डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
स्वांग और ठेठर होली में मनोरंजन की सहायक विधा है, इसके बगैर होली अधूरी है। यह विधा खासतौर पर महिलाओं की बैठकी होली में ज्यादा प्रचलित है। जिसमें समाज के अलग.अलग किरदारों और उनके संदेश को अपनी जोकरनुमा पोशाक और प्रभावशाली व्यंग के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। संगीत के मध्य विराम के समय यह स्वांग और ठेठर होली को अलग ऊंचाई प्रदान करता है। समूचे भारत में तो फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन ही रंगों के साथ होली परवान चढ़ती है। इस कड़ी में मथुरा के ब्रज.बरसाने और बनारस की होली देश और दुनिया में मशहूर है। स्वांग और ठेठर होली में मनोरंजन की सहायक विधाएं हैं। जिसके बिना कुमाऊंनी होली में अधूरापन नजर आता है। जिसमें महिलाएं समाज के अलग.अलग किरदारों और उनके संदेश को अपनी जोकरनुमा पोशाक और प्रभावशाली व्यंग के माध्यम से प्रस्तुत करती हैं।
संगीत के मध्य विराम के समय यह स्वांग और ठेठर होली को अलग ऊंचाई प्रदान करता है। यह महिलाओं की बैठकी होली में ज्यादा प्रचलित हैंं। कालांतर में होली के ठेठर और स्वांग की विधा ने कुछ बड़े कलाकारों को भी जन्म दिया। कोरोना वायरस को लेकर महिलाओं को जागरूक कर रही हैं। ताकि कोरोना वायरस लोगों को अपनी चपेट में न ले सके। स्वांग के जरिए लोगों को किया जा रहा है जागरूक। वैसे तो यहां की परम्परा के मुताबिक महिलाएं हर होली में हंसी.ठिठोली से भरे हुए स्वांग करती हैं। लेकिन इस बार के स्वांग कोरोना वायरस इर्द.गिर्द बनाए जा रहे हैं। महिला होल्यार जमकर होली खेलती हैं। महिलाओं को एक्टिंग का भी शौक है लिहाजा वो हर होली में स्वांग करती हैं। कविता बताती हैं कि वैसे तो वह हर होली में देवर.भाभी के मजाक से जुड़े हुए अनेकों स्वांग करती रही हैं, लेकिन इस बार उन्होंने अपने स्वांग को कोरोना की जागरूकता के लिए तैयार किया है। होल्यार का कहना है कि महिलाएं जागरूक हों और परिवार को भी कोरोना वायरस के साइड इफेक्ट से बचा सकें यही उनका मकसद है।
होल्यार के साथ स्वांग करने वाली कहती हैं कि उन्हें इस तरह के जागरूकता से भरे स्वांग कर के अच्छा महसूस हो रहा है। उनका कहना है कि क्योंकि हमने अपने स्वांगो को बेहद मनोरंजक बना रखा है, इसलिए महिलाओं तक इसका सीधा संदेश जा रहा है। होली के बड़े आयोजनों से जुड़ी बताती हैं कि उन्होंने महिलाओं को विशेष तौर पर कोरोना और स्वास्थ्य से जुड़े हुए स्वांग मंचों पर करने का अनुरोध किया है ताकि महिलाएं होली के जरिए जागरूकता का संदेश लेकर घर लौटें। उत्तराखंड की महिला होल्यार तो जमकर मजाक उड़ा रही हैं, लेकिन यह मजाक कोई ऐसा वैसा मजाक नहीं बल्कि कोरोना की जागरूकता से भरा हुआ मजाक है।
उत्तराखंड की महिलायें स्वांग के जरिये मजाक.मजाक में ही लोगों में इस वायरस को लेकर अवेयरनेस फैला रही हैं। हर तरफ लोग होली की मस्ती में रम गए हैं तो वहीं कोविड गाइडलाइन्स का भी पूरा ख्याल रखा जा रहा है। होली गायन में किसी परिचित या स्वजन की नकल उतारने की परंपरा भी रही है, जिसे स्वांग रचना कहते हैं। किसी प्रसिद्ध व्यक्ति या समाज के व्यक्ति के रोचक प्रकरणों को शामिल कर स्वांग रचे जाते हैं। आज के दौर में स्वांग रचने की परंपरा में कुछ बदलाव देखने को मिलता है। सामाजिक बुराइयों जैसे दहेज, नशाखोरी, व्यभिचार के खात्मे और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे संदेश, राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने वाले संदेश आदि भी स्वांग में देखे जाते हैं। यूं तो कुमाऊं अंचल के गांव.गांव में होली का त्यौहार बढ़.चढ़कर परम्परागत रूप से ही मनाया जाता है, लेकिन मुख्य रूप से अल्मोड़ा, द्वाराहाट, बागेश्वर, गंगोलीहाट, पिथौरागढ़, पाटी, चंपावत, नैनीताल कुमाऊं की संस्कृति के केंद्र रहे हैं। यहां के सामाजिक ताने.बाने में वह तत्व मौजूद हैं जो संस्कृति और उसके महत्व को समझते हैं। वह जानता है कि संस्कृति ही समाज को स्थाई रूप से समृद्ध करती है। इन कस्बों में न केवल होली का रंग बल्कि रामलीला। दिवाली जैसे त्यौहार भी बड़ी संजीदगी और पारंपरिक रूप से मनाए जाते हैं और यह कस्बे हमारी संस्कृति के मुख्य केंद्र है गौर्दा, गुमानी पंत व मौलाराम जैसे लोकप्रिय जन कवियों ने अपनी होली रचनाओं में स्वांग का प्रयोग किया है।
उत्तराखंड के लोकप्रिय जनकवि महिला स्वांग होली पर कहते हैं कि होली रंगों के पर्व के साथ अभिव्यक्ति का पर्व भी है। होली पर महिलाएं विभिन्न सामाजिक चरित्रों को स्वांग के जरिए उजागर करती हैं। गिर्दा बताते हैं कि स्वांग को होली थेटर भी कहते हैं। स्वांग में महिलाएं पुरुष चरित्रों को प्रमुखता से उठाती हैं। कुमाऊं में विगत सालों से महिला स्वांग होली को समर्पित कहती हैं कि स्वांग में मुख्यतः वर्तमान समय की समस्याओं को व्यंग्य व चरित्रों के माध्यम से पेश किया जाता है। इस समय कोरोना बाबा रामदेव, अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा, लालू यादव, सोनिया गांधी, अमिताभ बच्चन के चरित्र बेहद लोकप्रिय हैं, के अनुसार युवा पीढ़ी का स्वांग के प्रति रुझान न होना चिंता का विषय है। भागदौड़ से भरे इस जीवन में लोगों के पास इतना समय कहां यह भी जीवित रहेगी।











