• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

जल को बचाना है तो हमें अपनी परंपराओं की ओर लौटना होगा

08/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
26
SHARES
32
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter
https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4


डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
जल समस्त जीवन का स्रोत है। मनुष्य हो, पौधे हों, जानवर हों या कीड़े-मकोड़े, कोई भी जीवित प्राणी इस अनमोल तरल के बिना जीवित नहीं रह सकता, लेकिन विश्व में जल संकट एक वास्तविक समस्या है। जलवायु परिवर्तन का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पानी पर महत्वपूर्ण असर पड़ता है। भारत जैसे संवेदनशील देशों में इसके गंभीर सामाजिक और आर्थिक असर देखने को मिलते हैं। लाखों गरीब लोग तेजी से घटते विश्वसनीय जल संसाधनों, बड़े पैमाने पर वेटलैंड में आ रही गिरावट और बदतर जल प्रबंधन के साथ जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।जल संसाधन तेजी से घट रहे हैं और खराब भी हो रहे हैं। बदलते बारिश के पैटर्न के कारण सतही जल उपलब्धता में गिरावट से भूजल पर निर्भरता बढ़ती है। अधिक निकासी और बदलते मौसम व वर्षा की तीव्रता के परिणामस्वरूप, भारत के कई हिस्सों में भूजल स्तर खतरनाक दर से घट रहा है।तटीय क्षेत्रों में यह एक्वीफर्स (भूमिगत जल संग्रहण करने वाले चट्टान) में लवणता पैदा करती है। पानी की कमी लोगों के बीच आवंटन और टकराव का कारण बनती है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव खाद्य सुरक्षा पर दिखने के साथ जल सुरक्षा के लिए भी प्रत्यक्ष होंगे।अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि दुनिया की आधी से अधिक आबादी और वैश्विक अनाज उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा 2050 तक पानी की कमी के कारण जोखिम में होगा।बाढ़ या सूखे जैसी स्थिति के कारण कृषि विफलता ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। ग्रामीण भारत के बड़े हिस्सों में जीवन अब भी कृषि पर निर्भर करता है। बाढ़ और लंबे समय तक सूखे जैसी आपदाएं चिंता-संबंधी प्रतिक्रियाओं के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों का कारण भी बनती हैं। भारत में हजारों किसानों ने पिछले कुछ दशकों में आत्महत्या की है। 21वीं सदी के अंत तक जलवायु परिवर्तन से सूखे की घटनाएं और तीव्रता में वृद्धि होने की आशंका है और दुनिया का एक बड़ा हिस्सा अकाल का अनुभव कर सकता है।भोजन की कमी या भोजन की गुणवत्ता के मुद्दे भी मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। कृषि के अलावा, मत्स्य क्षेत्र में संभावित संकट भी खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा है। जलीय प्रजातियां आमतौर पर पानी के तापमान के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं और जलवायु परिवर्तन से मछली का विकास भी प्रभावित होता है। बाढ़ और सूखे के साथ जुड़े पानी से संबंधित स्वास्थ्य मुद्दे भी पैदा हो रहे हैं।बाढ़ ताजे पानी की आपूर्ति को दूषित करती है, जल-जनित बीमारियों के जोखिम को बढ़ाती है और रोग फैलाने वाले कीड़ों के लिए प्रजनन आधार बनाती है। ये इंसानों के डूबने और शारीरिक चोटों, घरों को नुकसान पहुंचाने और चिकित्सा और स्वास्थ्य सहित आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति को बाधित करती हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि तेजी से परिवर्तनशील वर्षा पैटर्न से मीठे पानी की आपूर्ति प्रभावित होने की संभावना है। सुरक्षित पानी की कमी स्वच्छता से समझौता कर सकती है और डायरिया रोग के खतरे को बढ़ा सकती है, जो हर साल पांच लाख से अधिक बच्चों की मौत का कारण बनता है।सुरक्षित पानी की कमी अक्सर जल संसाधनों में पानी के बंटवारे को लेकर विवाद का कारण बनती है। मौजूदा जल विवादों के भी बढ़ने और नए विवादों के पैदा होने की आशंका है। यह समस्या भारत जैसे देश में गंभीर हो जाएगी, जहां क्षेत्रीय हित राष्ट्रीय हितों पर हावी होंगे और निहित राजनीतिक हितों को हल करना और आम सहमति बनाना मुश्किल होगा।पानी पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से संबंधित कई अन्य सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय मुद्दे भी हैं, जो मानव जीवन को प्रभावित करते हैं। मसलन भोजन और पानी की कीमतों में बढ़ोतरी जो गरीबों के लिए वहन करना मुश्किल होता है, पानी और भोजन के आवंटन को लेकर प्रतिस्पर्द्धा और संघर्ष, पलायन, हिंसा, पर्यटन में कमी, जंगल की आग और प्रजातियों के नुकसान आदि। सुरक्षित पानी एक महंगी वस्तु बन रहा है।आज भी कुछ देशों में बोतलबंद पानी की कीमत फलों के रस से अधिक होती है। मानव प्रवास देशों के बीच तनाव और देशों के विभिन्न वर्गों के लोगों के बीच तनाव पैदा करता है। हालांकि बदलते वर्षा पैटर्न से जुड़ी पानी की कमी के कारण प्रवासन सदियों से हो रहा है, लेकिन यह पिछले कुछ दशकों में वैश्विक जलवायु में असामान्य बदलावों के साथ तेज हो गया है।वर्षा का पैटर्न बदल जाने पर जलविद्युत महंगी हो सकती है। कम वर्षा के कारण नदी प्रवाह में कमी या नदियों और जलाशयों में तलछट के कारण कटाव और तीव्र वर्षा के कारण अवसादन जल विद्युत उत्पादन को काफी प्रभावित कर सकता है। केरल जैसे राज्य पहले से ही इस स्थिति का सामना कर रहे हैं।जलवायु परिवर्तन के प्रति कुछ वर्ग बेहद संवेदनशील हैं। इनमें बच्चे और बुजुर्ग शामिल हैं, जो बीमार हैं और जिनमें जन्म दोष है। इसके अलावा वे गर्भवती और प्रसवोत्तर महिलाएं भी अधिक खतरे में हैं जो लोग पहले से ही मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं। निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले लोग, प्रवासी, शरणार्थी और बेघर भी अधिक असुरक्षित हो सकते हैं। भारत में हजारों अत्यधिक गरीबों के लिए सुरक्षित पानी के बिना जीवित रहना मुश्किल हो सकता है।विश्व आर्थिक मंच ने वैश्विक जोखिमों में नंबर एक के रूप में जल संकट को स्थान दिया है। इस संकट से दुनिया के सभी क्षेत्रों में आर्थिक और सामाजिक नुकसान पहुंचने की आशंका है। जलवायु परिवर्तन के साथ रहने का अर्थ होगा, पानी पर पड़ने वाले प्रभावों का मुकाबला करना और समुदायों और अर्थव्यवस्थाओं की कमजोरियों को कम करने के लिए आवश्यक कदम उठाना।यहां तक कि जब पानी से संबंधित आपदाएं हमारे सामने होती हैं, तो राजनेता शायद ही इसे गंभीरता से देखते हैं। महाकाव्य महाभारत में यक्ष, युधिष्ठिर से पूछते हैं, “आप जो सबसे अद्भुत चीज देखते हैं, वह क्या है?” इसका जवाब आज भी प्रासंगिक है। युधिष्ठिर जवाब देते हैं, “जब अनगिनत जीव यम लोक पहुंच जाते हैं, तब भी पीछे रह गए लोग मानते हैं कि यह उन पर लागू नहीं होता और वे अमर हैं।” दुनिया की बहुत सारी नदियों की तरह भारतीय नदियों का पानी भी प्रदूषित हो चुका है, जबकि इन नदियों को हमारी संस्कृति में हमेशा पवित्र जगह दी जाती रही है। भारत के लोग इन नदियों से मुंह नहीं फेर सकते क्योंकि वे उनकी जीवनरेखाएं हैं और भारत का भविष्य कई रूपों में इन्हीं नदियों की सेहत से जुड़ा हुआ है। भारत में जल प्रदूषण सबसे गंभीर पर्यावरण संबंधी खतरों में से एक बनकर उभरा है। इसके सबसे बड़े स्रोत शहरी सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट हैं जो बिना शोधित किए हुए नदियों में प्रवाहित किए जा रहे हैं। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद शहरों में उत्पन्न कुल अपशिष्ट जल का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही शोधित किया जा रहा है और बाकी ऐसे ही नदियों, तालाबों एवं महासागरों में प्रवाहित किया जा रहा है। जल प्रदूषण की समस्या से मानव तो बुरी तरह प्रभावित होते ही हैं, जलीय जीव जन्तु, जलीय पादप तथा पशु पक्षी भी प्रभावित होते हैं। खास तौर पर कुछ समुद्री हिस्सों एवं नदियों में तो जल प्रदूषण की वजह से जलीय जीवन समाप्तप्राय हो चुका है। जल बचाने के मुख्य साधन है नदी, ताल एवं कूप। इन्हें अपनाओं, रक्षा करो, अभय दो, इन्हें मरुस्थल के हवाले न करो। अन्तिम समय यही तुम्हारे जीवन और जीवनी को बचायेंगे। ख्यात पर्यावरणविद तो ‘अब भी खरे है तालाब’ कहते कहते स्वर्गस्थ हो गये।अवधारणा है कि पंच महाभूतों में पैदा हुए असंतुलन से उत्पन्न विकृतियों के संकट से उभरना आवश्यक है। अपनी-अपनी शक्ति अनुसार पंच महाभूतों पर अलग-अलग स्थानों पर कार्य करना आवश्यक है। पिछले कुछ समय से दुनिया में पर्यावरण के विनाश एवं जल प्रदूषण को लेकर काफी चर्चा हो रही है। मानव की गतिविधियों के कारण पृथ्वी एवं प्रकृति के वायुमंडल पर जो विषैले असर पड़ रहे हैं, उनसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी चिंतित हैं। पंचमहाभूत के जल तत्व पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार एक महाअनुष्ठान है जिसमें अनेक देश-विदेश के विशिष्ट व्यक्तित्व पर्यावरण संरक्षण के इस महाकुंभ में जन-जन को अभिप्रेरित करते हुए पर्यावरण एवं जल संरक्षण को नया जीवन प्रदान करेंगे। चूंकि प्रकृति मनुष्य की हर जरूरत को पूरा करती है, इसलिए यह जिम्मेदारी हरेक व्यक्ति की है कि वह प्रकृति की रक्षा के लिए अपनी ओर से भी कुछ प्रयास करे। भारत की मुख्य नदी व्यवस्था जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, यमुना आदि बड़े पैमाने पर प्रभावित हो चुकी है। भारत में मुख्य नदी खासतौर से गंगा भारतीय संस्कृति और विरासत से अत्यधिक गहरे रूप में जुड़ी हुई है। आमतौर पर लोग जल्दी सुबह नहाते हैं और किसी भी व्रत या उत्सव में गंगा जल को देवी-देवताओं को अर्पण करते हैं। अपने पूजा को संपन्न करने के मिथक में गंगा में पूजा विधि से जुड़ी सभी सामग्री एवं अस्थि विसर्जन कर देते हैं। इसी गंगा नदी एवं अन्य नदियों में उद्योगों से चीनी मिल, भट्टी, ग्लिस्रिन, टिन, पेंट, साबुन, कताई, रेयान, सिल्क, सूत आदि जो जहरीले कचरे बड़ी मात्रा में मिलते हैैं। 1984 में, गंगा के जल प्रदूषण को रोकने के लिये गंगा एक्शन प्लान को शुरु करने के लिये सरकार द्वारा एक केन्द्रिय गंगा प्राधिकरण की स्थापना की गयी थी। सरकार जल प्रदूषण एवं जल संरक्षण के लिये जागरूक बनी है, लेकिन सरकार के साथ जनता को भी जागना होगा।
दुनिया की बहुत सारी नदियों की तरह भारतीय नदियों का पानी भी प्रदूषित हो चुका है, जबकि इन नदियों को हमारी संस्कृति में हमेशा पवित्र जगह दी जाती रही है। भारत के लोग इन नदियों से मुंह नहीं फेर सकते क्योंकि वे उनकी जीवनरेखाएं हैं और भारत का भविष्य कई रूपों में इन्हीं नदियों की सेहत से जुड़ा हुआ है। भारत में जल प्रदूषण सबसे गंभीर पर्यावरण संबंधी खतरों में से एक बनकर उभरा है। इसके सबसे बड़े स्रोत शहरी सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट हैं जो बिना शोधित किए हुए नदियों में प्रवाहित किए जा रहे हैं। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद शहरों में उत्पन्न कुल अपशिष्ट जल का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही शोधित किया जा रहा है और बाकी ऐसे ही नदियों, तालाबों एवं महासागरों में प्रवाहित किया जा रहा है। जल प्रदूषण की समस्या से मानव तो बुरी तरह प्रभावित होते ही हैं, हर साल हमारी जल जरूरत से एक हजार अरब घन मीटर ज्यादा पानी बारिश के रूप में देश के भौगोलिक क्षेत्र में बरस जाता है। पहले जगह-जगह ताल, तलैया, पोखर और झीलों के साथ नदी जैसे जलस्नोत थे, जो इस बारिश का अधिकांश हिस्सा खुद में पैबस्त कर लेते थे। जो धीरे-धीरे रिसकर धरती के पेट में समाधिस्थ होता रहता था। इससे भूजल स्तर ऊंचा बना रहता था। इन जलस्नोतों में सतह पर मौजूद पानी सिंचाई सहित जानवरों के पीने इत्यादि के काम में लिया जाता था। इससे भूजल पर बहुत भार भी नहीं पड़ता था। आज हालात बदल गए हैं। अमूमन जलस्नोत बचे ही नहीं, जो हैं वहां पानी की जगह दूसरी तमाम चीजें की जा रही हैं। पार्किंग बन गई हैं, रिहायश तैयार है, खेती हो रही है। इसके इतर जो जमीन है उसका अधिकांश हिस्से का कंक्रीटीकरण किया जा चुका है। लिहाजा पानी एकत्र हुआ पानी रिसकर धरती की गोद में समा नहीं पाता है। दूसरी बात वह ज्यादा दिन तक ठहरता भी नहीं, नालों के साथ बहकर नदियों से होते हुए समुद्र में जाकर नमकीन हो जाता है। इस पूरे दुष्चक्र को बदलने के लिए हमें अपने आचार, विचार और व्यवहार में 360 डिग्री की तब्दीली लानी होगी। तभी हमारी पीढ़ियां पानीदार हो सकेंगी।

 

 

कुमाऊंनी होली शास्त्रीय संगीत से उपजी है। ग्वालियर व मथुरा से भी मुस्लिम फनकार यहां आते रहे हैं। अंग्रेजों के जमाने में भी कुमाऊं में होली का गायन होता रहा। 1850 से होली की बैठकें नियमित होने लगीं और 1870 से इसे वार्षिक समारोह के रूप में मनाया जाने लगा।  देश में हर जगह होली का अपना अलग रंग दिखता है. उत्तराखंड की होली की बात करें तो इसका इतिहास काफी पुराना है. उत्तराखंड के कुमाऊं की होली बहुत खास मानी जाती है. कुमाऊं में ढोल नगाड़ों की धुन और लय-ताल और नृत्य के साथ गाई जाने वाली खड़ी होली अपना विशेष स्थान रखती है. संगीत सुरों के बीच बैठकी होली के भक्ति, शृंगार, संयोग, वियोग से भरे गीत गाने की परंपरा कुमाऊं अंचल के गांव-गांव में चली आ रही है. कुमाऊं में चीर व निशान बंधन की भी अलग विशिष्ट परंपरायें हैं। इनका कुमाउनीं होली में विशेश महत्व माना जाता है। होलिकाष्टमी के दिन ही कुमाऊं में कहीं कहीं मन्दिरों में `चीन बंधन´ का प्रचलन है। पर अधिकांशतया गांवों, शहरों में सार्वजनिक स्थानों में एकादशी को मुहूर्त देखकर चीर बंधन किया जाता है। हिमालय की गोद में बसा कुमाऊँ अंचल अपने नैसर्गिक सौंदर्य के अलावा सुदीर्घ और समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के लिए भी विख्यात है। यहाँ मनाए जाने वाले अनेक लोक उत्सवों की तरह कुमाऊँनी होली का भी एक अलग अंदाज है। यहाँ की होली का अपना रंग है।अपनी विशिष्ट पहचान है। कुमाऊँनी होली तन को ही नहीं रंगती ,मन को भी उमंग से लबालब भर देती है। कुमाऊँ की होली में आंचलिक विशिष्टता है। अनूठा सौंदर्य बोध है। यहाँ की होली में रंग ,राग और रागनियों का अदभुत समागम है। ऋतुराज बसंत को यौवन का सूचक माना जाता है। बसंत ऋतु के आते ही समूची प्रकृति का यौवन एकाएक खिल उठता है। प्रकृति रंग -बिरंगी हो जाती है। विशिष्ट सुगंध और रंग लिए फूल खिलने लगते हैं। देश के अलग -अलग हिस्सों में लोग अपने -अपने अंदाज में बसंतोत्सव के रंग के आगोश में डूब जाते हैं। भारत के कोने -कोने में राग -रंग के उत्सव होली की धूम मच जाती है। होली भारत के प्राचीनतम त्यौहारों में शामिल है। लिहाजा होली पूरे भारत में मनाई जाती है।भारत के अलग -अलग हिस्सों में होली मनाने का अंदाज जुदा है। स्थानीय इतिहास ,मान्यता और परंपराओं के मुताबिक समय और क्षेत्र के अनुसार होली का स्वरूप बदल जाता है। होली की इस विविधता को कुमाऊँ अंचल में बेहतर तरीके से समझा और महसूस किया जा सकता है।भारत के दूसरे क्षेत्रों की बनिस्बत कुमाऊँ की होली का रंग कुछ अनोखा है। यहाँ होली महज एक दिन का पर्व नहीं बल्कि महीनों चलने वाला सांस्कृतिक लोक उत्सव है।पहाड़ के कई इलाकों में पूस के पहले इतवार से रामनवमी तक होली की बैठकें जमती हैं। कुमाऊँ की होली के मायने हुड़दंग नहीं है। बल्कि राग -रागनियों की सामूहिक अभिव्यक्ति है। परालौकिक विश्वास है। स्थानीय परंपराओं,मान्यताओं और मिथकों का समावेश है। सरलता ,उन्मुक्तता और आत्मीयता है।रंगों के जरिये अपनी सांस्कृतिक जड़ों से रिश्ता कायम रखने की कोशिश है।लोक – मानस में निहित आस्था की अभिव्यक्ति है। कुमाऊँ की होली में प्रत्येक कालखण्ड के सामाजिक इतिहास,परंपरा ,धर्म और संस्कृति के गहरे रंग दिखाई देते हैं। कुमाऊँ की होली के गीतों में यथार्थ और कल्पना का अनोखा मिश्रण है। यहाँ के होली गीतों में भक्ति ,रस ,कला ,माधुर्य ,आमोद -प्रमोद और हँसी – ठिठोली का अदभुत समावेश है। देवताओं से जुड़े ज्यादातर होली गीतों की विषय – वस्तु पौराणिक आख्यान से जुडी है। रामायण और महाभारत के अनेक प्रसंग भी होली गीतों की विषय – वस्तु बने हैं। गणेश ,शिव ,पार्वती की प्रार्थना ,राधा -कृष्ण और राम -सीता द्वारा खेले जाने वाले रंग का वर्णन है। परदेस गए पति की प्रतीक्षा करती नवयौवना की भावनाएं हैं। देवर – भाभी के बीच की हँसी -ठिठोली है।कुमाऊँनी होली में ब्रज और उर्दू का गहरा प्रभाव है।विशुद्ध स्थानीय भाषा -बोली में होली के गीत बहुत कम हैं। बावजूद इसके यहाँ की होली के गीतों में आंचलिक और सांस्कृतिक विशिष्टता साफ झलकती है। देश के दूसरे हिस्सों में प्रचलित होलियों से मिलते – जुलते हुए भी कुमाऊँनी होली कई मायनों में अलहदा है। भारत के दूसरे हिस्सों में होली राग – रंग और उल्लास का पर्व है। पर कुमाऊँनी होली में राग – रंग ,उल्लास के साथ गीत ,संगीत और नृत्य पक्ष भी जुड़ा है। होली के पदों की सामूहिक अभिव्यक्ति ,नृत्य और संगीत कुमाऊँ की होली को देश के दूसरे हिस्से की होलियों से अलग करती है। कुमाऊँ में होली के तीन रूप प्रचलित हैं। बैठकी होली ,खड़ी होली और महिलाओं की होली।यहाँ पूस के महीने के पहले इतवार से बैठकी होली शुरू हो जाती है। कुमाऊँनी बैठकी होली में ताल और रागों का गहरा ताल्लुक है। बैठकी होली में पूस के पहले रविवार से बसंत पंचमी तक भक्ति परख होलियां गाई जाती हैं। इन्हें ‘निर्वाण’ की होली कहा जाता है। निर्वाण की होली गायन की शुरुआत आमतौर पर मन्दिरों के प्रांगण से होती है। सबसे पहले गणेश जी की स्तुति होती है -“तुम सिद्धि करो महाराज होली के दिन में। सिद्धि के दाता ,बिघन बिनासन ,हमरी राखो लाज ,होलिन के दिनन में।” इसके बाद शिव ,राम ,कृष्ण और दूसरे देवी -देवताओं की स्तुति की जाती है। होली के गीतों में देवताओं की दार्शनिकता और रहस्यात्मकता का वर्णन अधिक होता है। निर्वाण की होलियों में आध्यात्मिकता और धार्मिक भावों की प्रधानता होती है।कुमाऊँनी बैठकी होली का भी अपना अनूठा अंदाज है। यह शास्त्रीय आधार के रागों को गाने की एक पारंपरिक शैली है। बैठकी होली में हारमोनियम ,तबला ,ढोलकी ,मजीरा और दूसरे वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल होता है। इस होली की खासियत यह है कि इसमें शास्त्रीय गायन की अनुशासनात्मकता होती है। बैठकी होली में कुछ विशिष्ट और रसिक लोग ही हिस्सा लेते हैं। राग – रागनियों पर आधारित होने बावजूद बैठकी होली का अंदाज प्रकारांतर में सामूहिक गायन जैसा ही होता है। बैठकी होली में राग की शुद्धता से ज्यादा भावाभिव्यक्ति और जन -रंजनता को वरीयता दी जाती है। खास बात यह है कि बैठकी होलियों को गाने वाले ज्यादातर लोग शास्त्रीय संगीत के जानकार नहीं होते हैं। शास्त्रीय संगीत की बुनियादी जानकारी नहीं रखने वाले लोग भी राग – रागनियों पर आधारित होली गाते हैं। होली गायन की यह शैली श्रवण परंपरा से पीढ़ी -दर- पीढ़ी चलती आ रही है। शिवरात्रि से खड़ी होली शुरू हो जाती है। खड़ी होली का ग्रामीण इलाकों में ज्यादा प्रचलन है। इसमें आम लोगों की भागीदारी होती है। यह ढोलक ,नगाड़े और मंजीरे की लय पर सामूहिक रूप से गाए जाने वाली होली है।खड़ी होली का स्वरूप नृत्यात्मक होता है। इसी वजह से इसे खड़ी होली कहा जाता है। गोल घेरे में खास पद संचालन करते हुए सामूहिक होली गायन को खड़ी होली कहते हैं। शिवरात्रि को खड़ी होली का शुभारंभ शिव जी की होली से होता है। “जटन विराजत गंग,भोले नाथ दिगम्बर। शिव के जटन से निकसी गंगा ,जा सागर में समाई।”या फिर “तू भज ले भवानी शंकर को। भाल तिलक सिर गंग विराजे ,बास कियो गिरी हिमकर को।” बाद के दिनों में दूसरे देवी – देवताओं की स्तुति में होलियां गाई जाती हैं। “दसरथ को लछिमन बाल -जती ,बार बरस सीता संग रहिए ,पाप न लागो एक रती। ”सुर ,ताल ,लय ,नृत्य और भाषा – बोली के लिहाज से कुमाऊँ की खड़ी होली देश के अन्य हिस्सों में प्रचलित होलियों से कतई जुदा है। सामूहिक गायन शैली के चलते खड़ी होली में सुर ,ताल ,लय और नृत्य सभी में एक विशेष प्रकार की सादगी होती है। अधिकांश खड़ी होलियों में संगीत के स्तर पर अंतरा नहीं होता। खड़ी होली “हाँ” लय से प्रारंभ होती है और धीरे – धीरे तेज होती चली जाती है। इसमें नृत्य भी हाथों की भावपूर्ण भंगिमा ,सहज पद संचालन और शरीर की लचक तथा झौंक तक सीमित होता है। रंग पड़ने के साथ ही चीर बंध जाती है। “को ए उ बांधनि चीर रघुनन्दन राजा?को ए उ खेलनि फ़ाग रघुनन्दन राजा?” पूर्णमासी आते ही होली श्रृंगार प्रधान हो जाती है। “तोसे पूछूँ बात बहू चादर में दाग कहाँ लायो…….।”या “कहो तो यैं रमि जायँ गोरी नैना तुमारे रसा भरे।” “चलत पवन ऋतु आई फागुन की। जियरा मोरा नहीं मानत री…….।” कुछ दिन बाद होली का श्रृंगार रस पूरे जोबन में आ जाता है। “हो झुकि हो मोरे यार जालिम नैना तेरे। नैन बने मिसरी के कुंजे ,झुरी -झुरी मरत गंवार। जालिम नैना तेरे।” दूसरा पक्ष भी पीछे नहीं रहता। “तू करि ले अपनों ब्याह देवर हमरो भरोसो झने करियै। “कुमाऊँ में होली का तीसरा रूप है – महिला होली। महिलाओं की होली का स्वरूप बैठकी या खड़ी होलियों से कुछ भिन्न है। घर – घर महिला होली की बैठकें जमती हैं। खूब स्वांग होते हैं। होलियों की धूम मचती है। महिला होली के गायन का एक निश्चित क्रम होता है। “फागुन के दिन चार सखी री ,अपनों बलम मोहे माँग हूँ दे री।” छलड़ी के दिन स्वांग खेले जाते हैं। होलियारों की टोलियां होली गाते हुए पूरे गाँव का भ्रमण करती है। ज्यादातर टोलियां गाँव के मंदिरों में जा मिलती हैं। देवताओं को रंग अर्पित कर विदाई की होलियां गाई जाती हैं। “रंग की गागर सर पै धरे ,आज कन्हैया रंग भरे…….।” रंग के साथ आशीष का दौर भी चलता है। “गावैं ,खेलैं ,देवैं आसीस ,हो हो हो लख रे। बरस दीवाली बरसै फ़ाग ,हो हो हो लख रे। जो नर जीवैं ,गावैं फ़ाग ,हो हो हो लख रे। ” इस मधुर – मोहिल गीत – संगीत ,नृत्य वाली कुमाऊँ की इस निराली होली में यहाँ की मिटटी की सौंधी सुगंध है।होली के जरिए कुमाऊँ के समृद्ध लोक जीवन की झलक देखी जा सकती है।कुमाऊँ की होली में राग -रंग के साथ इस अंचल के धार्मिक ,सामाजिक ,सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन के विविध पक्ष जीवंत रूप से जुड़े हैं। हिमालय और पर्यावरण यहाँ के धार्मिक,सामाजिक और सांस्कृतिक का अभिन्न अंग है।दूसरे लोक उत्सवों की ही तरह कुमाऊँ होली भी युगीन चेतना और सामाजिक सरोकारों से अभिन्न रूप से जुडी है।कुमाऊँनी होली के गीत समकालीन धार्मिक एवं सामाजिक परिस्थितियों का भी बखूबी चित्रण करते हैं। इन गीतों में विशिष्ट भौगोलिक और प्राकृतिक विशेषताएं भी दिखाई देती हैं। इसे कवि चारु चन्द्र पाण्डे की रचना के इस अंश से बखूबी महसूस किया जा सकता है – “बुरुशी का फूलों को कुम कुम मारो ,डाना काना छाजि गै बसंती नारंगी। पारवती ज्यूकि झिलमिलि चादर ,ह्यूं कि परिन लै रंगे सतरंगी। लाल भई छ हिमांचल रेखा ,शिव जी की शोभा पिङलि दनिकारी कुमाऊं में `चीर हरण´ का भी प्रचलन है। गांव में चीर को दूसरे गांव वालों की पहुंच से बचाने के लिए दिन रात पहरा दिया जाता है। चीर चोरी चले जाने पर अगली होली से गांव की चीर बांधने की परंपरा समाप्त हो जाती है। कुछ गांवों में चीर की जगह लाल रंग के झण्डे `निशान´ का भी प्रचलन है, जो यहां की शादियों में प्रयोग होने वाले लाल सफेद `निशानों´ की तरह कुमाऊं में प्राचीन समय में रही राजशाही की निशानी माना जाता है।बताते हैं कि कुछ गांवों को तत्कालीन राजाओं से यह `निशान´ मिले हैं, वह ही परंपरागत रूप से होलियों में `निशान´ का प्रयोग करते हैं। सभी घरों में होली गायन के पश्चात घर के सबसे सयाने सदस्य से शुरू कर सबसे छोटे पुरुष सदस्य का नाम लेकर `जीवें लाख बरीस…हो हो होलक रे…´ कह आशीष देने की भी यहां अनूठी परंपरा है। पहले होल्यारों को वह सम्मान नहीं मिल पाता था, जिसके वे हकदार थे. अगर वे अन्य गायकी में निपुण नहीं होते, तो उन्हें चन्द रोज का मेहमान मानकर दरकिनार कर दिया जाता था. कहा जाता था- “पूस के पहले इतवार से ये जागेंगे और छलड़ी खेलकर ये फिर सो जाएंगे.” परिवार और समाज में होल्यारों की गायक के रूप में कोई मान्यता नहीं मिलती थी. कलाकार इज्जत का भूखा होता है. उसे मान्यता और सम्मान मिलना बहुत जरूरी है. इसी को ध्यान में रखते हुए होली महोत्सव के दौरान होली के हर अंग यानी बैठी, खड़ी और महिला होली कलाकारों के सम्मान के लिए बाकायदा एक सम्मान समारोह शुरू हुआ, जिसमें प्रति वर्ष कुछ चुनिन्दा बजुर्ग होल्यारों को गरिमापूर्ण ढंग से खुले मंच पर जनता के बीच सम्मानित किया जाने लगा।  लेखक दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।

Share10SendTweet7
Previous Post

वेद उनियाल विचार मंच के तत्वाधान से चतुर्थ उत्कृष्ट सम्मान समारोह2026

Next Post

बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अधीनस्थ कई स्थानों पर उपेक्षित पड़े मंदिरों का भी कायाकल्प होना जरूरी

Related Posts

उत्तराखंड

राज्य आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण प्रक्रिया विलम्ब होने एवं क्षैतिज आरक्षण का पालन ना करने के खिलाफ बनाई रणनीति

March 15, 2026
15
उत्तराखंड

शराब के बढ़ते प्रचलन से हो रही दुर्घटनाओं व समाज मे फैल रही विकृतियों से त्रस्त सीमांतवासियों ने शराब के विरोध का फैसला किया

March 15, 2026
10
उत्तराखंड

गैरसैंण को प्रदेश की स्थायी राजधानी घोषित करने की मांग

March 14, 2026
24
उत्तराखंड

युवा आपदा मित्र प्रशिक्षण शिविर के लिए 14 स्वयंसेवी चयनित

March 14, 2026
80
उत्तराखंड

प्रधानाचार्य महेश चंद गुप्ता को डॉक्टरेट की मानद उपाधि से नवाजा

March 14, 2026
19
उत्तराखंड

डोईवाला: आटा रिटर्न कराने के बहाने महिला के खाते से 70 हजार रुपये उड़ाए

March 14, 2026
77

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67663 shares
    Share 27065 Tweet 16916
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45773 shares
    Share 18309 Tweet 11443
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38047 shares
    Share 15219 Tweet 9512
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37436 shares
    Share 14974 Tweet 9359
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37324 shares
    Share 14930 Tweet 9331

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

राज्य आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण प्रक्रिया विलम्ब होने एवं क्षैतिज आरक्षण का पालन ना करने के खिलाफ बनाई रणनीति

March 15, 2026

शराब के बढ़ते प्रचलन से हो रही दुर्घटनाओं व समाज मे फैल रही विकृतियों से त्रस्त सीमांतवासियों ने शराब के विरोध का फैसला किया

March 15, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.