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विदेशी भी सीख रहे उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन के गुर

07/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड एक बार फिर आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना रहा है. प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील माने जाने वाले इस हिमालयी राज्य ने पिछले वर्षों में आपदा प्रबंधन और राहत कार्यों में जो अनुभव और विशेषज्ञता हासिल की है, वह अब देश ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों के लिए भी अध्ययन का विषय बन गई है. यही वजह है कि विदेशी प्रतिनिधिमंडल भी उत्तराखंड पहुंचकर यहां विकसित की गई आपदा प्रबंधन व्यवस्थाओं और तकनीकों को समझने का प्रयास कर रहे हैं.मानसून सीजन की दस्तक से पहले उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन से जुड़े इंतजामों को और मजबूत किया जा रहा है. इसी बीच श्रीलंका का एक प्रतिनिधिमंडल राज्य में पहुंचा है, जो उत्तराखंड की आपदा प्रबंधन प्रणाली, राहत एवं बचाव कार्यों और विभिन्न आपदाओं के दौरान अपनाई जाने वाली रणनीतियों का अध्ययन कर रहा है. यह प्रतिनिधिमंडल मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के माध्यम से राज्य के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा करेगा और आपदा प्रबंधन से जुड़े कार्यों को करीब से समझेगा.उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां इसे प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील बनाती हैं.उत्तराखंड एक बार फिर आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना रहा है. प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील माने जाने वाले इस हिमालयी राज्य ने पिछले वर्षों में आपदा प्रबंधन और राहत कार्यों में जो अनुभव और विशेषज्ञता हासिल की है, वह अब देश ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों के लिए भी अध्ययन का विषय बन गई है. यही वजह है कि विदेशी प्रतिनिधिमंडल भी उत्तराखंड पहुंचकर यहां विकसित की गई आपदा प्रबंधन व्यवस्थाओं और तकनीकों को समझने का प्रयास कर रहे हैं.मानसून सीजन की दस्तक से पहले उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन से जुड़े इंतजामों को और मजबूत किया जा रहा है. इसी बीच श्रीलंका का एक प्रतिनिधिमंडल राज्य में पहुंचा है, जो उत्तराखंड की आपदा प्रबंधन प्रणाली, राहत एवं बचाव कार्यों और विभिन्न आपदाओं के दौरान अपनाई जाने वाली रणनीतियों का अध्ययन कर रहा है. यह प्रतिनिधिमंडल मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के माध्यम से राज्य के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा करेगा और आपदा प्रबंधन से जुड़े कार्यों को करीब से समझेगा.उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां इसे प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील बनाती हैं. हर साल मानसून के दौरान भूस्खलन, बादल फटना, अतिवृष्टि, सड़क बाधित होना और नदी-नालों में उफान जैसी घटनाएं सामने आती हैं. इसके अलावा राज्य भूकंप और ग्लेशियर संबंधी जोखिमों के लिहाज से भी संवेदनशील माना जाता है. लगातार ऐसी चुनौतियों का सामना करते हुए राज्य ने आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण प्रयोग किए हैं और अपनी व्यवस्थाओं को समय के साथ मजबूत बनाया है. राज्य सरकार, आपदा प्रबंधन विभाग, जिला प्रशासन, पुलिस, एसडीआरएफ और अन्य एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय ने उत्तराखंड को आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक मॉडल राज्य के रूप में स्थापित करने में मदद की है.आधुनिक तकनीक का उपयोग, त्वरित राहत एवं बचाव अभियान, संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी और समय पर चेतावनी प्रणाली जैसे प्रयासों ने राज्य की कार्यक्षमता को और बेहतर बनाया है. उत्तराखंड लगातार विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित होता रहा है. इन परिस्थितियों ने राज्य को नए प्रयोग करने और बेहतर व्यवस्थाएं विकसित करने के लिए प्रेरित किया. राज्य में विकसित की गई तकनीकों और व्यवस्थाओं को देखने तथा समझने के लिए देश और दुनिया के कई हिस्सों से प्रतिनिधिमंडल पहुंच रहे हैं. साथ ही उत्तराखंड भी अन्य देशों और राज्यों में अपनाई जा रही आधुनिक तकनीकों एवं नवाचारों को सीखने का प्रयास कर रहा है. ज्ञान और अनुभवों का यह आदान-प्रदान भविष्य में आपदाओं से बेहतर तरीके से निपटने में मददगार साबित होगा. बदलते जलवायु परिदृश्य और बढ़ती प्राकृतिक चुनौतियों के बीच यह सहयोग और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है. यही कारण है कि अब केवल श्रीलंका ही नहीं बल्कि कई अन्य देशों के प्रतिनिधिमंडल भी उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन की व्यवस्थाओं को समझने के लिए पहुंच रहे हैं. हाल के वर्षों में नॉर्वे, नेपाल और भूटान जैसे देशों के प्रतिनिधि भी उत्तराखंड का दौरा कर चुके हैं. इन देशों की भौगोलिक परिस्थितियां भी काफी हद तक पर्वतीय हैं, इसलिए वे उत्तराखंड के अनुभवों और यहां विकसित की गई व्यवस्थाओं से सीख लेने में रुचि दिखा रहे हैं.विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के अलावा देश के विभिन्न राज्यों के अधिकारी और विशेषज्ञ भी उत्तराखंड के मॉडल का अध्ययन कर चुके हैं. हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक समेत कई राज्यों के प्रतिनिधिमंडल यहां आकर आपदा प्रबंधन की बेस्ट प्रैक्टिस को समझने और अपने राज्यों में लागू करने की दिशा में काम कर रहे हैं.विभिन्न सेमिनारों, कार्यशालाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से राज्य अपने अनुभव साझा कर रहा है.आपदा प्रबंधन केवल राहत और बचाव कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पूर्व तैयारी, जोखिम कम करना, जागरूकता बढ़ाना और आपदा के बाद पुनर्वास जैसे महत्वपूर्ण पहलू भी शामिल हैं. उत्तराखंड ने इन सभी क्षेत्रों में लगातार काम किया है और इसी का परिणाम है कि राज्य की व्यवस्थाओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिल रही है.उत्तराखंड ने बीते वर्षों में कई बड़ी आपदाओं का सामना किया है, जिनकी चर्चा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई. इन आपदाओं से मिले अनुभवों ने राज्य को आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में अधिक सक्षम और सजग बनाया है. आज राज्य न केवल आपदाओं से निपटने की तैयारी कर रहा है, बल्कि भविष्य में संभावित खतरों को कम करने के लिए भी दीर्घकालिक योजनाओं पर काम कर रहा है.यही कारण है कि उत्तराखंड अब केवल आपदा प्रभावित राज्य के रूप में नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के क्षेत्र में एक सीख देने वाले मॉडल के रूप में उभर रहा है प्राकृतिक आपदाओं और वर्षा जनित संकटों की दृष्टि से बेहद संवेदनशील उत्तराखंड ने आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक बार फिर राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत पहचान दर्ज कराई है।भारत की अध्यक्षता में ओडिशा के पुरी में 3 से 5 जून 2026 तक आयोजित ब्रिक्स आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्य समूह की द्वितीय तकनीकी बैठक में उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन मॉडल की मुक्त कंठ से सराहना की गई।प्राकृतिक आपदाओं और वर्षा जनित संकटों की दृष्टि से बेहद संवेदनशील उत्तराखंड ने आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक बार फिर राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत पहचान दर्ज कराई है।भारत की अध्यक्षता में ओडिशा के पुरी में 3 से 5 जून 2026 तक आयोजित ब्रिक्स आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्य समूह की द्वितीय तकनीकी बैठक में उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन मॉडल की मुक्त कंठ से सराहना की गई।तीन दिवसीय इस अहम बैठक में ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया सहित 11 ब्रिक्स सदस्य एवं साझेदार देशों के वरिष्ठ अधिकारी, तकनीकी विशेषज्ञ और नीति निर्माता शामिल हुए। देवभूमि बचाव दल के लिए एक चुनौती थी, लेकिन हर कठिन क्षण में आशा और आशीर्वाद भी प्रदान करती रही। वेल्डरों और गैस कटरों ने असाधारण कौशल का प्रदर्शन किया और तुरंत ऑगर को काटने का काम शुरू कर दिया। शुरुआती घंटों में काम की गति बेहद धीमी रही, लेकिन बाद के घंटों में चमत्कारिक रूप से तेजी आई। लेजर कटर, प्लाज्मा कटर और मैग्ना कटर को तुरंत घटनास्थल पर भेजा गया। ऑगर को सफलतापूर्वक काट दिया गया, क्षतिग्रस्त पाइप और ऑगर बिट के अंतिम 1.5 मीटर हिस्से को हटा दिया गया, और 28 नवंबर को रैट होल माइनरों द्वारा मैन्युअल रूप से खुदाई का काम शुरू किया गया।धीरे-धीरे लेकिन लगातार, खनिकों ने पाइप को धकेलने के लिए जगह बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे इतनी उम्मीद जगी कि 42 मीटर की गहराई पर जोखिम भरे 1.2 मीटर व्यास वाले ऊर्ध्वाधर ड्रिलिंग विकल्प को रोकना उचित ठहराया जा सके। हालांकि एक क्षण के लिए झूठी आशंका भी पैदा हुई जब केवल अंतिम 2.4 मीटर ही बचा था, लेकिन 800 मिमी व्यास वाले पाइप को सफलतापूर्वक धकेलने में केवल कुछ ही घंटे लगे। फंसे हुए मजदूर पाइप को लेने के लिए तैयार थे, और कुछ रेंगते हुए अंदर घुस गए। एनडीआरएफ द्वारा विकसित एक सुरक्षित स्ट्रेचर उपकरण का उपयोग करके, सभी फंसे हुए लोगों को कुछ ही घंटों में सुरक्षित निकाल लिया गया, जिससे 17 दिनों के लंबे संघर्ष का अंत हुआ।देवभूमि बचाव दल के लिए एक चुनौती थी, लेकिन हर कठिन क्षण में आशा और आशीर्वाद भी प्रदान करती रही। वेल्डरों और गैस कटरों ने असाधारण कौशल का प्रदर्शन किया और तुरंत ऑगर को काटने का काम शुरू कर दिया। शुरुआती घंटों में काम की गति बेहद धीमी रही, लेकिन बाद के घंटों में चमत्कारिक रूप से तेजी आई। लेजर कटर, प्लाज्मा कटर और मैग्ना कटर को तुरंत घटनास्थल पर भेजा गया। ऑगर को सफलतापूर्वक काट दिया गया, क्षतिग्रस्त पाइप और ऑगर बिट के अंतिम 1.5 मीटर हिस्से को हटा दिया गया, और 28 नवंबर को रैट होल माइनरों द्वारा मैन्युअल रूप से खुदाई का काम शुरू किया गया।धीरे-धीरे लेकिन लगातार, खनिकों ने पाइप को धकेलने के लिए जगह बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे इतनी उम्मीद जगी कि 42 मीटर की गहराई पर जोखिम भरे 1.2 मीटर व्यास वाले ऊर्ध्वाधर ड्रिलिंग विकल्प को रोकना उचित ठहराया जा सके। हालांकि एक क्षण के लिए झूठी आशंका भी पैदा हुई जब केवल अंतिम 2.4 मीटर ही बचा था, लेकिन 800 मिमी व्यास वाले पाइप को सफलतापूर्वक धकेलने में केवल कुछ ही घंटे लगे। फंसे हुए मजदूर पाइप को लेने के लिए तैयार थे, और कुछ रेंगते हुए अंदर घुस गए। एनडीआरएफ द्वारा विकसित एक सुरक्षित स्ट्रेचर उपकरण का उपयोग करके, सभी फंसे हुए लोगों को कुछ ही घंटों में सुरक्षित निकाल लिया गया, जिससे 17 दिनों के लंबे संघर्ष का अंत हुआ।  सिल्क्यारा में टनल आपदा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्व के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होगी। विपरीत परिस्थितियों में सबको सुरक्षित रखना बहुत महत्वपूर्ण है, आने वाले समय में इसको एक सफल अभियान के रूप में देखा जाएगा उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन का फोकस अब केवल सरकारी तंत्र तक सीमित नहीं रह गया है. सरकार स्थानीय लोगों, स्कूली बच्चों और समुदायों को सीधे इस अभियान से जोड़कर एक मजबूत आपदा प्रतिक्रिया तंत्र तैयार करने में जुटी है. आने वाले मानसून सीजन से पहले शुरू किया गया यह व्यापक प्रशिक्षण अभियान राज्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. ।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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