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पर्यटन बढ़ा व्यवस्थाएं नही संगम की सुंदरता पर गंदगी का ग्रहण

21/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
मंदाकिनी नदी उत्तराखंड की सबसे पवित्र और दिव्य नदियों में से एक है। यह नदी हिमालय की ऊँची पहाड़ियों से निकलकर केदारनाथ धाम के बगल से बहती है और आस्था, भक्ति और शांति की अनूठी अनुभूति कराती है।
मंदाकिनी केवल जल की धारा नहीं, बल्कि भगवान शिव की आध्यात्मिक कृपा का प्रत्यक्ष स्वरूप मानी जाती है।मंदाकिनी नदी उत्तराखंड की सबसे पवित्र और दिव्य नदियों में से एक है।यह नदी हिमालय की ऊँची पहाड़ियों से निकलकर केदारनाथ धाम के बगल से बहती है और आस्था, भक्ति और शांति की अनूठी अनुभूति कराती है।
मंदाकिनी केवल जल की धारा नहीं, बल्कि भगवान शिव की आध्यात्मिक कृपा का प्रत्यक्ष स्वरूप मानी जाती है।केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग को जोड़ने वाले रुद्रप्रयाग जवाडी बाईपास स्थित विश्वप्रसिद्ध संगम व्यू प्वाइंट आज अपनी प्राकृतिक सुंदरता और दिव्य संगम दृश्य के कारण लाखों श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. यहां से अलकनंदा और मंदाकिनी घाटियों के मनोरम दृश्य देखने के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं. लेकिन पर्यटन मानचित्र पर तेजी से उभर रही इस महत्वपूर्ण स्थल की वर्तमान स्थिति चिंताजनक होती जा रही है. व्यू प्वाइंट पर फैली गंदगी, प्लास्टिक कचरे के ढेर और बदहाल व्यवस्थाएं न केवल पर्यटन स्थल की छवि धूमिल कर रही हैं, बल्कि पर्यावरण और मंदाकिनी नदी के अस्तित्व के लिए भी गंभीर खतरा बनती जा रही हैं. स्थल पर पहुंचने वाले पर्यटकों को जहां एक ओर प्रकृति की अद्भुत छटा आकर्षित करती है, वहीं दूसरी ओर चारों तरफ बिखरी प्लास्टिक बोतलें, चिप्स और खाद्य पदार्थों के रैपर, पॉलीथिन और अन्य अपशिष्ट निराश भी कर रहे हैं. व्यू प्वाइंट के आसपास कई स्थानों पर कूड़े के ढेर साफ दिखाई देते हैं, जो इस बात की गवाही दे रहे हैं कि यहां नियमित सफाई और कचरा प्रबंधन की प्रभावी व्यवस्था लगभग नदारद है. खुले में पड़ा कचरा बारिश और तेज हवाओं के कारण धीरे-धीरे ढलानों के रास्ते नीचे बहकर मंदाकिनी नदी तक पहुंच रहा है. यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो नदी की स्वच्छता, जल गुणवत्ता और जलीय जीव-जंतुओं पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है. पर्यावरणविदों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में प्लास्टिक प्रदूषण का प्रभाव मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक घातक होता है, क्योंकि यहां कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण न होने पर वह सीधे जल स्रोतों और नदियों में पहुंच जाता है. स्थिति केवल नदी तक सीमित नहीं है. आसपास के वन क्षेत्रों में उड़कर पहुंच रहा प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट जंगलों के लिए भी गंभीर चुनौती बनता जा रहा है. वन्यजीवों द्वारा प्लास्टिक निगलने की घटनाएं कई स्थानों पर सामने आ चुकी हैं. ऐसे में संगम व्यू प्वाइंट के आसपास बढ़ता कचरा भविष्य में वन्यजीवों और स्थानीय जैव विविधता के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है. पर्यटकों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिस स्थान पर प्रतिदिन सैकड़ों वाहन और हजारों लोग पहुंचते हैं, वहां पर्याप्त डस्टबिन, सार्वजनिक शौचालय, पेयजल व्यवस्था और नियमित सफाई जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है. कई पर्यटकों ने सवाल उठाया कि जब सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, तब इतने महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल पर ठोस कचरा प्रबंधन की स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकी. राज्य सरकार एक ओर स्वच्छ और हरित उत्तराखंड की अवधारणा को बढ़ावा दे रही है, वहीं दूसरी ओर प्रमुख पर्यटन स्थलों पर गंदगी के बढ़ते ढेर इन दावों की पोल खोलते नजर आ रहे हैं. संगम व्यू प्वाइंट की वर्तमान स्थिति प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रही है. अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या प्रशासनिक घोषणाएं और प्रस्तावित योजनाएं समय पर धरातल पर उतर पाएंगी, या फिर प्रकृति की गोद में बसा यह खूबसूरत पर्यटन स्थल धीरे-धीरे गंदगी और प्लास्टिक प्रदूषण की भेंट चढ़ जाएगा? उत्तराखंड धर्म के हिसाब से चार धाम, पंचप्रयाग, पंचकेदार, पंचबदरी की पुण्यभूमि के रूप में जाना जाता है। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ व बदरीनाथ चार धाम हैं। देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, सोनप्रयाग एवं विष्णुप्रयाग नामक पाँच प्रयाग हैं। इनके अतिरिक्त भी गंगा और व्यास गंगा का संगम व्यास प्रयाग, भागीरथी का संगम गणेश प्रयाग नाम से प्रसिद्ध हैउत्तराखंड धर्म के हिसाब से चार धाम, पंचप्रयाग, पंचकेदार, पंचबदरी की पुण्यभूमि के रूप में जाना जाता है। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ व बदरीनाथ चार धाम हैं। देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, सोनप्रयाग एवं विष्णुप्रयाग नामक पाँच प्रयाग हैं। इनके अतिरिक्त भी गंगा और व्यास गंगा का संगम व्यास प्रयाग, भागीरथी का संगम गणेश प्रयाग नाम से प्रसिद्ध हैvयदि जिम्मेदार विभागों ने जल्द ठोस कदम नहीं उठाए तो संगम व्यू प्वाइंट की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता नहीं, बल्कि कूड़े के ढेर और बदहाल व्यवस्थाएं बनकर रह जाएंगी. मंदाकिनी नदी, जंगल और आने वाली पीढ़ियां शायद इस लापरवाही की भारी कीमत चुकाने को मजबूर हों.. र्यटन उद्योग के तेजी से विस्तार ने प्रदेश की अर्थव्यवस्था को नई गति दी है, लेकिन पर्यावरण, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था पर गंभीर दबाव भी बढ़ा है। पिछले पाँच वर्षों में पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई है, पर पर्यावरणीय अनुशासन और जागरूकता उसी तरह नहीं बढ़ी। इससे पर्यटन स्थलों, धार्मिक स्थलों और प्राकृतिक क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरा, मृदा प्रदूषण और वायु प्रदूषण जैसी समस्याएँ सामने आई हैं।
पर्यटन के कारण वाहन प्रदूषण बढ़ा है जिससे वायु गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। साथ ही ध्वनि प्रदूषण और जल स्रोतों पर दबाव भी बढ़ा है। उत्तराखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। स्थानीय लोगों ने बताया कि पर्यटक और स्थानीय व्यवसाय कचरा प्रबंधन के नियमों का पालन नहीं करते हैं, जो वन्यजीवों और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए खतरा है। उन्होंने पर्यटन क्षेत्र में अनुशासन की कमी को भी चिंता का विषय बताया।
समाधान के तौर पर स्वच्छता नियमों का कड़ाई से पालन, प्लास्टिक उपयोग में कमी, पर्यावरणीय आचार संहिता, कचरा प्रबंधन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और प्रदूषण नियंत्रण जैसे उपाय सुझाए गए हैं। स्थानीय निवासियों ने कहा कि उत्तराखंड के प्रकृति और संस्कृति के संरक्षण के बिना पर्यटन का स्थायी विकास संभव नहीं है।’लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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