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ताम्रनगरी के रूप में बना रहेगा अल्मोड़ा का अस्तित्व!

17/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा को ताम्रनगरी के नाम से भी जाना जाता है. अल्मोड़ा में बनने वाले तांबे के बर्तनों को करीब 400 साल से यहां पर बनाया जा रहा है चंद शासनकाल में सिक्कों की ढलाई से लेकर मौजूदा पारंपरिक तांबे के बर्तनों तक का अल्मोड़ा का सफर बेहद समृद्ध रहा। चंद वंश की राजधानी में हुनरमंद तामता बिरादरी की टकसाल ने तमाम उतार चढ़ाव देखे। वक्त के साथ ताम्र शिल्पियों की हस्तकला पर मशीनीयुग की काली छाया क्या पड़ी, बुलंदियों पर रही ताम्रनगरी धीरे-धीरे उपेक्षा से बेजार होती चली गई। अब पर्वतीय राज्य के जिन सात उत्पादों को जीआइ टैग मिला है, उनमें यहां के तांबे से बने उत्पाद भी शामिल हैं। वैसे तो घरेलू बर्तन मसलन फौला, तौला के साथ धार्मिक आयोजनों में प्रयुक्त होने वाले पंचधारा, मंगल परात, गगार, कलश ने अल्मोड़ा को देश-विदेश तक पहचान दिलाई है।ताम्र नगरी का इतिहास करीब 500 वर्ष पुराना है। धरती के गर्भ में ताम्र धातु की पहचान व गुणवत्ता परखने में माहिर तामता परिवार तब चंद राजाओं के दरबार में खास अहमियत रखता था। चम्पावत से अल्मोड़ा में राजधानी बनाने के बाद यहां तामता (टम्टा) परिवारों की टकसाल बनी। पाटिया (चम्पावत) से ये राज हस्तशिल्पी अल्मोड़ा में बसाए गए। तब ताम्रशिल्प को कुमाऊं के सबसे बड़े उद्योग का दर्जा मिला। टकसाल में गृहस्थी के साथ पूजा व धार्मिक आयोजनों में प्रयुक्त होने वाले बर्तनों के साथ सिक्कों की ढलाई व मुहर भी बनाई जाती थी। पुरखों से विरासत में मिली ताम्रशिल्प को संजोए हस्तशिल्पी नवीन टम्टा कहते हैं, पूर्वज पहले झिरौली (बागेश्वर) की पहाड़ी से तांबा निकालते थे। चंद राजवंश के बाद ब्रितानी हुकूमत ने खान बंद करा दी। ब्रिटेन से तांबा मंगाया जाने लगा। इसके बाद सिक्कों की ढलाई बंद हो गई। आजादी के बाद ताम्रनगरी फिर बुलंदियों की ओर बढ़ी। यहां के बने पराद (परात), गागर व कलश की भारी मांग रहती थी। मांगलिक व धार्मिक कार्यक्रमों के लिए फौले, गगरी, पंच एवं अघ्र्यपात्र, जलकुंडी ही नहीं शिव मंदिरों के लिए ताम्र निर्मित शक्ति की मांग अभी बरकरार है। पारंपरिक ठनक कारखानों की बजाय आधुनिक फैक्ट्रियों में मशीनों से ताम्र उत्पाद बनने लगे। इससे ताम्र नगरी की टकसाल संकट में पड़ गई। हालांकि हरिद्वार महाकुंभ 2021 में तत्कालीन आइजी कुमाऊं की पहल पर यहां से अतिथियों के लिए 500 फौले, गागर व कलश बनवाए गए। राजधानी देहरादून में आयोजित लोक संवर्धन पर्व इन दिनों देश की विविध सांस्कृतिक विरासत, हस्तशिल्प परंपराओं और लोक कलाओं का जीवंत केंद्र बना हुआ है. अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के सहयोग से आयोजित इस पर्व में देशभर से डेढ़ सौ से अधिक हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट उद्यमी शामिल हुए हैं. यहां पहुंचने वाला हर व्यक्ति भारत की विविधता को एक ही परिसर में महसूस कर सकता है. कहीं पारंपरिक परिधान आकर्षित कर रहे हैं तो कहीं लोक चित्रकारी, धातु शिल्प, आभूषण और हस्तनिर्मित उत्पाद लोगों का ध्यान खींच रहे हैं. लोक संवर्धन पर्व में उत्तराखंड के अल्मोड़ा की प्रसिद्ध ताम्र कला यानी ब्रास और कॉपर क्राफ्ट विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. अल्मोड़ा जिले से आए ताम्र शिल्पकार अपने स्टॉल पर लोगों को पारंपरिक तांबे के बर्तनों और उनसे जुड़ी कला की जानकारी देते नजर आए. समय के साथ उन्होंने अपने काम में कई नए प्रयोग भी शुरू किए हैं. अब वे लोगों के पुराने और अनुपयोगी हो चुके तांबे के बर्तनों को लेकर उन्हें नए स्वरूप में तैयार कर वापस देते हैं. इससे एक ओर पुरानी धरोहर सुरक्षित रहती है तो दूसरी ओर ग्राहकों को नए उत्पाद भी मिल जाते हैं.उन्होंने बताया कि पहले तांबे के बर्तनों को पूरी तरह गलाकर और घंटों तक हाथों से पीट-पीटकर तैयार करना पड़ता था, लेकिन अब कुछ आधुनिक उपकरणों की मदद से काम अपेक्षाकृत आसान हो गया है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मशीनें केवल सहायक हैं, असली पहचान आज भी कारीगर के हाथों और उसके अनुभव से ही बनती है. बताते हैं कि तांबे के बर्तन बनाना उनका पुश्तैनी व्यवसाय है और पीढ़ियों से उनका परिवार इस काम से जुड़ा हुआ है. उन्होंने कहा कि अल्मोड़ा को ताम्र नगरी के नाम से भी जाना जाता है. क्योंकि यहां पारंपरिक रूप से टम्टा समुदाय के लोग तांबे के बर्तन बनाने का कार्य करते आए हैं. यह कला उत्तराखंड के जीआई टैग प्राप्त उत्पादों में भी शामिल है, जो इसकी विशिष्टता को दर्शाती है. लोक संवर्धन पर्व जैसे आयोजनों से उन्हें अपनी कला को देशभर के लोगों तक पहुंचाने का अवसर मिलता हैय यहां आने वाले ग्राहक न केवल उत्पाद खरीदते हैं, बल्कि उनके पीछे छिपी कहानी और परंपरा को भी समझते हैं. उन्होंने बताया कि करीब 30 वर्षों तक नौकरी करने के बाद उन्होंने अपने पुश्तैनी व्यवसाय को फिर से अपनाया और आज उसी को आगे बढ़ा रहे हैं. उनका मानना है कि यदि युवाओं को सही अवसर और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो पारंपरिक हस्तशिल्प उद्योग रोजगार का बड़ा माध्यम बन सकता है. तांबे का पानी स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक माना जाता है. अल्मोड़ा में हस्तनिर्मित तांबे के बर्तन शुद्ध तांबे के होते हैं. जिनको कारीगर पिघलाकर हथौड़े से पीट-पीटकर बनाते हैं. संजीव अग्रवाल का कहना है कि दीपावली के समय में तांबे के बर्तनों की काफी डिमांड रहती है. इस बार उन्होंने तांबे क्लश व पूजा के बर्तनों में कुमाऊं की लोक चित्रकला ऐपण का डिजाइन भी उकेरा गया है. प्राचीन काल से ही यहां रहने वाले ताम्र कारीगर तांबे के बर्तन आदि बनाने में काफी पारंगत रहे हैं। तांबे की खानें बंद होने के बावजूद अल्मोड़ा में हाल के बरसों तक तांबे के बर्तन बनाने का कारोबार अच्छा खासा चलता था, लेकिन पिछले कुछ सालों से मशीनों के बने बर्तन आने के बाद यह कारोबार समाप्ति की ओर है।  हर परिवार का अपना कारखाना था, लेकिन हाल के वर्षों में मशीनीकरण के आगे यहां के ताम्र कारीगर नहीं टिक पा रहे हैं, जिससे करीब 200 ताम्र कारीगरों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा है और कई ताम्र शिल्पी रोजगार की तलाश में यहां से पलायन कर चुके हैं। तांबे की इस कारीगरी में कुछ अन्य रूचिवान लोग भी लगे हैं, ये कारीगर बागेश्वर तहसील के अन्तर्गत मल्ली व तल्ली खरही के बीस गाँवों में परम्परागत तांबे के बर्तन बनते हैं। अल्मोड़ा को ताम्र नगरी के नाम से भी जाना जाता है, यहां तांबे के बर्तनों का कारोबार करीब 400 साल पुराना है।सर्वेक्षणों के अनुसार पिथौरागढ़ जनपद के गंगोलीहाट, थल, बेरीनाग आदि में ९४ परीवार पूरी तरह तांबे के बर्तन इत्यादि को बनाकर इस कला को जीवित रखे हुए हैं। अल्मोड़ा जनपद में ही परम्परागत रुप से पांच सौ परिवार इस शिल्प को जीवित रखकर परोक्ष, अपरोक्ष रुप से जीविका यापन कर रहें हैं। नैनीताल,अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जनपदों के हजारों कारीगर आज भी इस व्यवसाय को अपनाये हुए हैं। अनुमान है कि अल्मोड़ा जनपद में ही लगभग एक करोड़ से अधिक के तांबे का क्रय विक्रय प्रतिवर्ष है। इस उद्योग से अभी तक पुरुष कारीगर ही जुड़े हैं। इसमें स्थानीय महिलाओं को भी प्रशिक्षण देने के लिए सरकार योजना बनाये। सामान्यतः भाड़े के मजदूरों से काम नहीं लिया जाता, परिवार के सदस्य ही काम निबटाते हैं। तांबे का कारोबार एक अच्छा उद्योग इसलिए भी बन सकता है कि अब लोगआरओफिल्टर की हानियां और तांबे की गागर के जल पीने का लाभ जानने लगे हैं। ताम्बे के वर्तनों का उपयोग रोगनिरोधक होता हैं। अपनी इस धरोहर को कैसे जीवित रखें, इसके लिए सभी ने मंथन किया और सभी युवाओं और बुजुर्गों को साथ लेकर इस काम को कैसे आगे बढ़ाए जाए, इस पर विचार किया गया. 80 से 100 युवाओं का एक क्लस्टर बनाया गया, जिसकी एक छोटी कंपनी भी बनाई गई है. वर्तमान में यहां पर तांबे से परात, गागर, कलश, फौले, गगरी और जलकुंडी के अलावा अन्य चीजें बनाई जाती हैं. अगर राज्य सरकार अल्मोड़ा की इस पहचान को आगे बढ़ाने में युवाओं की मदद करती है, तो आने वाले समय में वे इस काम में और कलात्मक प्रयोग कर सकेंगे, क्योंकि अल्मोड़ा में बनने वाले तांबे के बर्तन शुद्ध धातु के बने, बेहद अनूठे और मजबूत होते हैं.भविष्य में वह कई अन्य चीजें यहां पर करने वाले हैं. इसके अलावा युवाओं को सिखाने के लिए वह ट्रेनिंग भी जल्द कराएंगे. अब यहाँ पर न तो प्रशिक्षण दिया जाता है और न ही काष्ठ कला को बढ़ावा देने के लिए कोई गतिविधियाँ चल रही है। यदि सरकार इस केन्द्र का विस्तारीकरण कर शिल्पियों को आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण दे तो अनेक लोगों को रोजगार मिल सकता है। अब यहाँ पर न तो प्रशिक्षण दिया जाता है और न ही ताम्रकला को बढ़ावा देने के लिए कोई गतिविधियाँ चल रही है। यदि सरकार इस केन्द्र का विस्तारीकरण कर शिल्पियों को आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण दे तो अनेक लोगों को रोजगार मिल सकता है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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