अलग ही ठाठ है ।
में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। अनिल घिल्डियाल जी ने कहा कि देश के कई प्रान्तों में शेरदा ने महात्मा गांधी जी की यादगार भूमिका निभाई।
बृजमोहन जोशी ने शेरदा के कुछ गीतों – ओ परूवा बौज्यू, पन खेड़ो घाघरी च्याव, म्यर हौशी हुड़ुकी,डाना काना घुघुती, व कुछ कविताओं के अंशों को भी सुनाया…. भुर्र कनै उड़ि गयूं, घिनौड़ी चार , फुर्र कनै हरै गयूं, चांदिक रूपैं नै चार। जोशी ने कहा कि जीवन की क्षण भंगुरता,नश्वरता पर भी शेरदा ने कठोर सत्य को उजागर किया… जनूकैं मैंल एक बटया,उनूल मकै न्यार करौ……! और मनुष्य के घमंड को चुनौती देते हुए शेरदा लिखते हैं – कि , द्बाब लै रौ छ काव शेरूवा दुणी में,के है रै छ निहाल शेरुवा दुणी में….!
शेर सिंह बिष्ट ‘शेरदा- अनपढ़’ की १४ वीं पुण्यतिथि पर परम्परा ने किया याद !
शेर सिंह बिष्ट अनपढ़ (शेरदा) कुमाऊनी के लोक प्रिय कवि हैं।अपनी विशिष्ट शैली में हास्य व्यंग प्रधान से गंभीर किस्म की कविताओं के द्वारा वे श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन करने में सफल रहते थे। जोशी ने कहा कि शेरदा जमीन से जुड़े ठेठ कुमाऊनी कवि हैं।उनका अनपढ़ होना ही उनकी मौलिकता के लिए वरदान सिद्ध हुआ की-ओ परूवा बौज्यू… के गीतकार व गायक यही शेर सिंह बिष्ट जो गीत-…ओ परूवा बौज्यू तुम गाते हो-वो परूवा के बौज्यू
शेर सिंह बिष्ट जी उस समय गीत एवं नाटक प्रभाग नैनीताल केन्द्र में कार्यरत थे इस तरह शेरदा से धीरे धीरे परिचय बड़ता ही गया। उस समय मैं नैनीताल में अयार पाटा,सूखा ताल,मल्लीताल में होने वाली रामलीलाओं,शरदोत्सवों,पागल जीमखाना,अखिल भारतीय हिन्दी नाटक प्रतियोगिता में सांस्कृतिक संस्था हिमानी आर्ट्स और आयाम मंच नैनीताल,उत्तरांचल कला केन्द्र के कलाकार के रूप में सहभागिता करता था।उस समय मैंने शेरदा के इस लोक गीत को जो कि आकाशवाणी के लखनऊ केन्द्र से उत्तरायणी कार्यक्रम से सुना था…ओ परुवा बौज्यू और.. पन खेड़ो घाघरी च्याव… और म्यर हौशी हुड़ुकी बाजली घमाघम. शेर दा को विनम्र श्रद्धांजलि होगीलेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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