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“संवेदना और सृजन का राग है शैलेन्द्र के गीतों में”

27/11/23
in देहरादून
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ब्यूरो रिपोर्ट

देहरादून। आज शाम 4ः00बजे, दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से संस्थान के सभागार में सुपरिचित कवि, गीतकार और फिल्म निर्माता शैलेन्द्र पर एक महत्वपूर्ण चर्चा का आयोजन किया। साहित्यकार इन्द्रजीत सिंह द्वारा इन पर लिखी पुस्तक ‘शैलेन्द्र‘ पर  लेखक व शिक्षाविद डाॅ. सुशील उपाध्याय ने बातचीत की। साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक पर चर्चा का कार्यक्रम दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से किया गया। विशेष बात यह है कि वर्ष 2023 गीतकार शैलेन्द्र जी का जन्मशती का वर्ष भी है।इस बातचीत में साहित्यकार इन्द्रजीत सिंह ने कहा कि जिस तरह प्रेमचंद कहानी लिखते-लिखते कहानी का पर्याय बन गए उसी तरह शैलेन्द्र भी गीतों को रचते-रचते गीतों के प्रेमचंद बन गए। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने वालों ने शैलेन्द्र को लंबे समय तक एक कवि के रूप में मान्यता नहीं दी। 1955 में शैलेन्द्र के कविता-संग्रह ‘न्यौता और चुनौती‘ के प्रकाशन होने के बाद चर्चा तो हुई परन्तु साहित्यिक जगत में उतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई दी। सोवियत संघ में प्रगति प्रकाशन द्वारा 1959 में भारत के कवि नाम से एक कविता संग्रह जो रूसी भाषा में प्रकाशित हुआ था उसमें निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, दिनकर, सरदार जाफरी जैसे बड़े हिंदुस्तानी कवियों के साथ शैलेन्द्र की भी दो कविताएं शामिल थीं। उस दौर में शैलेन्द्र के फिल्मी गीतों का जादू भारत के साथ-साथ सोवियत संघ, चीन और अरब आदि देशों के श्रोताओं में छाया हुआ था। इस तरह शैलेन्द्र के गीत देश-विदेश में राष्ट्रभाषा हिंदी का परचम लहरा रहे थे।साहित्यकार इन्द्रजीत सिंह ने बातचीत में यह भी कहा कि शैलेन्द्र की कविताओं में संवेदना और सृजन का राग है, प्रतिरोध और प्रतिबद्धता की आग है और समानता, स्वतंत्रता और इंसानियत से परिपूर्ण समाज का हसीं ख्वाब है। लोकप्रियता और कलात्मकता का अद्भुत संयोग ही शैलेन्द्र के गीतों को कालजयी बनाते हैं।साहित्यिक जगत में जिस तरह वर्ड्सवर्थ और पंत को प्रकृति का कवि और एलियट और मुक्तिबोध को विचारों का कवि माना जाता है उसी तरह शैलेन्द्र को इश्क, इंकलाब और इंसानियत के कवि के रूप में जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि शैलेन्द्र का पहला कविता-संग्रह न्यौता और चुनौती 1955 में प्रकाशित हुआ जिसमें उनकी 33 कविताएँ शामिल हैं। शैलेंद्र ने 800 के करीब गीत लिखे। उन्हें तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। रेणुजी की अमर प्रेम कहानी तीसरी कसम अर्थात् मारे गए गुलफाम पर शैलेन्द्र ने तीसरी कसम फिल्म का निर्माण किया। शैलेन्द्र के निधन के बाद तीसरी कसम को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया। नामवर सिंह ने शैलेन्द्र की कविताओं को सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ और उन्हें सच्चे अर्थों में जनकवि बताया था।शिक्षाविद एवं लेखक डॉ. सुशील उपाध्याय ने अपने वक्तव्य में कहा कि शैलेंद्र मानवता के गीतकार हैं। उनके गीतों में इश्क के साथ ही इंकलाब भी नजर आता है। मनुष्यता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता वास्तव में अनुकरणीय है। पूर्व प्राचार्य एवं लेखक डॉ. इंद्रजीत सिंह ने अपनी किताब ’शैलेंद्र’ में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का विस्तृत खाका खींचा है। यह पुस्तिका पाठकों को शैलेंद्र के जीवन के अनछुए पहलुओं तक लेकर जाती है।इन्द्रजीत सिंह ने शैलेन्द्र के जीवन एवं रचनाओं पर बेहतरीन काम किया है। इन्होंने जनकवि शैलेन्द्र, धरती कहे पुकार के तथा तू प्यार का सागर है का संपादन किया है। चैथी पुस्तक दिल का हाल सुने दिलवाला शीघ्र ही प्रकाशित हो रही है। शैलेन्द्र एवं अन्य सिने गीतकारों पर इनके अनेक लेख प्रकाशित हुए हैं। इन्द्रजीत सिंह शैलेन्द्र सम्मान के संस्थापक भी हैं। शिक्षा एवं साहित्य के क्षेत्र में इन्हें कई सम्मान एवं पुरस्कार भी मिले हुए हैं।आज के बातचीत के इस कार्यक्रम में अतुल विश्नोई और पीयूष निगम ने शैलेन्द्र के गीतों पर अपनी संगीतमय प्रस्तुति भी दी।  कार्यक्रम से पूर्व दून लाइब्रेरी के रिसर्च एसोसिएट ने सभागार में उपस्थित लोगों का स्वागत किया और अंत में श्री निकोलस हॉफ़लैण्ड ने धन्यवाद दिया। आज की इस महत्वपूर्ण बातचीत के अवसर पर सभागार में उपस्थित लोगों ने इस विषय से जुड़े अनेक सवाल-जबाब भी किये। इस दौरान सभागार में मुकेश नौटियाल, डॉली डबराल,अनिल भारती, डॉ.नंदकिशोर हटवाल,जितेन्द्र नौटियाल,समदर्शी बड़थ्वाल, अरुण कुमार असफल , गोपाल थापा, डॉ.विद्या सिंह और सुंदर सिंह बिष्ट सहित अनेक लेखक, साहित्यकार, साहित्य प्रेमी, फिल्म प्रेमी, बुद्विजीवी, पुस्तकालय के सदस्यगण तथा अनेक युवा पाठक उपस्थित रहे।

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