ने के बादडॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर रामपुर बाजार के समीप स्थित संवेदनशील भू-धंसाव जोन में करोड़ों रुपये की लागत से किए गए सुरक्षा कार्यों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. पहली ही बारिश में सुरक्षा कार्य का हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया, जिससे मिट्टी धंसने के साथ क्रेट वायर भी ढह गया. घटना के बाद स्थानीय ग्रामीणों और व्यापारियों में भारी नाराजगी है.रामपुर बाजार के समीप पिछले दो वर्षों से अधिक समय से भू-धंसाव प्रभावित क्षेत्र में सुरक्षा कार्य किए जा रहे हैं. हाल ही में मार्च-अप्रैल माह में सुरक्षा दीवार और क्रेट वायर का निर्माण कराया गया था, लेकिन जून के प्रथम सप्ताह में हुई बारिश ने ही इन कार्यों की पोल खोल दी. सड़क किनारे की मिट्टी धंसने से क्रेट वायर क्षतिग्रस्त हो गई और भू-धंसाव का खतरा एक बार फिर बढ़ गया है. घटना के समय सड़क किनारे कुछ वाहन खड़े थे. गनीमत रही कि बड़ा हादसा नहीं हुआ. हालांकि वाहनों के पहिए मिट्टी में धंस गए थे, जिन्हें समय रहते सुरक्षित निकाल लिया गया.ग्रामीणों का आरोप है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सुरक्षा कार्य टिकाऊ साबित नहीं हो पा रहे हैं. उनका कहना है कि एक वर्ष पूर्व नदी किनारे बनाई गई सुरक्षा दीवार भी पहली ही बरसात में क्षतिग्रस्त हो गई थी और अब हाल ही में किए गए कार्य भी शुरुआती बारिश नहीं झेल पा रहे हैं. पूर्व ग्राम प्रधान न्यालसू ने कहा कि सरकार सुरक्षा कार्यों के लिए धनराशि स्वीकृत कर रही है, लेकिन संबंधित विभाग और कार्यदायी संस्था की लापरवाही के कारण जनता और यात्रियों को परेशानी उठानी पड़ रही है. यदि समय रहते प्रभावी उपचार नहीं किया गया तो भू-धंसाव का असर मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग तक पहुंच सकता है, जिससे यातायात भी प्रभावित हो सकता है.स्थानीय व्यवसायी ने भी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए कहा कि हाल ही में किए गए सुरक्षा कार्य पहली ही बारिश में ढह गए, जो गंभीर चिंता का विषय है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद रामपुर बाजार और केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर भू-धंसाव का खतरा लगातार बना रहेगा. यदि समय रहते प्रभावी उपचार नहीं किया गया तो भू-धंसाव का असर मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग तक पहुंच सकता है, जिससे यातायात भी प्रभावित हो सकता है.स्थानीय व्यवसायी ने भी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए कहा कि हाल ही में किए गए सुरक्षा कार्य पहली ही बारिश में ढह गए, जो गंभीर चिंता का विषय है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद रामपुर बाजार और केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर भू-धंसाव का खतरा लगातार बना रहेगा केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग उत्तराखण्ड में उच्च हिमालय पर स्थित चौखुटिया,पिथौरागढ़ केदारनाथ,जोशीमठ जैसे अत्यंत संवेदनशील इलाके बहुतायत से हैं,जहां बादल फटने,पहाड़ खिसकने, जैसी भूमि स्खलन की घटनाएं आए दिन अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं और भारी मात्रा में हर साल जान और माल का नुकसान भी होता आया है. मगर इन संवेदनशील इलाकों की सुरक्षा का कोई स्थायी इंतजाम नहीं किया गया है. प्रतिवर्ष प्राकृतिक आपदाओं की त्रासदियां झेलने के लिए यहां की जनता मानो विवश है. हिमालय के पर्यावरण की परिस्थितियों के अनुरूप ताल मेल रख कर आर्थिक विकास का मॉडल यहां की राज्य सरकार के पास नहीं हैउत्तराखण्ड राज्य के गठन के बाद पिछली अनेक राज्य सरकारों ने हिमालय के प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट मचाने वाली पर्यावरण विरोधी योजनाओं को जो राजनैतिक संरक्षण प्रदान किया है, उससे हिमालय क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं का कहर बढता ही गया है और आम जनता यहां से पलायन के लिए मजबूर हुई है. अंधाधुन्ध वनों की कटाई, डायनामाइट विस्फोट से हिमालय की गिरि कन्दराओं की तोड़-फोड़ करने, खनन माफियों द्वारा पहाड़ों की जड़ों को खोदने और विशालकाय बांधों की पर्यावरण विरोधी योजनाओं के कारण समूचे हिमालय पर्यावरण की पारिस्थिकी आज निरन्तर रूप से बिगड़ती जा रही है. उत्तराखण्ड राज्य की इसी पर्यावरण विरोधी गलत अन्ध-विकासवादी नीतियों का ही दुष्परिणाम है कि पहाड़ के पर्यावरण मित्र परम्परागत उद्योग धन्धे तथा आजीविका के साधन यहां से लुप्त होते जा रहे हैं और पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाने वाले बाहर से लाए गए उद्योग-धंधे यहां फल-फूल रहे हैं.आज समूचे देश को जल,वनस्पति और मौसमी ऋतुएं प्रदान करने वाले हिमालय पर्यावरण को बचाने और उत्तराखण्ड राज्य में रहने वाले नागरिकों के अस्तित्व की रक्षा करने के लिए बहुत जरूरी हो गया है कि भूकंप,बादल फटने जैसी आपदाओं से उत्तराखंड हिमालय और वहां बसने वाली जनता के मौलिक मानवाधिकारों की रक्षा की जाए, जिनकी मुख्य जिम्मेदारी यहां के राज्य सरकार की है. इसके लिए हिमालय के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना तथा पर्यावरणवादी विकास योजनाओं को भी अमल में लाए जाने की आज खास जरूरत है.उत्तराखण्ड में उच्च हिमालय पर स्थित चौखुटिया,पिथौरागढ़ केदारनाथ,जोशीमठ जैसे अत्यंत संवेदनशील इलाके बहुतायत से हैं,जहां बादल फटने,पहाड़ खिसकने, जैसी भूमि स्खलन की घटनाएं आए दिन अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं और भारी मात्रा में हर साल जान और माल का नुकसान भी होता आया है. मगर इन संवेदनशील इलाकों की सुरक्षा का कोई स्थायी इंतजाम नहीं किया गया है. प्रतिवर्ष प्राकृतिक आपदाओं की त्रासदियां झेलने के लिए यहां की जनता मानो विवश है. हिमालय के पर्यावरण की परिस्थितियों के अनुरूप ताल मेल रख कर आर्थिक विकास का मॉडल यहां की राज्य सरकार के पास नहीं है.उत्तराखण्ड राज्य के गठन के बाद पिछली अनेक राज्य सरकारों ने हिमालय के प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट मचाने वाली पर्यावरण विरोधी योजनाओं को जो राजनैतिक संरक्षण प्रदान किया है, उससे हिमालय क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं का कहर बढता ही गया है और आम जनता यहां से पलायन के लिए मजबूर हुई है. अंधाधुन्ध वनों की कटाई, डायनामाइट विस्फोट से हिमालय की गिरि कन्दराओं की तोड़-फोड़ करने, खनन माफियों द्वारा पहाड़ों की जड़ों को खोदने और विशालकाय बांधों की पर्यावरण विरोधी योजनाओं के कारण समूचे हिमालय पर्यावरण की पारिस्थिकी आज निरन्तर रूप से बिगड़ती जा रही है. उत्तराखण्ड राज्य की इसी पर्यावरण विरोधी गलत अन्ध-विकासवादी नीतियों का ही दुष्परिणाम है कि पहाड़ के पर्यावरण मित्र परम्परागत उद्योग धन्धे तथा आजीविका के साधन यहां से लुप्त होते जा रहे हैं और पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाने वाले बाहर से लाए गए उद्योग-धंधे यहां फल-फूल रहे हैं.आज समूचे देश को जल,वनस्पति और मौसमी ऋतुएं प्रदान करने वाले हिमालय पर्यावरण को बचाने और उत्तराखण्ड राज्य में रहने वाले नागरिकों के अस्तित्व की रक्षा करने के लिए बहुत जरूरी हो गया है कि भूकंप,बादल फटने जैसी आपदाओं से उत्तराखंड हिमालय और वहां बसने वाली जनता के मौलिक मानवाधिकारों की रक्षा की जाए, जिनकी मुख्य जिम्मेदारी यहां के राज्य सरकार की है. इसके लिए हिमालय के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना तथा पर्यावरणवादी विकास योजनाओं को भी अमल में लाए जाने की आज खास जरूरत है.।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











