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नए जिलों का फिर दांव, क्या चुनावी दंगल में छोड़ेगा प्रभाव

17/01/22 - Updated on 18/01/22
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड का सियासी रण इस बार यूपी की तरह ही रोचक होने वाला है, लेकिन इस चुनाव में सालों से चल रहे एक मुद्दा फिर जिंदा हो गया है. इस बार के सियासी समर में जिस मुद्दे ने तूल पकड़ा है वो है नए जिलों के गठन का. उत्तराखंड के अलग राज्य बनने से पहले कई क्षेत्रों में नए जिलों को बनाने के लिए आंदोलन होते रहे हैं. वोटर्स के लिए बेहद अहमियत रखने वाले नए जिलों के गठन को लेकर फैसला भी हुआ और वादा भी, लेकिन देखा गया सपना साकार नहीं हो सका. उत्तराखंड के सियासी इतिहास और इस मुद्दे की तह तक जाने की कोशिश करें तो साल 2000 में 13 जिलों को साथ लेकर उत्तराखंड को नया राज्य बनाया गया.

सालों से सुलगती रही जिलों की मांग की हकीकत करीब 21 सालों बाद भी अब भी पूरी नहीं हुई है.एक बार फिर सभी राजनीतिक दलों ने आंदोलनरत इलाकों के वोटर्स को नए जिलों का वादा कर दिया है. अपने उत्तराखंड के दौरे पर पहुंचे अरविंद केजरीवाल काशीपुर गए तो वहां वो काशीपुर को नया जिला बनाने का ऐलान कर आए. उन्होंने अपने चुनावी वादे में कहा कि अगर उत्तराखंड में सत्ता में आई तो काशीपुर के लोगों को नए जिले की सौगात मिलेगी. केजरीवाल ने ये वादा सिर्फ काशीपुर के लिए नया जिला बनाने के लिए नहीं किया.

उन्होंने डीडीहाट, रानीखेत, कोटद्वार, रुड़की और यमुनोत्री में भी जिले बनाने का वादा किया है. साल 2017 के विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने इस मुद्दे को एक बार फिर चुनावी रंग दिया. कांग्रेस को चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा और फिर नए जिलों को बनाने का मुद्दा मानों हवा हो गया. अपने करीब साढ़े चार साल के कार्यकाल के दौरान बीजेपी ने इस मुद्दे पर कोई स्टैंड साफ नहीं किया. प्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा के बजट सत्र के दौरान चार नए जिलों के गठन की मंशा स्पष्ट किए जाने के बाद नए जिलों का मसला एक बार फिर गर्माने के आसार बन गए हैं।

हालांकि, पिछले दो विधानसभा चुनावों के दौरान नए जिले महज मतदाताओं को लुभाने के लिए मुद्दे के तौर पर ही इस्तेमाल किए गए, लेकिन जिस तरह त्रिवेंद्र सरकार ने एक साल पूरा होते-होते ही नए जिलों के गठन की बात कही है, उससे इस बात की संभावना अब काफी प्रबल हो गई है कि निकट भविष्य में ये जिले वजूद में आ जाएंगे। यूं तो उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद से ही नए जिलों के गठन की मांग उठती रही है, लेकिन इसने जोर पकड़ा वर्ष 2011 में तत्कालीन भाजपा सरकार के दौरान।

उस समय मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने स्वतंत्रता दिवस पर राज्य में चार नए जिलों के गठन की घोषणा की। ये नए जिले थे कोटद्वार (पौड़ी गढ़वाल), यमुनोत्री (उत्तरकाशी), रानीखेत (अल्मोड़ा) और डीडीहाट (पिथौरागढ़)। नए जिलों के गठन का शासनादेश होता, इससे पहले ही मुख्यमंत्री पद से निशंक की विदाई हो गई और उनकी जगह आए भुवन चंद्र खंडूड़ी। खंडूड़ी सरकार ने आठ दिसंबर 2011 को शासनादेश तो कर दिया लेकिन फिर विधानसभा चुनाव के कारण मसला लटक गया। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सत्ता से बेदखल हो गई।

इसका नतीजा यह हुआ कि सत्ता संभालने के बाद कांग्रेस ने नए जिलों का मसला ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया। कांग्रेस सरकार के समय नए जिलों समेत तमाम नई प्रशासनिक इकाइयों के गठन के उद्देश्य से अध्यक्ष राजस्व परिषद की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पुनर्गठन आयोग बनाकर यह मसला उसके सुपुर्द कर दिया गया। कहा गया कि नए जिलों के मुख्यालय, सीमाओं के चिह्नांकन और जिलों में सम्मिलित किए जाने वाले क्षेत्रों को लेकर विवाद को देखते हुए यह कदम उठाया गया। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान जब वर्ष 2014 में नेतृत्व परिवर्तन के बाद हरीश रावत ने मुख्यमंत्री का पद संभाला तो उन्होंने नए जिलों के गठन में खासी रुचि प्रदर्शित की।

रावत ने तो चार नए जिलों के स्थान पर आठ नए जिलों के गठन तक की बात कही। यह बात दीगर है कि रावत के मुख्यमंत्रित्वकाल में भी नए जिले धरातल पर नहीं उतर पाए। महत्वपूर्ण बात यह कि भाजपा और कांग्रेस, दोनों ने ही विधानसभा चुनाव में नए जिलों के गठन को मुद्दा बनाकर इस्तेमाल किया लेकिन दोनों पार्टियों की सरकारों के दौरान पिछले सात सालों से नए जिले जमीन पर उतरने की बजाए फाइलों में ही कैद होकर रह गए। हालांकि चुनावों से पहले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य में नए नए जिलों के गठन का एलान किया है. कांग्रेस ने भी सत्ता में वापसी के लिए इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश करते हुए 9 नए जिले बनाने की बात कही है.

आम आदमी पार्टी का वादा राज्य में 6 नए जिले बनाने का है. जिला मुख्यालयों से कटे और दूरदराज के लोग अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए नए जिले बनाने के लिए सालों से आंदोलन कर रहे हैं. यही वजह है कि बार-बार राजनेता और राजनीतिक दल वोटों की आस में चुनावों में नए जिलों को वादे का हवा देने में लग जाते हैं. चमोली में देवाल, थराली, उखीमठ और अगस्त्यमुनी विकास खंड के गांव लंबी दूरी के चलते जिला मुख्यालयों से बेहद अलग थे.

लोगों को अगर जिला मुख्यालय किसी काम से जाना होता था तो उसमें एक दो दिन का समय लग जाता था. डीडीहाट, रानीखेत, कोटद्वार और यमुनोत्री में अभी भी नए जिलों की मांग को लेकर आंदोलन हो रहे हैं. उत्तराखंड में फिलहाल 13 जिले और दो मंडल हैं. इसके अलावा, थराली, गैरसैंण, कर्णप्रयाग, ऋषिकेश, नरेन्द्रनगर, यमुनोत्री, रुड़की, कोटद्वार, डीडीहाट, रानीखेत, रामनगर, काशीपुर को जिला बनाने की मांग हो रही है. पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, चमोली, पौड़ी, उत्तरकाशी, टिहरी और हरिद्वार की कई विधानसभा सीटों में नए जिलों को लेकर आंदोलन चल रहे हैं. एक बार फिर से राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे को अपने घोषणापत्र में लाने की तैयारी तो की है, लेकिन ये सपना क्या फिर सपना रह जाएगा या साकार होगा ये वक्त बताएगा. लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।

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