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रामलीला उत्तराखंड की एक समृद्ध परंपरा

24/09/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

जय राम रमा रमनं समनं, भवताप भयाकुल पाहि जनं।
अवधेशसुरेशरमेशविभो, शरनागतमांगतपाहिप्रभो।

सांस्कृतिक परम्परा की दृष्टि सेउत्तराखण्ड एक समृद्ध राज्य है। समय- समय पर यहां के कई इलाकों में अनेक पर्व और उत्सव मनाये जाते हैं। लोकऔर धर्म सेजुड़े इन उत्सवों की आस्था समाज के साथ बहुत गहराई से जुड़ी है। उत्तराखण्ड केकुमाऊं अंचल कीरामलीला और होली का इस सन्दर्भ में विशेष महत्व है।कुमाऊं अंचल मेंरामलीला नाटक केमंचन की परंपरा का इतिहास 160 साल से अधिक पुराना है।उत्तराखंड की सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में साल 1860 से शुरू हुई कुमाऊंनी रामलीला का अपना विशेष महत्व है. रामचरित्र मानस पर आधारित रामलीला का मंचन यहां लगातार चलता आ रहा है. जिसमें शास्त्रीय रागों पर आधारित गीतों का गायन के साथ रामलीला के पात्र स्वयं अभिनय करते हैं. अल्मोड़ा के नंदा देवी के मंदिर में होने वाली रामलीला सबसे पुरानी रामलीला है.गायन एवं नाट्य शैली पर इस रामलीला का मंचन सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा के बद्रेश्वर मंदिर से प्रारंभ हुआ. इस दौर में ना तो बिजली व संचार व्यवस्था थी ना ही पर्याप्त आवागमन के साधन थे. रामलीला का मंचन छिलकों (बिरोजा युक्त लकड़ी) की मशाल बनाकर किया जाता था. कुमाऊं में रामलीला नाटक के मंचन की सर्वप्रथम शुरुआत 1860 में अल्मोड़ा नगर के बीचों बीच बद्रेश्वर से हुई. जिसे तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर स्व. देवीदत्त जोशी ने करवाया. इस रामलीला का मंचन रामचरितमानस पर आधारित था. कई वर्षों तक इस रामलीला का मंचन इसी स्थान पर होता रहा. लेकिन जानकारों के अनुसार, वर्ष 1950 के बाद भूमि विवाद होने से इस रामलीला का मंचन नंदा देवी के पास स्थित त्यूनरा मोहल्ले में होने लगा. उसके बाद से इसका मंचन नंदा देवी के प्रांगण में लगातार होता आ रहा है. यह उत्तराखंड की सबसे पुरानी रामलीला है. नंदा देवी की रामलीला से जुड़े अनेक लोगों ने अपने-अपने मोहल्लों में इस रामलीला का मंचन प्रारंभ किया. आज यह रामलीला अल्मोड़ा नगर के आठ स्थानों पर होने के साथ-साथ कुमाऊं के अन्य कस्बों में भी की जाती है. महानगरों में रहने वाले कुमाऊं के लोग इस रामलीला का मंचन महानगरों में भी कराने लगे हैं. नगरीय क्षेत्रों की रामलीला को आकर्षक बनाने में नवीनतम तकनीक, साज सज्जा, रोशनी व आधुनिक ध्वनि विस्तारक यंत्रों का उपयोग किया जाने लगा है. कुमाऊंनी रामलीला से प्रभावित होकर अल्मोड़ा में साल 1940-41 के दौरान नृत्य सम्राट पं. उदयशंकर ने भी रामलीला का मंचन किया. उन्होंने अल्मोड़ा में इस रामलीला में छाया चित्रों का प्रयोग कर नवीनता लाने का प्रयास किया. हालांकि उनकी मंचन शैली कई मायनों में अलग रही, लेकिन उनके छाया चित्रों की छाप अल्मोड़ा नगर की रामलीला पर पड़ी. जिसके बाद रामलीला में छाया चित्रों का प्रयोग कर रामलीला को और मनमोहक बनाया जाने लगा. इस दौरान उदय शंकर ने पातालदेवी में अपनी नृत्य मंडली भी स्थापित की.  कुमाऊं की रामलीला की विशेषता है कि रामलीला के मंचन में नाटक मंडली के लोग ही नहीं, बल्कि स्थानीय आम लोग विभिन्न पात्रों का अभिनय करते हैं, जो तीन माह की प्रशिक्षण में दक्षता प्राप्त कर भगवान श्रीराम की लीला में अभिनय करते हैं. वहीं, मंच निर्माण से लेकर आर्थिक संसाधनों को जुटाने में भी रामलीला मंचन से जुड़े लोगों की मुख्य भूमिका रहती है. कुमाऊंनी रामलीला में नारद मोह, सीता स्वयंवर, परशुराम-लक्ष्मण संवाद, दशरथ कैकई संवाद, रावण मारीच संवाद, सीता हरण, शबरी प्रसंग, लक्ष्मण शक्ति, अंगद रावण संवाद, मंदोदरी-रावण संवाद व राम-रावण युद्ध के प्रसंग मुख्य आकर्षण होते हैं. इस दौरान रामलीला मैदानों में रामलीला को देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं. रामलीला मैदान में दर्शकों की भीड़ लगी रहती है. शारदीय नवरात्र में होने वाली 10 दिनों की रामलीला के मंचन में करीब 65 पात्रों की आवश्यकता पड़ती है. जो राम, लक्ष्मण, सीता, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान, दशरथ, कैकेयी, कौशल्या, सुमित्रा, परशुराम, सुमन्त, शूर्पणखा, जटायु, निषादराज, अंगद, शबरी, मन्थरा, मेघनाद, कुंभकर्ण, विभीषण के अभिनय के लिए होते हैं. अल्मोड़ा की रामलीला में पारंपरिक संगीत, नृत्य, और संवादों के माध्यम से रामायण की कथा को जीवित किया जाता है। साथ ही इसके मंचन का तरीका पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को समेटे हुए है। वहीं इस मौके पर रंगकर्मी ने बताया कि अल्मोड़ा की रामलीला ऐतिहासिक है। उन्होंने ने कहा कि अल्मोड़ा में रामलीला को 1860 के दशक में शुरू किया गया था। बताया गया कि वर्षों से चली आ रही प्रथा को जिले में पारंपरिक,धार्मिक और सांस्कृतिक रूप में समेटा हुआ है।वहीं इस बार की रामलीला में जनपद की महिलाओं व युवतियों को प्रतिभाग के लिए प्रोत्साहित किया गया है।सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में रामलीला की छटा देखते ही बनती है। आज भी नंदादेवी, रधुनाथ मंदिर, धारानौला, मुरलीमोहन, ढूंगाधारा, कर्नाटकखोला, खोल्टा, पांडेखोला, नारायण तेवाड़ी देवाल और खत्याड़ी में रामलीलाओं का आयोजन बड़े उत्साह के साथ होता है। अल्मोड़ा शहर में लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब) की रामलीला का आकर्षण शहर की अन्य रामलीलाओं से अलग होता है। दशहरे के दौरान शहर की विभिन्न कमेटियों द्वारा बनाए गए डेढ़ दर्जन से अधिक रावण परिवार के पुतलों को बड़े उत्साह के साथ बाजार में घुमाया जाता है। अल्मोड़ा का दशहरा अब एक सांस्कृतिक मेले का रूप ले चुका है। इन पुतलों को देखने के लिए शहर में लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है।स्वर्गीय पंडित रामदत्त जोशी, ज्योतिषाचार्य स्वर्गीय बद्रीदत्त जोशी, स्वर्गीय कुंदनलाल साह, स्वर्गीय नंदकिशोर जोशी, स्वर्गीय बांकेलाल साह, नृत्य सम्राट स्वर्गीय पंडित उदय शंकर और स्वर्गीय ब्रजेंद्रलाल साह सहित कई अन्य दिवंगत व्यक्तियों और कलाकारों ने कुमाऊँ क्षेत्र की रामलीला को बढ़ावा देने में अद्वितीय योगदान दिया है। 1970 और 80 के दशक में लखनऊ आकाशवाणी के उत्तरायण कार्यक्रम ने भी कुमाऊँ क्षेत्र की रामलीला को प्रसारित करके इसके प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वर्तमान में, कई रंगकर्मी पारंपरिक कुमाऊँनी रामलीला के संरक्षण और संवर्धन के कार्य में लगे हुए हैं।उत्तराखंड की पहाड़ियों में बसा कुमाऊँ क्षेत्र इसका एक उदाहरण है। दिलचस्प बात यह है कि कुमाऊँ की रामलीला 150 साल पुरानी है, जिसकी वजह से यूनेस्को ने इसे दुनिया का सबसे लंबे समय तक चलने वाला ओपेरा घोषित किया है। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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