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देहरादूनी बासमती सिर्फ नाम रह गया, महक गायब

15/02/20
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
बासमती चावल का एक खास पैन्डन पैन्डेनस एमारिफोलियस पत्ते का स्वाद होता है। यह फ्लेवर स्वाद़खुशबू रसायन २.एसिटाइल.१.पायरोलाइन के कारण होता है। बासमती की अनेक किस्में होती हैं। पुरानी किस्मों में बासमती.३७०, बासमती.३८५ और बासमती. रणबिरसिँहपुरा आर.एस.पुरा एवं अन्य संकर किस्मों में पूस बासमती, जिसे टोडल भी कहा जाता है, आती है। खुशबूदार किस्में बासमती स्टॉक से ही व्युत्पन्न की जाती हैं, परन्तु उन्हें शुद्ध बासमती नहीं माना जाता है। उदाहरण के लिए पीबी२, जिसे सुगन्ध.२ भी कहते हैं, पीबी.३ एवं आर.एच.१०। नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि विज्ञान अनुसंधान केन्द्र, पूसा संस्थान, ने एक परंपरागत बासमती की किस्म को शोधित कर एक संकर किस्म बनाई, जिसमें बासमती के सभी अच्छे गुण हैं और साथ ही यह पौधा बहुत छोटा भी है। इस बासमती को पूसा बासमती.१ कहा गया।
पी.बी..१ की उपज पैदावार अन्य परंपरागत किस्मों से अपेक्षाकृत दुगुनी होती है। काला शाह काकू, में स्थित पाकिस्तान के चावल अनुसंधान संस्थान बासमती की कई किस्में विकसित करने में कार्यरत रहा है। इसकी एक उत्कृष्ट किस्म है सुपर बासमती, जो कि डॉ॰मजीद नामक एक वैज्ञानिक ने १९९६ में विकसित की थी। यहीं विकसित हुआ विश्व का सबसे लम्बा चावल दाना, जिसे पाकिस्तान कर्नैल बासमती कहा गया। इसकी औसत लम्बाई कच्चा ९.१ मि.मि. और पका हुआ १८.३ मि.मि. होती है।
इसके साथ अन्य अनुमोदित किस्मों में कस्तूरी बरान, राजस्थान, बासमती १९८, बासमती २१७, बासमती ३७०, बासमती ३८५, बासमती ३८६, कर्नैल पाकिस्तान, बिहार, देहरादून, हरियाणा, कस्तूरी, माही सुगन्ध, पंजाब, पूसा, रणबीर, तरओरी हैं। कुछ गैर.परंपरागत खुशबूदार संकर किस्में भी होती हैं।
बासमती चावल विश्वभर में अत्यधिक लंबे दाने और खुशबू के लिये प्रसिद्ध है। यह न केवल राष्ट्रीय, वरन अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ारों में भी अत्यधिक मांग में है, जो कि अरबों डालरों का निर्यात उपलब्ध कराता है। सितंबर १९९७ में राइसटैक नामक एक टैक्सास की कम्पनी ने बासमती लाइन्स और दानों का पेटेण्ट जीत लिया यू.एस.पेटेण्ट सं० ५,६६३,४८४। इस पेटेण्ट से बासमती और समान चावलों की शोधन प्रक्रिया आदि पर उनका एकाधिकार हो गया था। राइसटैक नामक लीख़्टेनश्टाइन की एक कंपनी ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विरोध का सामना किया, जिससे संयुक्त राज्य और भारत के बीच एक लघुकालीय राजनयिक संकट उभरा था। इस संदर्भ में भारत ने इस मामले को ट्रिप समझौते को तोड़ने के आरोप में डब्ल्यू.टी.ओ. तक पहुंचाने का संकल्प किया, जिससे सं.राज्य को काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा विशुद्ध बासमती खेती केवल भारत के गांगीय समतल क्षेत्रों और पाकिस्तान के कुछ क्षेत्रों में ही होती है। इसके लिये उपभोक्ताओं की मांग, यहां उच्च स्तर की विदेशी मुद्रा और कई क्षेत्रों में कर.मुक्ति भी दिलाती है। कृत्रिम किस्में मंहगी खेती मांगतीं हैं और फिर भी उनके गुण, शुद्ध किस्मों का मुकाबला ना कर पाने के कारण कम कीमत लातीं हैं। साथ ही चावल बाज़ारों में बिना खुशबू की किस्मों की निम्न श्रेणी की कई किस्में पहले ही उपस्थित हैं जिनमें बासमती लक्षण हैं।
उत्तराखंड की बासमती की महक शायद जल्द ही गायब हो जाए। वजह, उत्तराखंड सरकार ने धान खरीद केंद्रों पर अब बासमती के बीज की बिक्री पर रोक लगा दी है। दरअसल राज्य में बासमती की लगातार घटती पैदावार के चलते सरकार अब धान की दूसरी किस्मों की पैदावार को बढ़ाने पर ध्यान दे रही है। इसी को देखते हुए जिले के कृषि विभागों को आदेश जारी कर दिए गए हैं। लगातार घट रहा रकबा उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों में चावल की खेती बड़े पैमाने पर होती है। इसमें सर्वाधिक उत्पादन हरिद्वार, देहरादून, उधमसिंह नगर और नैनीताल के ग्रामीण क्षेत्र में होता है। धान की विभिन्न किस्मों के अलावा किसान बासमती की खेती भी करते हैं। बासमती चावल का सर्वाधिक उत्पादन हरिद्वार क्षेत्र में होता है। इन क्षेत्रों में दो वर्ष पूर्व तक करीब 24 हजार टन बासमती चावल का उत्पादन होता था। इसके चलते प्रदेश सरकार की ओर से भी किसानों को जिलों के क्रय केंद्रों से बासमती धान की नर्सरी के लिए बीजों का वितरण किया जाता था। किसानों को सब्सिडी पर बासमती धान का बीज सस्ते मिल जाते थे। हाल के दो वर्षो में बासमती चावल के उत्पादन में आई कमी के चलते प्रदेश सरकार ने धान की इस किस्म के क्रय केंद्रों से होने वाले वितरण से अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। लेकिन दुनिया भर में मशहूर बासमती चावल अब अपने घर देहरादून की घाटी से ही लुप्त होता जा रहा है। बासमती की खेती में अधिक लागत, मेहनत और कम उपज के कारण यहाँ के किसानों ने अब बासमती की जगह गन्ने जैसी नगदी फसलें उगाना शुरू कर दिया है। एक समय था जब देहरादून के सेवला, माजरा और मोथरावाली इलाकों में जब बयार चलती थी तो बासमती के खेतों से उठी महक हवा में घुल जाती और दूर से ही पता चल जाता कि यहाँ बासमती धान लगा है। पीढियों से बासमती की खेती करते आए बचन सिंह याद करते हुए कहते हैं, क्या ख़ुश्बू होती थी, एक घर में पकता तो पूरे गाँव को पता चल जाता था। बड़े.बड़े व्यापारी मुँह.माँगा दाम देकर सीधा खेतों से ही उठा ले जाते। लेकिन अब कौन लगाता है बासमती, न पानी रहा न मजदूर।
राजस्व विभाग के दस्तावेजों के अनुसार आज़ादी के बाद तक देहरादून के 2200 एकड़ में बासमती बोया जाता था जो अब घटकर 190 एकड़ तक सीमित रह गया है संकर बीजों के अलावा दून घाटी की बदली आबोहवा भी बासमती के लुप्त होने की एक वजह है। हक़ीक़त ये है कि देहरादूनी बासमती का नाम अब सिर्फ़ एक ब्रांड बनकर रह गया है। दूसरी जगह से आ रहे बारीक चावल को देहरादून बासमती का ठप्पा लगाकर बेचा जाता है। देहरादून के आढ़ती अंकुर मल्होत्रा कहते हैं, पहले असली बासमती बाज़ार में आ जाया करता था लेकिन अब तो चावल बहादराबाद, उधमसिंहनगर और सहारनपुर वग़ैरा से आता है। यहाँ तो सिर्फ कटिंग होती है। सबने लिख रखा है देहरादूनी बासमती और ये बस फैशन की बात हो गई है।
अब आलम ये है कि दून घाटी में बासमती के रहे सहे खेतों का भी सरकार बड़े पैमाने पर अधिग्रहण करने की तैयारी कर रही है और वहाँ सरकारी प्रतिष्ठान और आवासीय इमारतें बने है। ग़ौर करने की बात ये है कि बासमती को देश के दूसरे भागों में भी बोकर परीक्षण किया गया लेकिन वहाँ की उपज में यहाँ की मिठास, महक और स्वाद नहीं पैदा हो पाया। बासमती चावल की निर्यात मांग में नरमी के कारण घरेलू बाजार में कीमतों में गिरावट आई है, जिसके कारण किसानों के लिए इस साल बासमती की खेती फायदेमंद साबित नहीं हो पाई है। बताया जा रहा है बासमती के दामों में यह कमी पिछले 5 सालों में आई सबसे बड़ी गिरावट है। चालू वित्त वर्ष के शुरुआती सात महीनों में बासमती चावल के निर्यात में 10 फीसदी की गिरावट आई है, जिससे घरेलू बाजार में बासमती चावल का भाव पिछले साल से 20 फीसदी टूट चुका है। कारोबारी बताते हैं कि बासमती चावल का उत्पादन ज्यादा होने और निर्यात सुस्त पड़ जाने के कारण कीमतों पर दबाव देखा जा रहा है।
पंजाब बासमती राइस मिलर्स एसोसिएशन के मुताबिक, इस साल देश में बासमती चावल का उत्पादन पिछले साल से 25 फीसदी ज्यादा है, जबकि निर्यात मांग इस समय कम है, जिसके कारण कीमतों में गिरावट आई है। पिछले साल बासमती चावल 1121 का औसत भाव 6500 रुपये प्रति कुंटल था। वहां इस साल 5300-5400 रुपये क्विंटल है। वहीं, 1121 धान का औसत भाव 2800 रुपये प्रति क्विंटल है, पिछले साल बासमती का उत्पादन जहां 58 लाख टन था, वहीं इस साल करीब 75 लाख टन होने की उम्मीद है। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण एपीडा के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से अक्टूबर के दौरान भारत ने करीब 20 लाख टन चावल का निर्यात किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि के दौरान देश से 22 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया था। इस प्रकार पिछले साल के मुकाबले बासमती चावल के निर्यात में 10 फीसदी की गिरावट आई है। इस समय ईरान को बासमती चावल का निर्यात नहीं हो रहा है, जिसके कारण निर्यात में कमी आई है। बता दें कि ईरान ने भारत से बासमती चावल का आयात करने पर पिछले कुछ समय से रोक लगा दी है। इससे पहले ईरान को जो निर्यात हुआ, उसका भुगतान भी नहीं हो रहा है। अमेरिका द्वारा ईरान के एक सैनिक जनरल को मारे जाने और ईरान की फिलहाल सीमित जवाबी कार्रवाई के बाद खाड़ी क्षेत्र में एक तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। हमारा देश अपनी मांग के लगभग 85 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात करता है। 2018.19 में हमने लगभग 8 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 22.6 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया था जिसमें से लगभग आधा खाड़ी देशों से आया था। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता का असर हमारी तेल आपूर्ति पर पड़ सकता है। यदि कलह बढ़ी तो कच्चे तेल और गैस के दाम बढ़ने से हमारा आयात महंगा होगा। डीजल, पेट्रोल, गैस आदि की महंगाई का असर किसान की लागत पर सीधा पड़ता है, क्योंकि ट्रैक्टर, डीजल इंजन और अन्य मशीनों को चलाने की लागत बढ़ेगी। महंगाई दर बढ़ने के कारण अपने इस्तेमाल की अन्य वस्तुएं किसान को और महंगी खरीदनी होंगी। रुपये की कीमत गिरने से आयातित खाद के दाम भी बढ़ेंगे। कच्चे तेल से प्राप्त कई उत्पादों का प्रयोग रासायनिक उर्वरकों को बनाने में भी होता है। इस कारण खाद और कच्चे तेल के दाम एक दिशा में चलते हैं। अतः कच्चे तेल के महंगा होने से देश में निर्मित और आयातित दोनों तरह के खाद के दाम बढ़ेंगे और खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी का बिल भी बढ़ेगा।
भारत ने 2013.14 में 4,325 करोड़ डॉलर आज के मूल्यों में लगभग तीन लाख करोड़ रुपये मूल्य के कृषि उत्पादों का निर्यात किया था, जो 2016.17 में गिरकर 3,370 करोड़ डॉलर पर आ गया था। इसके बाद के वर्षों में इसमें कुछ बढ़ोतरी हुई, परंतु 2019.20 में अप्रैल से सितंबर की पहली छमाही में यह केवल 1,730 करोड़ डॉलर के स्तर पर है। खाड़ी देशों में अशांति और अनिश्चितता के कारण 2019.20 की दूसरी छमाही में इसमें और गिरावट आ सकती है। कृषि उत्पादों का निर्यात किसानों की आमदनी को बढ़ाने में भी मददगार होता है, लेकिन 2020 की शुरुआत में ही पश्चिम एशिया पर छाए अशांति के बादल हमारे देश के लिए, वहां रह रहे भारतीयों और विशेषकर हमारे किसानों के लिए अच्छी खबर नहीं है। देश दुनिया में अपनी खास पहचान रखने वाला बासमती टाईप.थ्री धीरे.धीरे इतिहास का हिस्सा बनता जा रहा है। वो दिन अब नहीं रहे जब दूर.दूर के लोग बासमती चावल के लिए देहरादून का रुख करते थे अब तो देहरादून के लोगों को भी बाहरी प्रदेशों के उगाए हुए चावल खाने पड़ते हैं, यानि अब देहरादून बासमती का सिर्फ नाम ही रह गया है।

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