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चाल, खाल और ताल प्रकृति की देन हैं

30/06/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला :

विषम भूगोल वाले उत्तराखंड में हर साल औसतन 1529 मिमी बारिश होती है, जिसमें अकेले चौमासे यानी मानसून की भागीदारी 1221.9 मिमी है। बारिश का यह पानी हर साल यूं ही जाया हो जाता है। हालांकि, खाल-चाल, खंत्तियां, चेकडैम जैसे उपायों के जरिये इसे रोकने के प्रयास विभिन्न विभागों के स्तर पर हुए हैं, लेकिन इनमें तेजी की दरकार है। राज्य में निरंतर सूखते जलस्रोतों को बचाने के लिए यह जरूरी भी है।उत्तराखंड में ‘पाणी राखो’ आंदोलन के प्रणेता एवं प्रसिद्ध पर्यावरणविद् श्री सच्चिदानंद भारती के जल और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यों का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज मन की बात कार्यक्रम में उल्लेख करते हुए कहा कि  उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के शिक्षक  सच्चिदानंद भारती ने मेहनत और लगन से क्षेत्र में पानी की समस्या को दूर कर दी।

उन्होंने कहा कि क्षेत्र में ग्रामीण पहले पानी की समस्या से बहुत ही ज्यादा परेशान थे, लेकिन आज भारती जी की मेहनत की बदौलत गांव और आसपास के क्षेत्रों में वर्षभर पानी की सप्लाई हो रही है।उन्होंने कहा कि पहाड़ों में जल संरक्षण के लिए एक पारंपरिक तरीका अपनाया जाता है जिसे, चालखाल भी कहा जाता है।  सच्चिदानंद भारती का जिक्र किया और उनके द्वारा जंगल संरक्षण के लिए किए गए कार्यों की सराहना की।उन्होंने बताया कि पारंपरिक चालखाल तरीके में पानी के लिए गड्ढा खोदा जाता है। मोदी ने कहा कि चालखाल तरीके का इस्तेमाल करते हुए नवीनतम तकनीक को भी जोड़ा गया, जिससे पानी के संकट से निजात मिल पाई। पीएम मोदी ने कहा कि भारती जी ने गांव में छोटे-बड़े तालाब बनवाए जिससे न सिर्फ ग्रामीणों की पेयजल की समस्या दूर हुई बल्कि क्षेत्र में हरियाली भी पुन: लौट आई।

मोदी ने भारती जी की जमकर तारीफ करते हुए कहा कि भारती जी ने जल संरक्षण और पेयजल की समस्या को दूर करने के लिए अब तक 30 हजार जल तलईया बनवाई हैं।  “ यहीं नहीं, भारती जी का यह भगीरथ कार्य आज भी जारी है और अनेक लोगों को प्रेरणा भी दे रहे हैं ताकि आसपास के गांवों में भी पेयजल संकट दूर किया जा सके। ”उत्तराखंड में जल और जंगल के संरक्षण के लिए काम कर रहे पर्यावरणविद् सच्चिदानंद भारती का कहना है कि जल, जंगल और जमीन के साथ प्रकृति हमारे जीवन का आधार है। केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि समस्त जीव सृष्टि इस पर निर्भर है। सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, जिसमें हम जीवन श्रृखंला कहते हैं।

यदि इसमें एक भी कड़ी टूटती है तो समूचा जीवन प्रबंध बुरी तरह प्रभावित होता है। हम सभी लोग प्रकृति के ही अंग हैं। इसलिए हमारी प्रकृति के प्रति कुछ जिम्मेदारियां भी हैं। हमें अपनी जीवन पद्धति को प्रकृति के अनुरूप ढालना ही होगा।बता दें कि बीरोंखाल ब्लाक (जिला पौड़ी गढ़वाल) के मूल निवासी सच्चिदानंद भारती पिछले चार दशक से पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। उनका पाणी राखो आंदोलन विश्व प्रसिद्ध है। पिछले कई सालों से कोटद्वार के भाबर स्थित घमंडपुर गांव में निवास कर रहे सच्चिदानंद भारती इंटर कालेज उफ्रैंखाल से सेवानिवृत्त शिक्षक हैं, जिनकी पर्यावरण के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हैं।

भारती का कहना है कि पानी का बाजारीकरण भविष्य का बड़ा संकट है। पानी पर सबका समान अधिकार रहे, इसके लिए आंदोलन की जरूरत है। सच्चिदानंद भारती ने वर्ष 1989 में बीरोंखाल के उफ्रैंखाल में इस काम को शुरू किया। इसके तहत उन्होंने छोटे-छोटे चाल खाल बनाए। जिनमें बरसात के पानी का संरक्षण किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में जल संरक्षण के लिए किए गए कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि- ”हमारे देश में अब मानसून का सीजन भी आ गया है। बादल जब बरसते हैं तो केवल हमारे लिए ही नहीं बरसते, बल्कि बादल आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बरसते हैं। बारिश का पानी जमीन में जाकर इकठ्ठा भी होता है, जमीन के जलस्तर को भी सुधारता है। और इसलिए मैं जल संरक्षण को देश सेवा का ही एक रूप मानता हूँ।

आपने भी देखा होगा, हम में से कई लोग इस पुण्य को अपनी ज़िम्मेदारी मानकर लगे रहे हैं। ऐसे ही एक शख्स हैं उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के सच्चिदानंद भारती जी। भारती जी एक शिक्षक हैं और उन्होंने अपने कार्यों से भी लोगों को बहुत अच्छी शिक्षा दी है। आज उनकी मेहनत से ही पौड़ी गढ़वाल के उफरैंखाल क्षेत्र में पानी का बड़ा संकट समाप्त हो गया है। जहाँ लोग पानी के लिए तरसते थे, वहाँ आज साल-भर जल की आपूर्ति हो रही है।साथियों, पहाड़ों में जल संरक्षण का एक पारंपरिक तरीक़ा रहा है जिसे ‘चालखाल’ भी कहा जाता है , यानि पानी जमा करने के लिए बड़ा सा गड्ढा खोदना। इस परंपरा में भारती जी ने कुछ नए तौर –तरीकों को भी जोड़ दिया। उन्होंने लगातार छोटे-बड़े तालाब बनवाये। इससे न सिर्फ उफरैंखाल की पहाड़ी हरी-भरी हुई, बल्कि लोगों की पेयजल की दिक्कत भी दूर हो गई।

आप ये जानकर हैरान रह जायेंगे कि भारती जी ऐसी 30 हजार से अधिक जल-तलैया बनवा चुके हैं। 30 हजार ! उनका ये भागीरथ कार्य आज भी जारी है और अनेक लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं।इन सभी से प्रेरणा लेते हुए हम अपने आस-पास जिस भी तरह से पानी बचा सकते हैं, हमें बचाना चाहिए। मानसून के इस महत्वपूर्ण समय को हमें गंवाना नहीं है। देवभूमि उत्तराखंड में भी तेजी पकड़ेगी। इसके लिए कार्ययोजना का खाका खींच लिया गया है। बारिश की बूंदों को सहेजने के लिए खाल-चाल, खंत्ती (छोटे बड़े तालाबनुमा गड्ढे) जैसे पारंपरिक तौर-तरीकों को धरातल पर तेजी से उतारा जाएगा। हर जिले में एक नदी को पुनर्जीवन मिलेगा तो जलस्रोतों के संरक्षण को भी ठोस कदम उठाए जाएंगे।

यही नहीं, पानी का अपव्यय रोकने के मद्देनजर अब प्रत्येक घर के पेयजल कनेक्शन पर मीटर लगाने की तैयारी है। नीति आयोग की रिपोर्ट ही बताती है कि उत्तराखंड में 300 के करीब जलस्रोत सूख चुके हैं या सूखने के कगार पर हैं। इस सबको देखते हुए राज्य सरकार ने भी जल संरक्षण को अपनी शीर्ष प्राथमिकता में रखा है। उम्मीद की जा रही है जलस्रोतों को पुनर्जीवन देने के लिए वर्षा जल संरक्षण की मुहिम में तेजी आएगी नदियों और जलस्रोतों को पुनर्जीवन देने के लिए कैचमेंट एरिया (जलसमेट क्षेत्र) पर खास फोकस किया गया है। कैचमेंट एरिया में जल संरक्षण में सहायक पौधों के रोपण के अलावा जलस्रोतों के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित की उम्मीद है

उत्तराखंड जल संसाधन प्रबंधन और नियामक आयोग (यूडब्ल्यूआरएमआरसी) का राज्य में गठन होगा। तब तक पानी के उपयोग व भुगतान के संबंध में उप्र जलसंभरण और सीवर व्यवस्था अधिनियम के प्रविधानों के तहत प्रभार लगाने और वसूली का कार्य उत्तराखंड जल संस्थान करेगा। पर्वतीय क्षेत्र में भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी, यमुना, भिलंगना, टौंस जैसी नदियां उच्च हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर से निकलती हैं। जबकि, अधिकांश छोटी, किंतु महत्वपूर्ण नदियों के स्रोत जंगलों में हैं। ये प्राकृतिक जलस्रोत वर्षा जल से रिचार्ज होते हैं। पहाड़ में अधिकांश गांवों की पेयजल योजनाएं भी इन्हीं जल स्रोतों पर बनी हैं।

लेकिन, कम होते जंगल और वर्षा का जल एकत्र न हो पाने के कारण ये जलस्रोत सही तरीके से रिचार्ज नहीं हो पा रहे हैं। इससे ग्रीष्म काल में ये सूखने की कगार पर आ जाते हैं। रिलायंस फाउंडेशन के परियोजना निदेशक ने बताया कि जल संरक्षण के लोक विज्ञान पर आधारित चाल-खाल से जलस्रोत को पुनर्जीवित करने का सरल उपाय हमारे पूर्वजों के पास था, लेकिन हमने इस ओर ध्यान देना छोड़ दिया। इसका असर जल स्रोतों पर भी देखने को मिला। अब कुछ गांवों के ग्रामीणों ने जल संरक्षण के लिए चाल-खाल बनाने और पुराने चाल-खाल को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है। जल जीवन के लिए ग्रामीणों का यह जन आंदोलन निश्चित रूप से सफल होगा और मिसाल बनेगा।

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