डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड शब्द जेहन में आते ही देवभूमि, मंदिर, पहाड़, घास के बुग्याल, खूबसूरत और घने पहाड़, नदियां, झरने यही आते हैं न दिमाग में. इसके इतर इस रिपोर्ट में जरा यहां के खूबसूरत तालों का भी रुख कर लेते हैं, जो अपनी खूबसूरती, बनावट, धार्मिक मान्यता के लिए मशहूर होते ही हैं लेकिन यहां ट्रेकिंग कर पहुंचना भी पहाड़ तोड़ने से कम नहीं होता है.उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में वासुकी ताल खूबसूरत झील है. यहां केदारनाथ से 8 किमी की दूरी पार कर पहुंचा जाता है. यहां पहुंचने के लिए मंदाकिनी तट से लगे पुराने घोड़ा पड़ाव से होते हुए दूध गंगा के उद्धम की ओर सीधी चढ़ाई पार कर पहुंचा जाता है. ट्रेक की सबसे ऊंचाई वाली जगह जय विजय चोटी (धार) है. जहां से लगभग 200 मीटर उतरकर झील दिखाई देती है, लेकिन इसके आगे का 2 किलोमीटर का सफर बहुत कठिन है, जहां तक कम ही लोग पहुंच पाते हैं.वासुकी ताल को ‘लैंड ऑफ ब्रह्मकमल’ भी कहा जाता है और सावन के महीने में भोलेनाथ को यहीं से लाए गए ब्रह्मकमल चढ़ाए जाते हैं. इन्हें लेने के लिए केदारनाथ से ब्राह्मण नंगे पांव वासुकी ताल पहुंचते हैं और केदारनाथ धाम वापस लौट कर इन्हे भोलेनाथ के चरणों में चढ़ाते हैं. स्कंद पुराण में ताल में बारे में बताया गया है कि श्रावण मास की पूर्णमासी के दिन इस ताल में मणि युक्त वासुकी नाग के दर्शन होते हैं. वासुकी ताल की परिधि लगभग 700 मीटर है. इस तालाब केे पानी से सोन नदी निकलती है. यही सोन नदी, केदारनाथ से निकलने वाली मंदाकिनी से सोनप्रयाग नामक स्थान में मिलती है. वासुकी ताल का पानी बिल्कुल साफ है, हवा के बहाव के साथ पानी में खूबसूरती के साथ बनती तरंगे बेहद खूबसूरत लगती हैं, जिसे देखने के लिए ट्रेकर्स यहां पहुंचते हैं. वासुकी ताल का नाम भगवान विष्णु से जुड़ा है जिस हिमालय की गोद में पहुंचकर लोग सुकून, शांति और प्राकृतिक सुंदरता का अनुभव करने आते हैं, उसी हिमालय की पवित्र धरोहर को इंसान अपने हाथों से कचरे के ढेर में तब्दील करने पर आमादा है. बाबा केदारनाथ की धरती पर भी प्लास्टिक प्रदूषण का कहर नहीं थम रहा है. समुद्र तल से करीब 14,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित वासुकी ताल में प्लास्टिक कचरे का अंबार पर्यावरण संरक्षण के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.केदारनाथ धाम से लगभग 8 से 10 किलोमीटर की कठिन पैदल दूरी तय कर पहुंचने वाले कुछ पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद तो ले रहे हैं, लेकिन अपने पीछे प्लास्टिक की बोतलें, खाद्य पदार्थों के पैकेट और अन्य कचरा छोड़कर हिमालय की अनमोल विरासत को प्रदूषित कर रहे हैं. विडंबना देखिए कि जिस दुर्गम क्षेत्र तक पहुंचने के लिए लोगों को कई किलोमीटर की कठिन चढ़ाई चढ़नी पड़ती है, वहां तक प्लास्टिक कचरा पहुंच रहा है, लेकिन उसे वापस लाने की जिम्मेदारी उठाने वाला कोई दिखाई नहीं दे रहा. वासुकी ताल की मौजूदा स्थिति प्रकृति के प्रति बढ़ती लापरवाही और जिम्मेदार तंत्र की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है. इस गंभीर तस्वीर के बीच स्थानीय जागरूक युवक ने सराहनीय पहल करते हुए स्वयं वासुकी ताल पहुंचकर सफाई की जिम्मेदारी उठाई. उन्होंने वहां बिखरे प्लास्टिक कचरे को एकत्रित कर लोगों को यह संदेश दिया कि हिमालय केवल पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि हमारी प्राकृतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत है. इसकी रक्षा करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है.देवशाली ने पर्यटकों से दो टूक अपील की कि वासुकी ताल की यात्रा पर आने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ ले जाए गए प्लास्टिक, पानी की बोतलें, खाद्य सामग्री के पैकेट और अन्य कचरे को वापस लेकर आए. प्रकृति को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी केवल सरकारी विभागों की नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की है जो हिमालय की सुंदरता का लाभ उठाता है.उन्होंने वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा की भयावह त्रासदी का उल्लेख करते हुए कहा कि हिमालय की संवेदनशीलता को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. प्रकृति के साथ खिलवाड़ के परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं, केदारघाटी इसका दर्दनाक उदाहरण देख चुकी है. ऐसे में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में अनियंत्रित प्लास्टिक प्रदूषण को हल्के में लेना भविष्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है. केदारनाथ वन प्रभाग से वासुकी ताल क्षेत्र में नियमित निगरानी, प्लास्टिक कचरा वापस लाने की प्रभावी व्यवस्था, पर्यटकों को जागरूक करने और प्रतिबंधित प्लास्टिक के उपयोग पर सख्ती से रोक लगाने की मांग की है. उन्होंने नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करने की आवश्यकता जताई. वासुकी ताल में प्लास्टिक कचरे के निस्तारण को लेकर संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए जाएंगे. धार्मिक स्थलों को प्लास्टिक मुक्त रखने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं. हिमालय की संवेदनशीलता को किसी भी हाल में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रकृति के साथ खिलवाड़ और पर्यावरण की अनदेखी के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। ऐसे में हिमालयी क्षेत्रों में पर्यटन के साथ पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। देवशाली ने इस मामले में केदारनाथ वन प्रभाग से भी ठोस कार्रवाई करने की मांग उठाई है। उन्होंने वासुकी ताल क्षेत्र में नियमित निगरानी, कचरा वापस लाने की व्यवस्था, प्लास्टिक प्रतिबंध का प्रभावी पालन और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने की आवश्यकता जताई। सवाल यह है कि आखिर 14,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित हिमालय की इस अनमोल धरोहर को प्लास्टिक के ढेर में तब्दील होने से कौन बचाएगा? अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में वासुकी ताल की प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरण को अपूरणीय नुकसान पहुंच सकता है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














