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मोटर चालित कुएं घटा रहे हैं भूगर्भीय जल स्तर

11/02/21
in उत्तराखंड, संस्कृति
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पेयजल स्रोतों के जल स्तर में गिरावट आने के साथ ही भूगर्भीय जल स्तर भी लगातार कम हो रहा है। भूगर्भीय जल स्तर को घटाने में मोटर चालित कुएं प्रमुख कारण बनते जा रहे हैं। आलम ये है कि नगरीय इलाकों में औसतन हर दूसरे घर में भूगर्भीय पानी का प्रयोग किया जा रहा है। भूगर्भीय जल के प्रयोग के लिए किसी प्रकार के कायदे कानून न होने के कारण इसका मनमाना प्रयोग किया जा रहा है। हालात यह है कि चंपावत क्षेत्र में जहां कुछ वर्षो पूर्व तक 10 से 15 फिट में की खुदाई में पानी निकल आता था, वहीं अब 30 फिट की गहराई में भी पानी नहीं मिल रहा है। कमोवेश यही हाल लोहाघाट नगर के भी है। जहां वर्तमान में 40 फिट की खुदाई के बाद ही भूमिगत जल बाहर निकल रहा है। पर्यावरणविद बताते हैं कि एक दशक पूर्व तक जिले में पानी की समस्या गंभीर नहीं थी। वर्तमान में जंगलों का अत्यधिक दोहन होने से धरती में पानी की कमी हो रही है। पहले प्राकृतिक जल स्रोतों के आस पास पेड़ लगाना अनिवार्य होता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है।

जल संस्थान के अधिशासी अभियंता अशोक कुमार के अनुसार बीते एक दशक में पेयजल योजनाओं के स्रोतों में 40 से 50 फीसदी पानी की कमी हो गई है। जल स्तर घटने का सिलसिला प्रतिवर्ष बढ़ता जा रहा है। पर्वतीय भूभाग में पेयजल संकट गहराने के पीछे प्राकृतिक नौलों का संरक्षण न होना भी प्रमुख कारण बनता जा रहा है। पूर्व में गर्मियों के मौसम में पहाड़ के नौले पानी से लबालब भरे होते थे। लेकिन इन नौलों के संरक्षण की कोई कार्ययोजना नहीं बनाए जाने प्राकृतिक जलाशय लगातार सूखते जा रहे हैं। कुछ स्थानों में जो नौले बचे भी हैं तो उनमें एक बाल्टी पानी भरने में भी लोगों को मशक्कत करनी पड़ती है। गांव में नौला प्राकृतिक जल स्रोत के मानव निर्मित छोटे कुएं भर जाता था। इस पानी से रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती थीं, लेकिन अब ये नौला पूरी तरह सूख चुके हैं। पानी की कमी के कारण लोगों ने खेती करना बंद कर दिया है और मैदानी इलाकों में पलायन कर गए हैं।

जुलाई 2018 में प्रकाशित नीति आयोग की रिपोर्ट भी गंभीरता से रोशनी डालती है। हिमालय और पानी संरक्षण पर काम करने वाली विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से प्रकाशित श्रिपोर्ट ऑफ वर्किंग ग्रुप 1 इनवेंट्री एंड रिवाइवल ऑफ स्प्रिंग्स इन द हिमालयाज फॉर वाटर सिक्योरिटी के अनुसार संपूर्ण भारत में 50 लाख धाराएं हैं, जिनमें से 30 लाख अकेले भारतीय हिमालय क्षेत्र आईएचआर में हैं। 30 लाख में से आधी बारहमासी धाराएं सूख चुकी है, अथवा मौसमी धाराओं में तब्दील हो चुकी हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमालय क्षेत्र में छोटी रिहाइश को पानी उपलब्ध कराने वाली कम प्रवाह वाली करीब 60 प्रतिशत धाराएं पिछले कुछ दशकों में पूरी तरह सूख चुकी हैं। सिक्किम की धाराओं में पानी 50 प्रतिशत कम हो गया है। यह ऐसे राज्य के लिए बेहद चिंताजनक है जो पीने के पानी के लिए धाराओं पर पूरी तरह आश्रित है।

नीति आयोग की रिपोर्ट इसलिए भी चिंता में डालती है क्योंकि धारा सूखने का व्यापक असर पड़ रहा है। आईएचआर 2,500 किलोमीटर लंबे और 250 से 300 किमी़ चौड़े क्षेत्र में फैला है और इसमें 60,000 गांव हैं। इस क्षेत्र में 5 करोड़ लोग रहते हैं। जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा इसके दायरे में हैं। असम और पश्चिम बंगाल भी आंशिक रूप से इसके तहत आते हैं। यहां की करीब 60 प्रतिशत आबादी जल संबंधी जरूरतों के लिए धाराओं पर निर्भर है। अधिकांश उत्तराखंड में धारा आधारित पानी की ही आपूर्ति होती है जबकि मेघालय के सभी गांवों में पेयजलए सिंचाई और पशुओं के लिए धारा का पानी प्रयुक्त होता है। ऐसे में धाराओं को सूखना पहाड़ों में जीवन पर संकट के तौर पर देखा जा रहा है।

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसारए धाराओं के सूखने से केवल मनुष्य ही नहीं बल्कि जंगल और वन्यजीव भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। वन्यजीवों के लिए गड्ढों में मौजूद पानी का आधार प्राकृतिक धाराएं हैं। राष्ट्रीय उद्यानों और जंगलों में इन धाराओं के सूखने का मतलब है वन्यजीवों के लिए पानी का संकट। धारा का सूखना एक पक्षीय मसला नहीं है। मौजूदा धाराओं में पानी की गुणवत्ता भी चिंता का विषय है। रिपोर्ट के अनुसार सूक्ष्मजीव, सल्फेट, नाइट्रेट, फ्लोराइड, आर्सेनिक और आयरन प्रदूषण धाराओं में बढ़ रहा है। सेप्टिक टैंकों, घरों के गंदे पानी, पशुओं और चारे से कोलिफॉर्म बैक्टीरिया धाराओं के स्रोत एक्वफर पहाड़ों में भूमिगत जल भंडार में पहुंच रहा है। इसी तरह नाइट्रेट भी सेप्टिक टैंक, घर के गंदे पानी, कृषि उर्वरकों और पशुओं के माध्यम से धाराओं तक जा रहा है। पहाड़ों में धाराओं का संकट मुख्य रूप से अप्रत्याशित बारिश, भूकंप और पर्यावरण को पहुंची क्षति के कारण मंडराया है। पर्यावरण का क्षरण भू.उपयोग में परिवर्तन और विकास की तथाकथित गतिविधियों का मिलाजुला नतीजा है जिसने पहाड़ों में जल के स्रोत एक्वफर को प्रभावित किया है।पर्यावरणविद बताते हैं कि धाराएं इसलिए भी सूख रही हैं क्योंकि हमारे निर्माण वैज्ञानिक नहीं हैं। इन अवैज्ञानिक निर्माण की वजह से एक्वफर जलीय पर्त हिल जाते हैं और धाराएं बाधित हो जाती हैं। वहीं, एनविरोनिक्स ट्रस्ट में भूवैज्ञानिक श्रीधर रामामूर्ति के अनुसार, हमने धाराओं के स्रोत और डिस्चार्ज क्षेत्र को बाधित कर दिया है। धाराएं धीरे.धीरे पानी रिलीज करती हैं जो निर्माण गतिविधियों के कारण नहीं हो पा रहा है। पहाड़ों में शिमला और मसूरी जैसे घनी आबादी वाले शहरों के कारण जमीन के अंदर पानी नहीं जा रहा हैए उल्टा ऐसे शहर धाराओं को प्रदूषित करने में अपना योगदान दे रहे हैं।

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