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मजदूर दिवसः संक्रमण में मजदूरों की सुध लेने वाला कोई नहीं

01/05/21
in उत्तराखंड, यात्रा, राजनीति
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
बेशक देश में प्रतिवर्ष की तरह 1 मई 2021 को मजदूर दिवस मनाया जा रहा है। कोरोना महामारी में मजदूरों के हितों को सुरक्षित करना होगा। कोरोना मजदूरों के लिए अभिशाप बन गया है। रोजगार छिन गया है। महामारी के डर से मजदूर पलायन कर रहे हैं। अपने राज्यों में लौट रहे है। 2020 में भी मजदूरों पर कोरोना का कहर बरपा था। मजदूर दिन रात पैदल ही अपने गांव लौट गए थे। कुछ महीने के बाद जिदंगी पटरी पर आने लगी थी, मगर कोराना की दूसरी लहर ने फिर से डरावनी इबारत लिखनी शुरू कर दी है। आज भी वह मंजर याद आता है, जब बेचारे मजदूर पैदल ही लौट रहे थे। मजदूरों की तस्वीरों से मन व आत्मा सिहर उठती है।

कोराना काल में मजदूरों ने जो झेला है, वह असहनीय दर्द रुला देता है। भूखे प्यासे दिन रात बिना डर के अपने घर सुरक्षित पंहुचे थे। मजदूरों के साथ रास्ते में दर्दनाक हादसे भी हुए। केवल मात्र एक दिन सेमिनार, गोष्ठियां की जाती हैं, मजदूरों के हितों को सुरक्षित करने के लिए बड़े दावे किए जाते हैं, मगर 364 दिन मजदूरों के बारे में कोई नहीं सोचता कि मजदूरों के साथ कैसे.कैसे हादसे होते रहते हैं। प्रतिदिन समाचार.पत्रों में मजदूरों के मरने की खबरें सुर्खिया बनती हैं, मगर सरकारें मूकदर्शक बनी तमाशा देख रही हैं। देश के कारखानों में मजदूर मर रहे हैं हर जगह मजदूर काल का ग्रास बन रहे है। देश में मजदूरों के साथ हादसे कब थमेगें यह एक यक्ष प्रश्न है।

हर साल दिवस मनाए जाते हैं मगर धरातल की सच्चाइयां बहुत ही भयानक है मजदूरों का शोषण किया जाता है। मजदूरों के नाम पर योजनाएं चलाई जाती हैं, मगर उन्हें उनका हक नहीं मिलता। देश में हर रोज मजदूर बेमौत मर रहे हैं। मजदूरों के साथ होने वाले यह हादसे बहुत ही त्रासदी है। कहीं उद्योगों में जलकर मारे जा रहे हैं। हादसों की बजह से बच्चे अनाथ हो रहे हैं। मगर केन्द्र व राज्य की सरकारों को जरा सा सदमा होता तो मजदूरों के हितों में कदम उठाती लेकिन सरकारें तो तब जागती हैं, जब बड़ा हादसा घटित हो जाता है। देश में हर वर्ष लाखों मजदूर दबकर मारे जा रहे हैं। उद्योगों में जलकर मारे जा रहे हैं। मगर केन्द्र व राज्य की सरकारों को जरा सा सदमा होता तो मजदूरों के हितों में कदम उठाती लेकिन सरकारें तो तब जागती हैं जब बड़ा हादसा घटित हो जाता है।

देश के कारखानों में मजदूर मर रहे हैं, इमारतों के नीचे दबकर मजदूर काल का ग्रास बन रहे है। आंकड़ों के मुताबिक बीते सालों में देश में हजारों मजदूर मारे जा चुके है। हादसों ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि बार.बार हो रहे इन हादसों के कारण क्या है इस घटना ने यह प्रमाणित कर दिया है कि बीती घटनाओं से न तो सरकार ने सबक सिखा और न ही लोगों ने सीखा। हालांकि यह कोई पहला हादसा नहीं है। पिछले कई सालों से ऐसे दर्दनाक हादसे हो रहे हैं। बीते वर्ष में रायबरेली के उंचाहार में एटीपीसी संयत्र का बायलर फटने से 30 मजदूरों की दर्दनाक मौत हो गई थी तथा 100 के लगभग घायल हो गए थे। 500 मेगावाट इकाई के बायलर में यह हादसा हुआ था। उस समय 200 कामगार मौजूद थे। सरकारों ने मृतकों को मुआवजे की घोषणा करती है, मगर मुआवजा इसका हल नहीं है। एक ऐसा ही हादसा जयपुर के पास खातोलाई गांव में घटित हुआ था, जहां सफारमर फटने से 14 लोगों की मौत हो गई थी। इन हादसों ने औद्यागिक क्षेत्रों में मजदूरों की सुरक्षा पर प्रशनचिन्ह लगा दिया है इन हादसों पर संज्ञान लेना होगा तथा मजदूरों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने होगें ताकि भविष्य में ऐसे हादसों पर रोक लग सके।गत् वर्ष जम्मू के उधमपूर से 80 किलोमीटर दूर रामबन जिले के चंद्रकोट में जम्मू.कश्मीर हाईवे पर टनल कर्मचारियों की बैरक में आग लगने से दस श्रमिक जिंदा जल गए थे। गत वर्ष एक निर्माणाधीन प्रोजेक्ट की दीवार गिरने से चार मजदूर बेमौत मारे गए। यहां पर 11 मजदूर काम कर रहे थे कि अचानक दीवार गिर गई सात मजदूर तो भागकर बच गए मगर बेचारे चार मजदूर जिन्दा दफन हो गए थे। इन मजदूरों पर 42 मीटर लंबी दीवार गिर गई यह बहुत ही दुखद हादसा था।

उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने की घटना में कई लोग बह गए थे। देश में प्रतिदिन ऐसे मर्मातंक हादसे होते हैं मगर प्रकाश में नहीं आते। केन्द्र सरकार को मजदूरों के हित में कदम उठाने होगें तभी ऐसे मजदूर दिवसों की सार्थकता होगी। संयुक्त राष्ट्र के श्रम निकाय ने चेतावनी दी है कि कोरोना वायरस संकट के कारण भारत में अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 40 करोड़ लोग गरीबी में फंस सकते हैं और अनुमान है कि इस साल दुनिया भर में 19.5 करोड़ लोगों की पूर्णकालिक नौकरी छूट सकती है।

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