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उम्मीद नए साल में उत्तराखंड में थमेगी कंक्रीट माफिया की ”लूट

07/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
नए साल के साथ उत्तराखंड सरकार ने कंक्रीट माफिया, अवैध बिल्डरों और भूमाफिया के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का संकेत दे दिया है। राजधानी देहरादून, जहां वर्षों से अवैध कालोनियों, नदी किनारे निर्माण और सरकारी भूमि पर कब्जों ने शहर की रफ्तार और पर्यावरण दोनों को बिगाड़ा, अब सख्त कार्रवाई का केंद्र बन गया है।सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका की संयुक्त सख्ती से यह उम्मीद जगी है कि विकास के नाम पर हो रहे बेतरतीब कंक्रीटीकरण पर अब वास्तविक लगाम लगेगी। साथ ही प्रदेश में निवेश के नाम पर रकम लेकर प्रोजेक्ट अधूरे छोड़ने, तय वादों से मुकरने व ग्राहकों को लूटकर फरार होने वाले कंक्रीट माफिया’ यानी बिल्डरों पर अब सरकार सख्त कार्रवाई की तैयारी कर रही है।मुख्यमंत्री के निर्देश पर शासन व विकास प्राधिकरण ने बिल्डर गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए एक कड़ी और पारदर्शी नियमावली को लागू करने की तैयारी कर ली है। नई व्यवस्था लागू होने के बाद बिल्डरों की मनमानी पर रोक लगेगी और निवेशकों को सुरक्षा भी मिलेगी। नई नियमावली में निवेशकों का पैसा एस्क्रो अकाउंट में जमा होगा व निर्माण की प्रगति के अनुसार बिल्डरों को यह पैसा किश्तों में जारी होगा।गुजरे चार-पांच वर्ष में विकास प्राधिकरण एवं पुलिस के पास ऐसे कई मामले आए, जिनमें बिल्डरों ने करोड़ों रुपये लेकर आवासीय प्रोजेक्ट शुरू तो किए, लेकिन बीच में ही निर्माण रोक दिया। कई बिल्डर तो फरार भी हो गए हैं, जिससे निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। ऐसे कई प्रोजेक्ट अधर में हैं, जबकि खरीदार बैंक की किश्त और किराया दोनों का बोझ झेल रहे हैं। बढ़ती शिकायतों एवं निवेशकों को होने वाली परेशानी के दृष्टिगत शासन के निर्देशन में मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) नई नियमावली पर काम शुरू कर चुका है। जल्द इसे शासन के माध्यम से मुख्यमंत्री के समक्ष रखा जाएगा।एस्क्रो अकाउंट ऐसा बैंक अकाउंट होता है, जहां दो या दो से अधिक पक्षों के बीच सौदा पूरा होने तक धनराशि किसी विश्वसनीय तृतीय पक्ष द्वारा सुरक्षित रखी जाती है। समस्त आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद धनराशि विक्रेता को भुगतान कर दी जाती है। यदि विक्रेता आवश्यकता पूरी नहीं करता है, तो धनराशि उसी व्यक्ति को या खरीदार को वापस कर दी जाती है। एस्क्रो अकाउंट का इस्तेमाल आमतौर पर अचल संपत्ति के लेन-देन में यह सुनिश्चित करने को होता है कि खरीदार और विक्रेता अपने दायित्वों को पूरा करें। यह व्यवस्था दोनों पक्षों को संभावित धोखाधड़ी से बचाती है।दून में अवैध निर्माण और कंक्रीट माफिया पर कार्रवाई केवल प्रतीकात्मक नहीं रहेगी। मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण व जिला प्रशासन ने दर्जनों स्थानों पर निरीक्षण कर सैकड़ों अवैध निर्माणों को चिह्नित किया है। इनमें बिना मानचित्र स्वीकृति बने भवन, कृषि भूमि पर विकसित कालोनियां और नदी-नालों के बाढ़ क्षेत्र में बने पक्के ढांचे शामिल हैं।एमडीडीए के अनुसार, सहस्रधारा, रायपुर, डोईवाला, राजपुर रोड और रिस्पना व बिंदाल नदी किनारे के क्षेत्रों में वर्षों से चले आ रहे मामलों की फाइलें दोबारा खोली गई हैं। कई बड़े बिल्डरों व डेवलपरों की सूची तैयार की गई है, जिन पर आने वाले दिनों में सीलिंग, ध्वस्तीकरण और आपराधिक मुकदमे दर्ज हो सकते हैं। प्राधिकरण ने साफ किया है कि अब केवल नोटिस जारी कर मामले ठंडे बस्ते में नहीं डाले जाएंगे। जोर इस बात पर भी है कि अवैध निर्माण रोकने के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी तय की जाए।रियल एस्टेट सेक्टर में लंबे समय से चल रही अव्यवस्थाओं और निवेशकों के साथ हो रही ठगी पर नए साल में प्रभावी रोक लगने की उम्मीद है। नई नियमावली से न सिर्फ निवेशकों को राहत मिलेगी, बल्कि बेतरतीब निर्माण व अवैध बिल्डर फ्लोर की लगातार बढ़ रही समस्या पर भी लगाम कसेगी। रियल एस्टेट सेक्टर में बढ़ती ठगी, अधूरे प्रोजेक्ट और निवेशकों के पैसे अटकने जैसी समस्याओं को देखते हुए सरकार जो नया कदम उठाने जा रही है, उससे हजारों निवेशकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। बिल्डरों की मनमानी पर लगाम लगाने व उपभोक्ताओं का हित सुरक्षित रखने के लिए तैयार की जा रही नई नियमावली अब निवेशकों की ””सुरक्षा ढाल”” बनकर सामने आएगी।घर खरीदने वालों को ठगी, भ्रमित करने वाले दावों और अवैध निर्माण की मार से बचाने के लिए अब एमडीडीए पूरी तरह सक्रिय हो गया है। शहर में बिल्डर गतिविधियों में तेजी से बढ़ रही अनियमितताओं को देखते हुए अब बिल्डर लाबी को किसी तरह की राहत नहीं मिलती दिख रही। शहर में बिल्डर फ्लोर संस्कृति के तेजी से बढ़ने, अवैध अतिरिक्त निर्माण, पार्किंग पर कब्जा, बिना अनुमति मंजिलें खड़ी करना, नक्शों में मनमानी जैसी समस्या लगातार सामने आ रही हैं। प्राधिकरण को शिकायतें मिल रही थीं कि कई बिल्डर निवेशकों को अलग तरह की सुविधाओं का वादा करते हैं, लेकिन कब्जा देते समय स्थिति पूरी तरह अलग निकलती है। अब इन घटनाओं को रोकने के लिए नियमों को और सख्त व स्पष्ट बनाने की तैयारी है।हमारे शहर आबादी के बोझ तले दब रहे हैं और उनका ढांचा चरमरा रहा है। बात चाहे सीपीडब्ल्यूडी की हो या पीडब्ल्यूडी की, वे ढंग की सड़कें भी नहीं बना पा रहे हैं। यही स्थिति नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने वाले अन्य विभागों की भी है। उनकी ओर से किए जाने वाले कार्यों की गुणवत्ता ठीक नहीं हो पा रही है। उनके कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव भी व्याप्त है। यह तब है, जब सब जानते हैं कि शहर आर्थिक विकास के इंजन हैं।सरकारी क्षेत्र में अपेक्षित बदलाव तभी संभव है, जब देश की नौकरशाही के सोच में आमूलचूल परिवर्तन आएगा। समस्या यह है कि फिलहाल सरकार के एजेंडे पर यह दिख नहीं रहा है। नौकरशाही में सुधार की जो प्रतीक्षा की जा रही है, वह इस नए वर्ष पूरी होनी चाहिए। नौकरशाही को अपने कामकाज के तौर-तरीकों के साथ अपनी मानसिकता भी बदलनी चाहिए। इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि जनप्रतिनिधि भी अपने काम का तरीका और सोच बदलें। यह भी समय की मांग है कि आम जनता भी अपना कार्य-व्यवहार बदले।!।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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