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टिहरी झील का जलस्तर बढ़ा पर्यटन विभाग की करोड़ों की संपत्ति डूबी

23/09/21 - Updated on 24/09/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला: देश के सबसे ऊंचे बांध का जिक्र छिड़ते ही टिहरी का नाम सामने आता है। 260.5 मीटर ऊंचा यह बांध सिर्फ उत्तराखंड नहीं बल्कि देश के कई राज्यों को रोशन कर रहा है। दिल्ली और यूपी के कुछ क्षेत्रों में बांध के जल का इस्तेमाल पेयजल और सिंचाई के लिए भी किया जाता है। वहीं सुरक्षा की दृष्टि से भी यह बांध काफी अहम माना जाता है एशिया के सबसे बड़े टिहरी डैम की झील का जलस्तर 829.50 आरएल मीटर पहुंच गया, जिसके बाद क्षेत्र में हड़कंप मचा हुआ है।

वहीं, जलस्तर लगातार बढ़ने से कोटी कॉलोनी में पर्यटन विभाग के द्वारा बनाये गए आस्था पथ, टेंट, फुटपाथ, पर्यटकों को आने-जाने के रास्ते, यात्री विश्राम शेड, डूब गए हैं। ऐसे में कोटी कॉलोनी के किनारे बोटिंग प्वाइंट पर बोटिंग करने के लिए आ जा रहे पर्यटकों को आने जाने की समस्या से जूझना पड़ रहा है।टिहरी झील का जलस्तर बढ़ने से क्षेत्र में पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करने के लिए केंद्र सरकार ने सेंट्रल वाटर कमीशन की टीम बुधवार को टिहरी पहुंचेंगी।

टीम के इंजीनियर झील का जलस्तर बढ़ने से झील और आसपास के क्षेत्र में क्या प्रभाव पड़ा है, उसकी रिपोर्ट तैयार कर केंद्र सरकार को सौंपेंगी।केंद्र सरकार ने इस सीजन में टिहरी हाइड्रो डवलेपमेंट कारपोरेशन (टीएचडीसी) को टिहरी बांध झील का जलस्तर 830 मीटर भरने की अनुमति दी थी। पिछले साल तक टीएचडीसी प्रबंधन टिहरी झील को सिर्फ 828 मीटर तक ही भरता था, लेकिन इस बार टिहरी झील का जलस्तर 830 मीटर तक भरा जाएगा।

झील का जलस्तर दो मीटर बढ़ने से झील और आसपास के क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। इसके लिए अब केंद्र सरकार ने सेंट्रल वाटर कमीशन (सीडब्ल्यूसी) की टीम को टिहरी झील का निरीक्षण करने के लिए भेजा है। बुधवार को टीम टिहरी झील और आसपास के क्षेत्र पर पड़ रहे प्रभाव का आकलन करेगी। टिहरी झील का जलस्तर बढ़ने से इन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है।  राज्य सरकार ने हाल ही में झील के जलस्तर 830 आरएल मीटर तक पानी भरने की अनुमति दी थी।

ऐसे में झील का जलस्तर स्तर अब 830 आरएल मीटर के करीब पहुंच गया है. जिससे स्थानीय लोगों में दहशत का माहौल है. आश्चर्य की बात ये है कि पर्यटन विभाग के द्वारा बनाई गई करोड़ों की संपत्ति झील में डूब गई है. पर्यटन विभाग के अधिकारी भी टिहरी झील का जलस्तर बढ़ने से विभागीय संपत्ति के हुए नुकसान की तस्दीक कर रहे हैं। वहीं, टिहरी बांध परियोजना के अधिशासी निदेशक ने कहा कि 835 आरएल मीटर के नीचे जलस्तर की जितनी भी संपत्ति है, वह टीएचडीसी की है।

835 आरएल मीटर से नीचे जो भी संपत्ति का निर्माण करता है, उसका जिम्मेदार वही है, जबकि पहले से ही तय है कि टिहरी झील का जलस्तर 830 आरएल मीटर तक देर सबेर भरना तय है। गौरतलब है कि टिहरी झील से प्रभावित 415 परिवारों के विस्थापन के मामला अभी भी लटका हुआ है. जिसे लेकर कुछ दिनों पहले ही एक बैठक हुई थी। जिसमें भारत सरकार के ऊर्जा मंत्री, ऊर्जा सचिव, टिहरी जिलाधिकारी और टीएचडीसी के अधिकारियों शामिल हुए थे।

जिसमें बांध प्रभावित 415 परिवारों के विस्थापन पर सहमति बनी और टीएचडीसी ने टिहरी झील को 830 आरएल मीटर भरने की अनुमति मांगी गई थी। जिस पर राज्य सरकार ने हामी भर दी थी और स्थानीय लोग इस निर्णय से नाराज हैं टिहरी झील का जलस्तर बढ़ने से एक तरफ जहां टीएचडीसी प्रबंधन ज्यादा बिजली उत्पादन कर पा रहा है, वहीं झील से सटे ग्रामीण क्षेत्रों में दहशत है। स्वदेश दर्शन योजना के तहत पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पर्यटन विभाग ने उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम से लगभग 80 करोड़ की लागत से बनाए गए व्यू प्वॉइंट, रेलिंग और हेलीपैड भी डूब गए हैं। जिस पर ग्रामीणों ने पर्यटन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा किया है।

उन्होंने कहा जब टिहरी झील का जलस्तर 830 आरएल मीटर भरने का पहले से ही तय था तो आखिर विभाग ने सरकारी पैसे को बर्बाद करके 835 आरएल मीटर से नीचे यह संपत्ति क्यों बनाई। इन मामले की जांच होनी चाहिए।अभी तो 828 आरएल मीटर पानी आने से यह बुरा हाल है। जब 830 आरएल मीटर तक जलस्तर बढ़ेगा तो फिर आप समझ सकते हैं कि कितना बुरा हाल होगा। अगर 830 आरएल मीटर तक जलस्तर पहुंचता है तो पर्यटन विभाग द्वारा बनाए गए आस्था पथ, 2 व्यू प्वॉइंट, रेलिंग और हेलीपैड सब डूब जाएंगे। उच्च भूकंप जोन वाले क्षेत्र में बना हुआ है।

टिहरी बांध अगर किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा के चलते यह डैम टूटा तो पश्चिम बंगाल तक असर देखे जाने की आशंका है। सबसे ज्यादा असर ऋषिकेश और हरिद्वार में पड़ सकता है। इन शहरों के पानी में डूबने की आशंका है। इसके बाद पश्चिमी यूपी के जिले बिजनौर, मेरठ, हापुड़ और बुलंदशहर में इसका असर देखने को मिल सकता है। यहां 10 मीटर पानी भरने की आशंकाहै।हैदराबाद स्थित नैशनल जीयोफिजिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट ने एक शोध के अनुसार, टिहरी बांध मध्य हिमालयी फाल्ट (दरार) पर है। यह दरार तिब्बती प्लेट से बनी है। ये प्लेट भारत को लगातार एक सदी के अंतराल में दक्षिण की ओर धकेल रही है।

टिहरी बांध को 1972 में बनाया गया। तब तक हिमालय के विघटन की जानकारी उपलब्ध नहीं थी। तब इस बांध को इसी आधार पर डिजाइन किया गया था कि इस क्षेत्र में 7.2 रिक्टर स्केल से अधिक का भूकंप आ ही नहीं सकता। लेकिन लेकिन बाद के वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि यहां 8.5 रिक्टर स्केल का भी भूकंप आ सकता है जो इस क्षेत्र के लिए भयानक हो सकता है। टिहरी बांध झील में गत वर्षो तक 828 मीटर तक ही पानी भरा जाता था।

लेकिन इस वर्ष केन्द्र सरकार ने टिहरी झील को 830 मीटर तक भरने की अनुमति टीएचडीसी प्रबंधन को दी है। टिहरी झील का जलस्तर 828.30 मीटर तक पहुंच गया, जबकि बांध की झील से 299 क्यूमेक्स पानी छोड़ा जा रहा है। वहीं मामले में टीएचडीसी ने अपना पल्ला झाड़ा लिया है। टिहरी बांध परियोजना के अधिशासी निदेशक का कहना है कि 835 मीटर से नीचे जितनी भी संपत्ति है, वह टिहरी बांध परियोजना की है। किसी भी विभाग द्वारा 835 आरएल मीटर से नीचे कोई भी सरकारी और अर्धसरकारी संपत्ति बनाता है और वह डूब जाती है तो उस पर टीएचडीसी की कोई जिम्मेदारी नहीं है। न ही उस नुकसान का कोई मुआवजा देगी।

जो भी विभाग 835 आरएल मीटर से नीचे कोई भी संपत्ति बनाता है तो उसकी जिम्मेदारी उसी विभाग की होगी। पर्वतीय क्षेत्र में हो रही बारिश से इन दिनों झील का जलस्तर आरएल 829.50 मीटर तक पहुंच गया है। भागीरथी नदी से 300 क्यूमेक्स, भिलंगना से 130 और अन्य सहायक नदियों से 170 क्यूमेक्स पानी झील में आ रहा है। झील से 350 से लेकर 400 क्यूमेक्स पानी सिंचाई और पेयजल के लिए नदी की ओर छोड़ा जा रहा है। ग्रिड से अधिक डिमांड आने के कारण टीएचडीसी टिहरी बांध से 25 और कोटेश्वर बांध से पांच मिलियन यूनिट विद्युत उत्पादन 24 घंटे में कर रहा है। सामान्य दिनों में 24 घंटे में 8 से 10 मिलियन यूनिट विद्युत उत्पादन हो पाता है।

इन दिनों टीएचडीसी औसतन एक दिन में 10 करोड़ से अधिक की बिजली ग्रिड को दे रहा है, जिससे जिससे टीएचडीसी अच्छी खासी आय अर्जित कर देश की ऊर्जा जरूरतों को भी पूरा कर रही है। सुभाष कुमार के मुताबिक नौ नवंबर 2000 को उत्तराखंड के गठन के बाद उत्तर प्रदेश ने टीएचडीसी में 923.87 करोड़ रुपये का निवेश किया है। उत्तराखंड यह धनराशि लौटाने को तैयार है। इसी के साथ उत्तराखंड के हिस्से डिविडेंड की वह धनराशि भी आ सकती है, जो शेयरधारक के रूप में उत्तर प्रदेश ने प्राप्त की। बिजली पर भी उत्तराखंड का हक 12 फीसद से बढ़कर 25 फीसद हो जाएगा।

यह नियम टिहरी व कोटेश्वर बांध के अलावा अन्य परियोजनाओं के उत्पादन पर भी लागू होगा। खुद के उत्पादन के साथ ही राज्य कोटे से मिलने वाली बिजली के बाद भी ऊर्जा निगम उपभोक्ताओं को हर वक्त बिजली नहीं दे पा रहा है। वर्तमान में कुल उपलब्ध औसतन 45 मिलियन यूनिट बिजली में से सात से दस मिलियन यूनिट बिजली अन्य राज्यों के साथ बैंकिंग की जा रही है। हर साल जून से सितंबर के मध्य बैंकिंग प्रक्रिया चलती है। ऐसे में मौजूदा जरूरत पूरी करने के लिए ऊर्जा निगम प्रतिदिन चार से पांच यूनिट बिजली सेंटर पूल से खरीद रहा है। हालांकि, उपभोक्ताओं को रोस्ट्रिंग से पूरी तरह मुक्ति इसके बाद भी नहीं मिल रही है। राज्यों के साथ बैंकिंग की गई बिजली उत्तराखंड को नवंबर में मिलनी शुरू होती है। सर्दियों में राज्य का अपना बिजली उत्पादन कम हो जाता है। केंद्रीय पूल से बिजली की खरीद अधिकतम रुपये में प्रतियूनिट की जाती है। इससे अधिक महंगी बिजली मिलने पर खरीद नहीं की जाती।

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