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स्वामी मनमथन ने रखी उत्तराखंड में जन आंदोलनों की नींव

08/04/20
in उत्तराखंड, चमोली
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महेशानंद जुयाल
सौजन्य से भुवन नौटियाल, महासचिव वार मेमोरियल
स्वामी मनमथन की पूण्य तिथि पर विशेष
फोटो- गैरसैंण। गढवाल हमेशा कृतज्ञ रहेगा स्वामी जी के प्रति
6 अप्रैल को स्वामी जी की पूण्य तिथि पर गढवाल से नगण्य समाचार उन्हें याद करने को मिले, जो कोरोना की त्रासदी में गुम हो गये। सुदूर समुद्र के किनारे केरल से हिमालय में आकर स्वामी जी ने सामाजिक कुरीतियों के विरूद्ध क्रांति ला दी थी। चाहे चंद्रबदनी के मंदिर में बलि प्रथा का अंत हो या टिंचरी और शराब के विरूद्ध जनचेतना आंदोलन, फिर गढवाल वि0विद्यालय आंदोलन ने वास्तव में पहली बार ब्रिटिश गढवाल व टीहरी रियासत को एक कर अभूतपूर्व जनान्दोलन खडा किया, जो आजादी से पहले और बाद का पहला सफल आंदोलन हुआ। पहली बार गढवाल के सरकारी दफ्तरों में ताले पडे और आखिरकार गढवाल वि0 विद्यालय की स्थापना उत्तर प्रदेश में पहले गढवाली मुख्यमंत्री स्व0 हेमवंती नंदन बहुगुणा ने कर डाली। गढवाल वि विद्यालय स्थापना के बाद स्वामी जी के प्रस्ताव पर गढवाल वि विद्यालय निर्माण संघर्ष समिति को हरिद्वार कर्णप्रयाग रेल लाईन निर्माण संघर्ष समिति में परिवर्तित कर दिया गया।
भारत के प्रथम विश्व युद्ध के प्रथम विक्टोरिया क्रास महानायक दरवान सिंह नेगी द्वारा विक्टोरिया क्रास प्राप्त करते समय किंग जार्ज पंचम ने प्रथम विश्व युद्ध में मारे गये गढवाली सैनिकों की स्मृति में वार मैमोरियल स्कूल कर्णप्रयाग व हरिद्वार -कर्णप्रयाग रेल लाईन की मांग को सन् 1914 में स्वीकार कराया था। वी सी साहब के शिक्षा और रेल लाईन के सपनों को 60 साल बाद पहली बार स्वामी मनमथन ने मूर्त रूप देने की पहल प्रारंभ की। माना जाय तो उत्तराखंड राज्य आंदोलन के लिए गढवाल में आंदोलनों की जमीन तैयार करने का काम स्वामी मनमथन जी ने ही किया। इससे पहले तो पटवारी के खिलाफ भी कहने व लिखने की हिम्मत लोग जुटा नहीं पाते थे।
यही नहीं स्वामी जी द्वारा उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र की पांच-पांच टी स्टेट जो बडे-बडे पूंजी पतियों के पास थी, उनका राष्ट्रीयकरण कर इस भूमि पर बडे विकास कार्योें के साथ भूमि को यहां के गरीब भूमिहीनों में बांटने तथा जंगलों को गांव की वन पंचायतो को सुपुर्द करने की मांग भी उठायी। इसी क्रम में चमोली जनपद की दो स्टेट बेनीताल 40 हजार नाली तथा सिलकोट 25 हजार नाली भूमि वाली टी स्टेटों के राष्ट्रीयकरण की मांग को लेकर भटोली से कर्णप्रयाग तक एक हजार काश्तकरों का पैदल मार्च 10 किमी निकाला गया। उपजिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से केंद्र व राज्य सरकारों को ज्ञापन दिया गया। सिलकोट टी स्टेट में जब पांच सौ पेड टी स्टेट के मालिक के निर्देश पर अवैध रूप से काटे गये, तो स्वामी जी ने एशिया के सबसे बडा मिटी के बांध कालागढ के जलागम क्षेत्र व रामगंगा के उद्गम पर वृक्ष कटान को बांध के लिए खतरा बताया। स्टेट के मैनेजर आदि की गिरफ्दारी हुई।
स्वामी जी के जन जागरण व जनआंदोलनों से राजनेता व सरकारे हिल गई थी। तभी देश में आपातकाल लगा और उन्हें झूठे मुकदमें मेें मीसा के तहत गिरफतार कर जेल भेज दिया गया। आपातकाल समाप्त हुआ स्वामी जी ने अपनी आंदोलनकारी शक्ति को पर्वतीय महिलाओं व बच्चों के कल्याण के लिए झौंकते हुए श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम अंजनीसैंण नाम से एक एनजीओ स्थापित किया, जो आज उत्तराखंड के अग्रणी एनजीओ की पंक्ति में स्वामी जी के स्वप्नों के अनुरूप सेवा कर रहा है। सेवा समर्पण एवं संघर्ष के इस महायोद्धा को महात्मा गांधी जी की तरह गोलियां मारकर सदा के लिए सुला दिया गया। स्वामी जी की मृत्यु के बाद हम गढवाल के लोग स्वामी जी के प्रति क्या कृतज्ञता दिखा पाये हैं, इसमें हमें संदेह है। स्व0 हेमवती नंदन बहुगुणा जी की मृत्यु के बाद पंडित नारयण दत तिवारी जब मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने गढवाल वि0विद्यालय एवं बेस अस्पताल श्रीनगर का नाम श्रीनगर केी श्रृद्धांजलि सभा में एच एन बहुगुणा के नाम पर रखा। गढवाल वि विद्यालय पौडी परिसर का नाम तत्कालीन राज्यपाल बी गोपाला रेडी के नाम तथा टीहरी में वि0विद्यालय परिसर का नाम श्रीदेव सुमन के नाम पर रखा गया। जो स्वागत योग्य है।
गढवाल के लिए केरल से आये इस महापुरूष, जो यहां के लिए जिया और बलिदान भी दिया। टीहरी श्रीनगर और गैरसैंण की किसी बडी संस्था का नाम स्वामी जी के नाम पर अवश्य ही रखा जाना न्यायोचित्त होता। जैसे एनआईटी, रेलवे स्टेशन श्रीनगर, रा महाविद्यालय गैरसैंण, चाय फेक्ट्री गैरसैण्ंा तथा टीहरी में किसी भी संस्था के नाम पर विचार किया जाना चाहिए। राजनेताओं और सरकार को पहल करनी चाहिए। अन्यथा कृत्यज्ञनता का अपराध बोध गढवाल को हमेशा चुभता रहेगा। भूल सुधारने का समय है, गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी के विकास के लिए सिलकोट व बेनीताल टी स्टेटों की भूमि का उपयोग सरकार आसानी से कर सकती है। जो भराडीसैंण के दायें और बायें हाथ पसारे खडी हैं। मेरे पत्रकार मित्र बताते हैं कि स्वामी जी चाहते थे कि मैं भुवन नौटियाल टाइपराईटर पर लिखूं उन्होंने जुयाल जी को टिहरी से टाईपराइटर कर्णप्रयाग ले जाने को कहा था, लेकिन इस बीच स्वामी जी की हत्या हो गई। शत शत नमन के साथ श्रृद्धांजलि।

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