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प्लास्टिक कचरे ने बढ़ाई चिंता

06/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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*प्लास्टिक कचरे ने बढ़ाई चिंता* डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला केदारनाथ धाम में इस वर्ष आस्था अपने चरम पर है. 22 अप्रैल को कपाट खुलने के बाद से 4 मई तक 3 लाख 35 हजार से अधिक श्रद्धालु बाबा केदार के दर्शन कर चुके हैं. प्रतिदिन हजारों की संख्या में भक्त धाम पहुंच रहे हैं. जहां एक ओर श्रद्धा का यह अभूतपूर्व सैलाब नए रिकॉर्ड बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है.पवित्र मंदाकिनी नदी, जो इस धाम की जीवनरेखा मानी जाती है, आज प्लास्टिक प्रदूषण के बोझ तले कराहती नजर आ रही है. यात्रा मार्ग और पड़ावों पर फैला प्लास्टिक कचरा न केवल प्राकृतिक सौंदर्य को प्रभावित कर रहा है, बल्कि इसे सीधे नदी में फेंके जाने की घटनाएं स्थिति को और भी भयावह बना रही हैं. इस चुनौती से निपटने के लिए सुलभ इंटरनेशनल के 400 से अधिक सफाई कर्मी सीतापुर से केदारनाथ तक लगातार सफाई व्यवस्था में जुटे हुए हैं. सोनप्रयाग में प्लास्टिक कचरे को कॉम्पैक्ट करने के लिए विशेष मशीनें लगाई गई हैं, जहां अब तक लगभग 7 टन प्लास्टिक कचरे को प्रोसेस कर रीसाइक्लिंग के लिए भेजा जा चुका है. इसके अतिरिक्त, गीले कचरे को प्रतिदिन 5 से 6 डंपरों के माध्यम से रुद्रप्रयाग स्थित डंपिंग जोन तक पहुंचाया जा रहा है.हालांकि, प्रशासन और सफाई कर्मियों की यह मुस्तैदी सराहनीय है, लेकिन कुछ स्थानीय व्यापारियों और असामाजिक तत्वों की लापरवाही इस पूरे प्रयास पर भारी पड़ती दिख रही है. यात्रा मार्ग पर संचालित कई दुकानों, ढाबों और छोटे कारोबारियों द्वारा प्लास्टिक का अंधाधुंध उपयोग और कचरे का अनुचित निस्तारण समस्या को लगातार बढ़ा रहा है. मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी ने सख्त रुख अपनाया है. उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि मंदाकिनी नदी को प्रदूषित करने वाले किसी भी व्यक्ति या व्यापारी को बख्शा नहीं जाएगा. साथ ही तीर्थ यात्रियों से भी अपील की गई है कि वे कचरे को निर्धारित कूड़ेदानों में डालकर स्वच्छता बनाए रखने में सहयोग करें.यह स्थिति न केवल प्रशासन के लिए, बल्कि प्रत्येक श्रद्धालु और स्थानीय नागरिक के लिए भी एक बड़ी जिम्मेदारी का संकेत है. यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आस्था का यह महापर्व पर्यावरणीय संकट का रूप ले सकता है.केदारनाथ धाम की पवित्रता और प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए अब केवल प्रशासनिक सख्ती ही नहीं, बल्कि जनभागीदारी और जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है, ताकि आस्था और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे. केदारनाथ यात्रा 2026 में अब तक तीन लाख से ज्यादा श्रद्धालु बाबा के दरबार में पहुंच चुके हैं. जहां एक ओर आस्था का सैलाब उमड़ा है, वहीं दूसरी ओर प्लास्टिक कचरे ने पर्यावरण को लेकर चिंता बढ़ा दी है. यात्रा मार्ग पर सफाई कर्मी मुस्तैद हैं, लेकिन लापरवाही से मंदाकिनी नदी तक कचरा पहुंच रहा है. प्रशासन और सफाई कर्मचारियों की पूरी कोशिश के बावजूद कुछ लोगों की लापरवाही पूरे सिस्टम को कमजोर कर रही है. अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह पवित्र यात्रा पर्यावरणीय संकट का रूप ले सकती है. केदारनाथ धाम की पवित्रता और प्राकृतिक संतुलन बचाने के लिए अब केवल प्रशासन ही नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं और व्यापारियों की भी जिम्मेदारी बनती है. सफाई व्यवस्था में तैनात अधिकारी व्यापारियों, तीर्थयात्रियों व स्थानीय लोगों को सफाई के प्रति जागरूक कर रहे हैं. गंदगी फैलाने वालों के चालान काटे जा रहे हैं, जिससे लोग जागरूक हो सकें और गंदगी न फैलाएं. केदारनाथ मंदिर परिसर, मंदिर के सामने पैदल मार्ग, घाट, आस्था पथ, बैस कैंप, मंदाकिनी व अलकंनदा घाट समेत सभी स्थानों पर सफाई व्यवस्था दिखने लगी है. अब कूड़ा केवल कूडे़ दान में ही नजर आ रहा है. सफाई व्यवस्था में नगर पंचायत, सुलभ इंटरनेशनल व जिला पंचायत को भी जिम्मेदारियां सौंपी गई है, जो प्रत्येक दिन डीएम को रिपोर्ट कर रहे हैं. मंदाकिनी नदी को प्रदूषित करने वाले किसी भी व्यक्ति या व्यापारी को बख्शा नहीं जाएगा. साथ ही तीर्थ यात्रियों से भी अपील की गई है कि वे कचरे को निर्धारित कूड़ेदानों में डालकर स्वच्छता बनाए रखने में सहयोग करें.यह स्थिति न केवल प्रशासन के लिए, बल्कि प्रत्येक श्रद्धालु और स्थानीय नागरिक के लिए भी एक बड़ी जिम्मेदारी का संकेत है. यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आस्था का यह महापर्व पर्यावरणीय संकट का रूप ले सकता है.केदारनाथ धाम की पवित्रता और प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए अब केवल प्रशासनिक सख्ती ही नहीं, बल्कि जनभागीदारी और जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है, ताकि आस्था और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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