डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के लिए आंदोलन की शुरुआत करने वाले इंद्रमणि बड़ोनी को उत्तराखंड का गांधी यूं ही नहीं कहा जाता है, इसके पीछे उनकी महान तपस्या व त्याग रही है। राज्य आंदोलन को लेकर उनकी सोच और दृष्टिकोण को लेकर आज भी उन्हें शिद्दत से याद किया जाता है। इंद्रमणि बड़ोनी आज ही के दिन यानी 24 दिसंबर, 1925 को टिहरी जिले के जखोली ब्लॉक के अखोड़ी गांव में पैदा हुए थे। उनके पिता का नाम सुरेश चंद्र बडोनी था। साधारण परिवार में जन्मे बड़ोनी का जीवन अभावों में गुजरा। उनकी शिक्षा गांव में ही हुई। देहरादून से उन्होंने स्नातक की उपाधि हासिल की थी। वह ओजस्वी वक्ता होने के साथ ही रंगकर्मी भी थे। लोकवाद्य यंत्रों को बजाने में निपुण थे। इंद्रमणि बडोनी जब नेता के तौर पर उभर गए थे। वर्ष 1992 में मकर संक्रांति के दिन बागेश्वर के प्रसिद्ध उत्तरायणी कौतिक से उन्होंने उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण करने की घोषणा कर दी थी। हालांकि आज तक गैरसैंण स्थायी राजधानी नहीं बन सका। पहाड़ के लोग पहाड़ में ही राजधानी बनाने के लिए संषर्घरत हैं। इंद्रमणि बडोनी जब नेता के तौर पर उभर गए थे। वर्ष 1992 में मकर संक्रांति के दिन बागेश्वर के प्रसिद्ध उत्तरायणी कौतिक से उन्होंने उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण करने की घोषणा कर दी थी। हालांकि आज तक गैरसैंण स्थायी राजधानी नहीं बन सका। पहाड़ के लोग पहाड़ में ही राजधानी बनाने के लिए संषर्घरत हैं। इंद्रमणि बडोनी जब नेता के तौर पर उभर गए थे। वर्ष 1992 में मकर संक्रांति के दिन बागेश्वर के प्रसिद्ध उत्तरायणी कौतिक से उन्होंने उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण करने की घोषणा कर दी थी। हालांकि आज तक गैरसैंण स्थायी राजधानी नहीं बन सका। पहाड़ के लोग पहाड़ में ही राजधानी बनाने के लिए संषर्घरत हैं। तब उत्तराखंड क्षेत्र में बडोनी का कद बहुत ऊंचा हो चुका था। वह महान नेताओं में गिने जाने लगे। सबसे पहले वर्ष 1961 में अखोड़ी गांव में प्रधान बने। इसके बाद जखोली खंड के प्रमुख बने। इसके बाद देवप्रयाग विधानसभा सीट से पहली बार वर्ष 1967 में विधायक चुने गए। इस सीट से वह तीन बार विधायक चुने गए। हालांकि उन्होंने सांसद का भी चुनाव लड़ा था। कांटे की टक्कर हुई थी। अपने प्रतिद्वंद्वी ब्रहमदत्त से 10 हजार वोटों से हार गए थे। बड़ोनी के सपने को साकार होना है। बड़ोनी जैसे महान नेताओं ने राज्य को जो विजन दिया था, आज तक हमारे नेता उसे पूरा नहीं कर पाए। वह राज्य को समृद्ध बनाना चाहते थे। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, रोजगार को लेकर बहुत अधिक सजग रहा करते थे। आज 18 अगस्त को उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में ‘पहाड के गांधी’ के रूप में याद किए जाने वाले श्री इन्द्रमणि बडोनी जी की पुण्यतिथि है. मगर दुःख के साथ कहना पड़ता है कि उत्तराखंड की जनता के द्वारा इस जन नायक की पुण्यतिथि जिस कृतज्ञतापूर्ण हार्दिक संवेदनाओं के साथ मनाई जानी चाहिए उसका अभाव ही नजर आता है. इससे सहज में ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड की राजनीति आज किस प्रकार की विचारशून्य, स्वार्थपूर्ण और निराशा के दौर से विचरण कर रही है? इतिहास साक्षी है कि जो कौम या समाज अपने स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को भुला देता है, वह ज्यादा दिनों तक अपनी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर सकता.उत्तराखंड की सम्पूर्ण जनता अपने महानायक के पीछे लामबन्द हो गयी थी. बीबीसी ने तब कहा था, ‘‘यदि आपने जीवित एवं चलते फिरते गांधी को देखना है तो आप उत्तराखंड की धरती पर चले जायें. वहाँ गांधी आज भी अपनी उसी अहिंसक अन्दाज में विराट जन आंदोलनों का नेतृत्व कर रहा है.’’ श्री इन्द्रमणि बडोनी जी उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के मुख्य सूत्रधार थे. अगस्त का यह महीना वैसे भी स्वतंत्रता आंदोलन के वीर सेनानियों को उनके योगदान के लिए याद करने का विशेष महीना होता है. बडोनी जी के संदर्भ में अगस्त का महीना उनके राजनैतिक संघर्ष का खास महीना भी था. 2 अगस्त 1994 को उन्होंने पौड़ी प्रेक्षागृह के सामने आमरण अनशन का जन आंदोलन शुरू किया था और 7 अगस्त 1994 को उन्हें पहले मेरठ अस्पताल में और बाद में दिल्ली स्थित आयुर्विज्ञान संस्थान में जबरन भरती करवा दिया गया. इसी दौरान उत्तराखंड राज्य आन्दोलन पूरे पहाड में आग की तरह फैल चुका था. उत्तराखंड की सम्पूर्ण जनता अपने महानायक के पीछे लामबन्द हो गयी थी. बीबीसी ने तब कहा था, ‘‘यदि आपने जीवित एवं चलते फिरते गांधी को देखना है तो आप उत्तराखंड की धरती पर चले जायें. वहाँ गांधी आज भी अपनी उसी अहिंसक अन्दाज में विराट जन आंदोलनों का नेतृत्व कर रहा है.उत्तराखण्ड आंदोलन के प्रणेता इन्द्रमणि बडोनी राज्य निर्माण के लिए सन् 1980 में उत्तराखण्ड क्रांति दल में शामिल हुए. उन्हें पार्टी का संरक्षक बनाया गया.1989 से 1993 तक उन्होंने उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति के लिए पर्वतीय अंचलों में व्यापक स्तर पर जनसम्पर्क अभियान द्वारा जन जागृति की मुहिम चलाई और लोगों को अलग राज्य की लडाई लडने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया. पूरे पहाड़ में व्यापक आंदोलन शुरू होने के बाद तन मन धन से समर्पित बडोनी जी ने स्कूल कालेजों में आरक्षण व पंचायती सीमाओं के पुनर्निधारण नीति का विरोध करते हुए 2 अगस्त 1994 को कलेक्ट्रेट कार्यालय पर आमरण अनशन शुरू कर दिया. कालांतर में उनका यह अनशन उत्तराखण्ड आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ.उनके इसी आमरण अनशन ने आरक्षण के विरोध को उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन में बदल दिया. श्री इन्द्रमणि बडोनी जी को देवभूमि उत्तराखंड और अपनी संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम था. उत्तराखंड हिमालय भ्रमण के दौरान उन्होंने ही भिलंगना नदी के उद्गम स्थल खतलिंग ग्लेशियर को खोजा था. उनका सपना पहाड को आत्मनिर्भर राज्य बनाने का था और उन्ही के प्रयासों से इस क्षेत्र में दुर्लभ औषधियुक्त जडी बूटियों की बागवानी प्रारम्भ हुई. उनका सादा जीवन देवभूमि के संस्कारों का ही जीता-जागता नमूना था. वे चाहते थे कि इस पहाडी राज्य को यहां की भौगोलिक परिस्थिति व विशिष्ट सांस्कृतिक जीवन शैली के अनुरूप विकसित किया जाए.वर्ष 1958 में राजपथ पर गणतंत्र दिवस के अवसर पर बडोनी जी ने केदार नृत्य की ऐसी कलात्मक प्रस्तुति की थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी उनके साथ थिरक उठे थे. युग पुरुष इन्द्रमणि बडोनी जी हिमालय के समान दृढ निश्चयी,गंगा के समान निर्मल हृदय,नदियों और हरे भरे जंगलों की भांति परोपकारी वृत्ति के महा मानव थे. उत्तराखंड के इस सच्चे सपूत ने 72 वर्ष की उम्र में 1994 में राज्य निर्माण की निर्णायक लड़ाई लड़ी,जिसमें उनके अब तक के किये परिश्रम का प्रतिफल जनता के विशाल सहयोग के रूप में मिला. उस ऐतिहासिक जन आन्दोलन के बाद भी 1994 से अगस्त 1999 तक बडोनी जी उत्तराखंड राज्य के लिए जूझते रहे. मगर अनवरत यात्राओं और अनियमित खान-पान से कृषकाय देह का यह वृद्ध-गांधी बीमार रहने लगा. देहरादून के अस्पतालों, पी.जी.आई. चंडीगढ़ एवं हिमालयन इंस्टीट्यूट में इलाज कराते हुए भी मरणासन्न बडोनी जी हमेशा उत्तराखंड की बात करते थे. गुर्दों के खराब हो जाने से दो-चार बार के डायलिसिस के लिए भी उनके पास धन का अभाव हो गया था. मातृभूमि की प्राणपण से सेवा करते-करते 18 अगस्त 1999 को उत्तराखंड का यह सपूत अनंत यात्रा की तरफ महाप्रयाण कर गया. इसे भी हमारा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिस राज्य के लिए बडोनी जी ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया उसके अस्तित्व में आने से पहले ही वह हमें नेतृत्व विहीन करके चला गया.आज हमारे बीच बडोनी जी जैसे नेता होते तो उत्तराखंड की ऐसी दुर्दशा नहीं होती. उत्तराखंड की ‘अगस्त क्रांति’ के इस जननायक को उनकी पुण्यतिथि पर हम समस्त उत्तराखंडवासी अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. उत्तराखंड के गाँधी कहे जाने वाले महान जननायक इंद्र मणि बडोनी की पुण्यतिथि पहाड़ के इस गांधी को कोटि कोटि नमन!!लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











