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देश की शिक्षा व्यवस्था में निजी क्षेत्र का वर्चस्व निरंतर बढ़ता जा रहा है

07/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत में शिक्षा का महंगा होना चिंतनीय विषय बनता जा रहा है। जब से शिक्षा निजीकरण का हिस्सा बनी है, तब से स्कूल से लेकर कालेज तक यह एक व्यवसाय के रूप में अधिक प्रदर्शित होती गई। कोरोना काल में जब आनलाइन शिक्षण चल रहा था, तब भी कई निजी शिक्षण संस्थानों द्वारा शत-प्रतिशत फीस वसूली किए जाने के मामले सामने आए और जैसे ही महामारी का संक्रमण कम हुआ और आफलाइन कक्षाएं आरंभ हुईं तो ऐसे शिक्षण संस्थानों ने फीस में वृद्धि कर दी। इसके बाद कई राज्य सरकारों को और कोर्ट को हस्तक्षेप करते हुए उन्हें आनलाइन शिक्षण के समय शिक्षण शुल्क के अतिरिक्त कोई अन्य फीस न लेने और फीस में वृद्धि न करने के निर्देश देने पड़े।इससे भी अनुमान लगा सकते हैं कि शिक्षा का महंगा होना सर्वसुलभ शिक्षण की राह में कितना बाधक है। महंगी शिक्षा के कारण ही समाज में आर्थिक रूप से कमजोर एक बड़ा वर्ग शिक्षा से वंचित है। हालांकि सरकारी शिक्षण संस्थान निशुल्क शिक्षा उपलब्ध करवा रहे हैं, लेकिन वहां शिक्षकों की उपलब्धता, गुणवत्ता, सरकारी उदासीनता, शिक्षण और भौतिक सुविधाओं की कमी के कारण एक बड़े हिस्से के लिए रुचिकर नहीं है। देखने वाली बात यह है कि निजी शिक्षण व्यवस्था का कदम शिक्षा की गुणवत्ता और सर्व सुलभता के लिए ही उठाया गया था। बीते दशक तक निजी शिक्षा व्यवस्था ठीक ठाक तरीके से काम कर रही थी, लेकिन जैसे ही उद्योगपतियों ने शिक्षा में हस्तक्षेप किया तो इसे एक व्यवसाय में रूपांतरित कर दिया।आज कई निजी शिक्षण संस्थान अनेक प्रकार के शुल्क की वसूली करते हैं। वहीं अधिक फीस चुकाने के बाद भी शिक्षण की गुणवत्ता स्तरीय नहीं होती है। शिक्षण को व्यवसाय बना देना एक तरह से शिक्षण की गुणवत्ता के गिरने और इसके महंगी होने का एक बड़ा का कारण है। हालांकि सभी निजी शिक्षण संस्थानों पर यह बात लागू नहीं होती है। ऐसे अनेक निजी शिक्षण संस्थान हैं जो गुणवत्ता से समझौता नहीं करते और केवल शिक्षण शुल्क ही वसूल करते हैं। शिक्षा का अधिकार के तहत 25 प्रतिशत सीटों पर पिछड़े और गरीब वर्ग के सही पात्र छात्रों को नियमानुसार एडमिशन देते हैं और हर साल शुल्क वृद्धि नहीं करते हैं। वहीं कुछ निजी विद्यालय, उच्च स्तर की गुणवत्तापरक शिक्षा तो प्रदान कर रहे हैं, परंतु शुल्क संरचना अत्यधिक महंगी होने के कारण उसका लाभ केवल अभिजात्य वर्ग तक ही सीमित रह जाता है।सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 30 प्रतिशत जनसंख्या, जो गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत कर रही है, उसके लिए इन शिक्षा सुविधाओं का लाभ संभव नहीं है। दूसरी तरफ कई निजी शिक्षण संस्थान बड़े-बड़े आलीशान भवनों में संचालित हो रहे हैं, जो शिक्षण शुल्क के अलावा पाठ्य सामग्री, स्कूल ड्रेस और शूज आदि अपनी तरफ से छात्रों को बेचते हैं।वर्तमान महंगी शिक्षा व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि निजी स्कूलों की महंगी और बेहिसाब ढंग से बढ़ती फीस अभिभावकों के लिए बड़ी समस्या है। इस समस्या का समाधान होना ही चाहिए। लेकिन स्कूलों की फीस और पसंद के स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला न दिला पाने से निराश अभिभावकों की संख्या, दोनों में होने वाली वृद्धि यह स्पष्ट करने के लिए काफी है कि हमारी शिक्षा प्रणाली के साथ सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देने वाले शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू होने के बाद यह समस्या और गंभीर होती चली गई। ऐसा क्यों हुआ? इस बात को भी समझा जाना चाहिए। उत्तराखंड के प्राथमिक विद्यालय साल दर साल छात्र विहीन होते जा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की संख्या में न कोई कमी की जा रही है और न उन्हें छात्रों की घटती संख्या को लेकर कोई चिंता है। यही कारण है कि राज्य के 1916 प्राथमिक विद्यालयों में आज छात्रों की संख्या एक से लेकर अधिकतम पांच तक ही रह गई है।यानी एक ओर जहां स्कूलों में छात्रों का टोटा है, वहीं दूसरी ओर इन स्कूलों की निगरानी और संचालन के लिए सात स्तरों के अधिकारी तैनात हैं। इसमें खंड शिक्षा अधिकारी (प्रारंभिक शिक्षा) से लेकर शिक्षा महानिदेशक तक शामिल हैं। उत्तराखंड में सरकारी शिक्षा व्यवस्था एक गंभीर संकट की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। उत्तराखंड में एक-दो नहीं बल्कि चार हजार से अधिक सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां छात्र-छात्राओं की संख्या 10 या उससे भी कम रह गई है। हालात इतने चिंताजनक हैं कि वर्ष 2025 में प्रदेश में एक भी नया सरकारी स्कूल नहीं खुल पाया, जबकि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के दावे और योजनाएं लगातार चलाई जा रही हैं।आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में 4275 स्कूल ऐसे हैं, जिनमें 10 या उससे कम छात्र अध्ययनरत हैं। इस सूची में पौड़ी गढ़वाल जिला सबसे ऊपर है, जहां ऐसे 904 स्कूल हैं। वहीं हरिद्वार जिले में यह संख्या सबसे कम मात्र 3 बताई जा रही है। यह असंतुलन पहाड़ी और मैदानी जिलों के बीच शैक्षिक असमानता को भी उजागर करता है। केवल प्राथमिक ही नहीं, बल्कि राज्य के 650 जूनियर हाईस्कूलों में भी छात्र संख्या 10 या उससे कम रह गई है। इनमें भी पौड़ी जिला सबसे आगे है, जहां 120 जूनियर हाईस्कूल बेहद कम नामांकन के साथ संचालित हो रहे हैं। प्रदेश में 2940 प्राथमिक स्कूलों में 20 या उससे कम छात्र हैं। 1327 स्कूलों में 30 या उससे कम छात्र पढ़ रहे हैं। 1062 स्कूलों में छात्र संख्या 50 से भी कम है।सरकारी स्कूलों की यह स्थिति तब है, जब शिक्षा विभाग द्वारा समग्र शिक्षा योजना, प्रधानमंत्री पोषण योजना, मुख्यमंत्री मेधावी छात्र प्रोत्साहन छात्रवृत्ति, बालिका शिक्षा प्रोत्साहन योजना जैसी अनेक योजनाएं लागू हैं। इन योजनाओं पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं और शिक्षा विभाग का कुल बजट 12 हजार करोड़ रुपये से अधिक है। इसके बावजूद स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार घटती जा रही है। शिक्षा विभाग ने समय-समय पर अटल उत्कृष्ट विद्यालय, पीएम श्री स्कूल, क्लस्टर विद्यालय जैसे प्रयोग किए, लेकिन इनका अपेक्षित असर जमीनी स्तर पर नहीं दिखा। अभिभावकों का भरोसा सरकारी स्कूलों से उठता जा रहा है और छात्र निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैंपर्वतीय राज्य की अवधारणा के एकदम उलट जान पड़ती है। उत्तराखंड राज्य निर्माण की बुनियाद में यही तथ्य था कि यहाँ के नागरिकों की पहुँच स्कूलों, अस्पतालों तक आसानी से हो। इन सुविधाओं के अभाव में पलायन न करना पड़े। ऐसे में बेसिक स्कूल का 5-10 किमी. के दायरे में होना समझ से परे है। दूसरा उत्तराखंड की पर्यावरणीय स्थिति है। जिन स्कूलों को सरकार ने क्लस्टर विद्यालय के रूप में चुना है, क्या वहाँ इतने बड़े निर्माण संभव हैं जिनमें कक्षा 1 से लेकर 12 तक के सैकड़ों छात्र संसाधनों के साथ अध्ययन कर सकें ? अभी जिन विद्यालयों को क्लस्टर स्कूलों के रूप में चुना गया है, ढाँचागत सुविधाओं और संसाधनों की दृष्टि से उनकी स्थिति खराब है उन पर आसपास और दो-तीन विद्यालयों का विलय होने पर किस प्रकार उनका संचालन होगा ?विद्यालयों को संसाधन उपलब्ध कराने की दृष्टि से हमारी सरकारों  का रिकॉर्ड खराब ही रहा है। ऐसे में आधे-अधूरे तरीके से शुरू की गई ‘क्लस्टर स्कूल योजना’ वर्तमान व्यवस्था को और खराब कर सकती है और विद्यालयों की बढ़ती दूरी ग्रामीणों को पलायन के लिए मजबूर कर सकती है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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