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उत्तराखंड में निकाय चुनाव राजनीतिक परिदृश्य

22/01/25
in उत्तराखंड, देहरादून, राजनीति
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
राजनीतिक गलियारों में इन चुनावों को लेकर चर्चाएं तेज हो चुकी हैं. बीते दो दिन पहले राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा नगर निकायों की निर्वाचक नामावली को अपडेट करने संबंधी निर्देशों के बाद संभावना जताई जा रही है कि प्रदेश में 102 स्थानीय नगर निकायों के चुनाव हैं. वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में टिकट के लिए ऐसे लोग दावेदारी कर रहे हैं, जो कहीं न कहीं आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़े हैं। स्वच्छ छवि वाला व्यक्ति चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा ही नहीं बनना चाहता। उसे लगता है कि आपराधिक प्रवृत्ति का बोलबाला होने से वह स्वयं को राजनीति में स्थापित नहीं कर पाएगा। वहीं, जनता के मन में भी यह विश्वास घर करता जा रहा है कि स्वच्छ छवि का व्यक्ति उसके कार्य नहीं करा सकता। वर्तमान दौर में सामाजिक सरोकार के मुद्दे भी कमजोर होते जा रहे हैं और धर्म, जाति व क्षेत्रीयता की भावनाओं से प्रेरित मुद्दे हावी हो गए हैं।वर्ष 1993 में वोहरा समिति की रिपोर्ट, वर्ष 2002 में संविधान के कामकाज की समीक्षा करने के लिए नेशनल कमीशन टु रिव्यू द वर्किंग आफ द कांस्टिट्यूशन की रिपोर्ट ने पुष्टि की कि भारतीय राजनीति में अपराधीकरण लगातार बढ़ा है। राजनीतिक दलों में इस बात को लेकर प्रतिस्पर्धा है कि कौन कितने टिकट आपराधिक छवि वालों को देता है। राजनीति में अपराधीकरण के कारण अपराधियों का पैसा और बाहुबल राजनीतिक दलों को वोट हासिल करने में मदद करता है। चूंकि भारतीय राजनीति अधिकांशत: जाति-धर्म जैसे कारकों पर निर्भर है, इसलिए उम्मीदवार आपराधिक आरोपों की स्थिति में भी चुनाव जीत जाते हैं। देश के राजनीतिक दलों में काफी हद तक आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है और उम्मीदवारी पर निर्णय अमूमन उनका शीर्ष नेतृत्व ही लेता है। ऐसे में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले अक्सर दल के स्थानीय कार्यकर्ताओं और संगठन की जांच से बच जाते हैं।भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में अंतर्निहित देरी ने राजनीति के अपराधीकरण को प्रोत्साहित किया है। अदालतों को आपराधिक मामले निपटाने में औसतन 15 वर्ष लगते हैं। निर्वाचन प्रणाली में सर्वाधिक वोट पाने वाला उम्मीदवार ही जीतता है। सो, इसमें अपराधियों के लिए धन-बल का प्रयोग कर अधिकाधिक मत हासिल करना आसान होता है। चुनावी कार्यप्रणाली में मौजूद खामियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। चुनाव आयोग ने नामांकन के समय उम्मीदवारों की संपत्ति का विवरण, अदालतों में लंबित मामलों, सजा आदि का अनिवार्य उल्लेख करने का प्रविधान किया है। लेकिन, ये कदम अपराध और राजनीति के मध्य साठ-गांठ को तोड़ने में अब तक सफल नहीं हुए। इसमें जनता भी बराबर की भागीदार है। अक्सर सामान्य व्यक्ति अपराधियों के धनबल से प्रभावित होकर उन्हें वोट दे देता है। इसके अलावा राजनीति में नैतिकता और मूल्यों के अभाव ने भी अपराधीकरण की समस्या गंभीर बनाई है। अक्सर राजनीतिक दल निहित स्वाथोर्ं के लिए अपराधीकरण की जांच से कतराते हैं। राजनीति और कानून निर्माण प्रक्रिया में आपराधिक पृष्ठभूमि वालों की उपस्थिति का लोकतंत्र की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसका न्यायिक प्रक्रिया पर भी प्रभाव देखने को मिलता है, जिससे अपराधियों के विरुद्ध जांच धीमी हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों पर प्रत्यक्ष कार्रवाई के बजाय इसका निर्णय राजनीतिक दलों और जनता के विवेक पर छोड़ दिया है। ऐसे में न्यायालय के आदेश से राजनीति में किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती है।सुप्रीम कोर्ट के आदेश में चुनाव आयोग को आपराधिक पृष्ठभूमि वालों पर कार्रवाई के बजाय उनकी निगरानी करने और इस संबंध में न्यायालय को सूचित करने के निर्देश दिए गए हैं। यह व्यवस्था राजनीतिक अपराधियों को लेकर पहले से ही लंबी न्यायिक प्रक्रिया को और अधिक जटिल बनाती है। न्यायालय का यह आदेश तभी प्रभावी हो सकता है, जब राजनीतिक दल इस संदर्भ में नियमों का सही पालन करें।राजनीति में अपराधियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए जरूरी हो गया है कि संसद इसे लेकर प्रभावी कानून लाए। समस्या सामाजिक हो या राजनीतिक, उसका समाधान न तो अदालतें कर सकती हैं, न संसद ही। कानून पर अमल भी तभी होगा, जब उसे लागू करने वालों में इसके लिए अपेक्षित इच्छाशक्ति हो। इस मामले में पहली जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की है, जो चुनाव घोषणापत्र में भ्रष्ट्राचार से लड़ने का संकल्प लेते हैं, लेकिन टिकट भ्रष्ट व्यक्तियों को ही देते हैं। बहरहाल, पार्टी में पनपने वाले इस विरोध को सियासी पंडित तो अपने ही नजरिये से देख रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक की माने तो सत्ताधारी पार्टी के नाराज कार्यकर्ताओं को काफी हद तक मना लिया जाता है. लेकिन विपक्ष के नेतृत्व के लिए यह एक बड़ी चुनौती है. राजनीतिक विश्लेषक ने पार्टी के प्रति समर्पण भाव से कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं की मनोदशा की वास्तविकता को बयां करते हुए डैमेज कंट्रोल के मामले पर कहा, कई चुनाव में विरोधियों के पक्ष में भी चुनावी नतीजे सामने आ जाते हैं. साथ ही उन्होंने बताया कि सत्याधारी पार्टी नाराज पार्टी कार्यकर्ताओं को सरकार और संगठन में अहम पद देने के आधार पर मनाने में सफल हो जाती है, जबकि विपक्षी पार्टी के पास यह विकल्प उपलब्ध नहीं है. ऐसे विरोधियों का डैमेज कंट्रोल करना अब पार्टी के लिए एक बड़ा चैलेंज हो गया है. कांग्रेस पार्टी की प्रदेश प्रवक्ता ने इस बात को स्वीकार किया है कि पार्टी के सिंबल पर जिन लोगों का टिकट नहीं मिल पाया है, ऐसे पार्टी कार्यकर्ता दुखी होंगे. ऐसे कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूटा होगा.लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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