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उत्तराखंड नदियों का उद्गम स्थल और जल संकट

20/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों का उद्गम स्थल उत्तराखंड आज खुद पानी के गंभीर संकट से जूझ रहा है. नीति आयोग अपनी रिपोर्ट में पहले ही यह खुलासा कर चुका है कि राज्य के करीब 300 प्राकृतिक जलस्रोत और नदियां या तो पूरी तरह सूख चुकी हैं या सूखने की कगार पर हैं. जो नदियां और धारे कभी बारहमासी हुआ करते थे, वे अब सिर्फ मानसून तक सिमटकर रह गए हैं.उत्तराखंड जल संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 500 पेयजल योजनाएं ऐसी हैं जिनके स्रोत में पानी का स्तर 10 से 90 प्रतिशत तक गिर चुका है. यानी नल तो लगे हैं लेकिन पानी नहीं आता. पहाड़ के गांवों में महिलाएं आज भी किलोमीटरों दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं.गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों का उद्गम स्थल उत्तराखंड आज खुद पानी के गंभीर संकट से जूझ रहा है. नीति आयोग अपनी रिपोर्ट में पहले ही यह खुलासा कर चुका है कि राज्य के करीब 300 प्राकृतिक जलस्रोत और नदियां या तो पूरी तरह सूख चुकी हैं या सूखने की कगार पर हैं. जो नदियां और धारे कभी बारहमासी हुआ करते थे, वे अब सिर्फ मानसून तक सिमटकर रह गए हैं.उत्तराखंड जल संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 500 पेयजल योजनाएं ऐसी हैं जिनके स्रोत में पानी का स्तर 10 से 90 प्रतिशत तक गिर चुका है. यानी नल तो लगे हैं लेकिन पानी नहीं आता. पहाड़ के गांवों में महिलाएं आज भी किलोमीटरों दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं. इस संकट से निपटने के लिए सरकार ने अब ग्राम पंचायतों को सीधे जिम्मेदारी सौंपने का फैसला किया है. शासन ने राज्य की सभी 7,817 ग्राम पंचायतों और 11,217 वन पंचायतों से उनके क्षेत्र में मौजूद जलस्रोतों का पूरा ब्योरा मांगा है. इसमें यह जानकारी मांगी गई है कि कितने स्रोत अभी जीवित हैं और कितने सूख चुके हैं.पंचायती राज विभाग के विशेष सचिव ने बताया कि सभी जिला पंचायती राज अधिकारियों के जरिए यह जानकारी इकट्ठा की जा रही है. पूरा ब्योरा मिलने के बाद जलस्रोतों के संरक्षण की ठोस कार्ययोजना तैयार की जाएगी और उसे जमीन पर उतारा जाएगा. यह काम स्प्रिंग एंड रिवर रिज्युविनेशन अथॉरिटी के जरिए किया जाएगा, जो प्राकृतिक स्रोतों और नदियों के पुनर्जीवन के लिए काम कर रही है. जीर्णोद्धार का खर्च केंद्र और राज्य वित्त आयोग के अनुदान से वहन किया जाएगा. जहां जरूरत होगी वहां राज्य सरकार अतिरिक्त धनराशि भी उपलब्ध कराएगी.पहाड़ के गांवों में नौले और धारे सदियों से जीवन का आधार रहे हैं. लेकिन जलवायु परिवर्तन और जंगलों की कटाई के चलते ये पारंपरिक स्रोत एक-एक कर दम तोड़ रहे हैं. अब देखना यह होगा कि यह योजना कागजों से निकलकर जमीन तक कब पहुंचती है. पिथौरागढ़ में आज भी तमाम पेयजल योजना चलने के बाद भी शहर की आधी आबादी अभी भी प्राकृतिक जल स्रोतों पर ही निर्भर है. शहर के ऐसे कई इलाके हैं, जहां गर्मियों में लोग जल संकट से जूझ रहे हैं और पानी के लिए उन्हें दूर जाकर नौलों-धारों से ही पानी लाना पड़ रहा है. बात अगर जिले के ग्रामीण इलाकों की करें तो कई इलाकों में जल संकट काफी गहरा गया है और लोग गांव छोड़ने को भी मजबूर हो रहे हैं.बरसात होते ही नलों में दूषित जल आ रहा है तो वहीं गर्मियों में 3 तीन में एक बार ही पानी की सप्लाई लोगों को मिल पाती है, जो पेयजल आपूर्ति के लिए काफी नहीं है. पिथौरागढ़ में आये दिन लोग जिलाधिकारी कार्यालय में पानी की समस्या को लेकर पहुंच रहे हैं, लेकिन स्थिति अभी नहीं सुधर पाई है और आज भी पहाड़ों में लोग नौले धारों पर ही निर्भर है. कई इलाकों के तो प्राकृतिक स्रोत भी सुख चुके हैं. पानी की समस्या पर पिथौरागढ़ के सीनियर सिटीजन और समाजिक कार्यकर्ता ने इसका जिम्मेदार भृष्टाचार की भेंट चढ़ चुके अधिकारियों को बताया है, जिनका कहना है कि अरबों रुपये की पेयजल योजनाएं जिले में होने के बाद भी आबादी की प्यास नहीं बुझ रही है. जो हर घर जल योजना सरकार की है. पहाड़ों में आज नौले धारे ही लोगों को प्यास बुझा रहे हैं. ऐसे में इन प्राकृतिक जल स्रोंतों की महत्ता को समझ इन्हें संरक्षण की काफी जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ी को भी जल संकट से न जूझना पड़े. भारत के मोंगाबे में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, हाल के वर्षों में लगभग 12,000 प्राकृतिक जल स्रोत सूख गए हैं, जबकि उत्तराखंड की 90% आबादी इन महत्वपूर्ण जल स्रोतों पर निर्भर है। वनों की कटाई जल की कमी का मुख्य कारण है। घरों में जल संरक्षण इकाइयों की कमी स्थिति को और भी बदतर बना देती है। वनों की कटाई के कारण भूमिगत जल भंडारों का रखरखाव मुश्किल हो जाता है। सरकारी अधिकारी, विभिन्न गैर-सरकारी संगठन, सैकड़ों स्वयंसेवकों और व्यक्तियों के साथ मिलकर एक ऐसे भूजल पुनर्भरण प्रणाली पर काम कर रहे हैं जो भूमिगत पर्वतीय जल भंडारों को उचित स्तर पर बनाए रखे। वे पहाड़ियों पर चुनिंदा स्थानों पर खाइयाँ खोदकर ऐसा करते हैं ताकि मानसून के दौरान पानी जमा हो सके और आगे पुनर्भरण में मदद मिल सके। नैनीताल जिले के निवासी और पर्यावरणविद चंदन नायल ने एक ग्रामीण समुदाय की मदद से आसपास के क्षेत्रों में छह हजार से अधिक ऐसी खाइयां बनाई हैं, जिसके परिणामस्वरूप छोटी नदियों और झरनों में पानी का स्तर बढ़ा हुआ स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।शहरी क्षेत्रों के संदर्भ में इस गंभीर संकट पर विचार करें तो स्थिति अपेक्षाकृत समान है। देहरादून के निरंजनपुर में हाल ही में हुआ आर्द्रभूमि का मामला शहरी जल निकायों के संरक्षण में देरी और अनुचित प्रबंधन का एक उदाहरण है। इन क्षेत्रों के पारिस्थितिक स्वरूप के उचित प्रबंधन के लिए आर्द्रभूमियों के आसपास बफर क्षेत्र होना आवश्यक है। विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र के अनुसार, संरक्षण कार्यों में देरी के कारण उत्तराखंड की लगभग 70 प्रतिशत आर्द्रभूमियां वर्षों से नष्ट हो चुकी हैं। इनमें से अधिकांश (994 में से 816) 2.25 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाली छोटी आर्द्रभूमियां हैं।जल स्रोतों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। शुरुआत में हमें छोटे झरनों, जल स्रोतों और नदियों पर ध्यान देना चाहिए, जो ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के प्रमुख स्रोत हैं। प्लास्टिक सदियों से जल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा रहा है। सूक्ष्म प्लास्टिक की समस्या पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। हैरानी की बात है कि हम नदियों के उद्गम स्थल पर ही उनका संरक्षण करने में असमर्थ हैं; सुरकंडा देवी मंदिर के पास से निकलने वाली हेवल नदी के उद्गम स्थल पर ही गंभीर चिंता व्यक्त करने की आवश्यकता है। हिमालय में उचित अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली के अभाव के कारण प्लास्टिक लगभग सभी प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रहा है। हमें यह समझना होगा कि 20-30 साल पहले की प्रथाएं कुछ हद तक ही कारगर थीं। अब समय आ गया है कि हम वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप एक नई जीवनशैली अपनाएं। यह केवल हमारी पारिस्थितिक प्रकृति को बेहतर ढंग से समझने से ही संभव है। जल संरक्षण योजनाओं की भरमार के बावजूद, सरकार और ग्रामीण समुदायों के बीच एक बड़ा अंतर मौजूद है। एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के थैलों पर प्रतिबंध के बावजूद, बाजार में ऐसे थैलों के बड़े-बड़े बंडल घूमते हुए देखे जा सकते हैं।यह मुद्दा केवल जल संरक्षण तक सीमित नहीं है; बल्कि लैंगिक संवेदनशीलता, महिला सशक्तिकरण और कई अन्य मुद्दे इससे परस्पर जुड़े हुए हैं। इस संबंध में ग्रामीण समुदाय के नेताओं की अहम भूमिका है। उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में समय-समय पर सभाएं आयोजित करनी चाहिए ताकि जागरूकता की कमी न रहे। हमें तीर्थयात्रियों को प्लास्टिक की बोतलों के विकल्प उपलब्ध कराने चाहिए, क्योंकि इससे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में होने वाले प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने में मदद मिलेगी।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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