डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
चमोली जिले के सीमांत जोशीमठ विकासखंड स्थित चांई गांव में माता सीता का एक अति प्राचीन मंदिर है। कहते हैं कि देश में यह एकमात्र मंदिर है, जहां माता सीता की पाषाण मूर्ति के अलावा अन्य किसी देवी-देवता की कोई मूर्ति नहीं है। मान्यता है कि सतयुग के अंतिम चरण में माता सीता ने राजा कुशध्वज की पुत्री वेदवती के रूप में यहां तपस्या की थी। यहीं पर वेदवती ने रावण को श्राप देते हुए स्वयं को उसके महाविनाश का कारण बताकर पाषाण रूप धारण किया था। तब से माता सीता इस क्षेत्र की आराध्य देवी बन गईं। त्रेता युग में वेदवती ने ही जनकसुता के रूप में जन्म लिया।माता सीता के इस मंदिर का संचालन श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति करती है। चांई गांव के लोगों का मानना है कि माता उनकी हर आपदा-विपदा से रक्षा करती है। वर्ष 2007, 2013 और फिर 2018 में आई भीषण आपदा में भी गांव सुरक्षित रहा, जबकि गांव के ऊपर से पांच नाले आते हैं और नीचे से भारी भू-धंसाव हुआ है। ग्रामीण बताते हैं कि गांव की खुशहाली एवं समृद्धि के लिए दशहरे के मौके पर यहां माता सीता के जागर लगाए जाते हैं। इस दौरान दो-दिवसीय मेले का आयोजन होता है और माता सीता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा में शामिल होने के लिए सभी धियाणियां (ब्याहता बेटियां) गांव बुलाई जाती हैं। चमोली जिले के सीमांत जोशीमठ विकासखंड स्थित चांई गांव में माता सीता का एक अति प्राचीन मंदिर है। कहते हैं कि देश में यह एकमात्र मंदिर है, जहां माता सीता की पाषाण मूर्ति के अलावा अन्य किसी देवी-देवता की कोई मूर्ति नहीं है। मान्यता है कि सतयुग के अंतिम चरण में माता सीता ने राजा कुशध्वज की पुत्री वेदवती के रूप में यहां तपस्या की थी। यहीं पर वेदवती ने रावण को श्राप देते हुए स्वयं को उसके महाविनाश का कारण बताकर पाषाण रूप धारण किया था। तब से माता सीता इस क्षेत्र की आराध्य देवी बन गईं। त्रेता युग में वेदवती ने ही जनकसुता के रूप में जन्म लिया।माता सीता के इस मंदिर का संचालन श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति करती है। चांई गांव के लोगों का मानना है कि माता उनकी हर आपदा-विपदा से रक्षा करती है। वर्ष 2007, 2013 और फिर 2018 में आई भीषण आपदा में भी गांव सुरक्षित रहा, जबकि गांव के ऊपर से पांच नाले आते हैं और नीचे से भारी भू-धंसाव हुआ है। ग्रामीण बताते हैं कि गांव की खुशहाली एवं समृद्धि के लिए दशहरे के मौके पर यहां माता सीता के जागर लगाए जाते हैं। इस दौरान दो-दिवसीय मेले का आयोजन होता है और माता सीता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा में शामिल होने के लिए सभी धियाणियां (ब्याहता बेटियां) गांव बुलाई जाती हैं। चमोली जिले के सीमांत जोशीमठ विकासखंड स्थित चांई गांव में माता सीता का एक अति प्राचीन मंदिर है। कहते हैं कि देश में यह एकमात्र मंदिर है, जहां माता सीता की पाषाण मूर्ति के अलावा अन्य किसी देवी-देवता की कोई मूर्ति नहीं है। मान्यता है कि सतयुग के अंतिम चरण में माता सीता ने राजा कुशध्वज की पुत्री वेदवती के रूप में यहां तपस्या की थी। यहीं पर वेदवती ने रावण को श्राप देते हुए स्वयं को उसके महाविनाश का कारण बताकर पाषाण रूप धारण किया था। तब से माता सीता इस क्षेत्र की आराध्य देवी बन गईं। त्रेता युग में वेदवती ने ही जनकसुता के रूप में जन्म लिया।माता सीता के इस मंदिर का संचालन श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति करती है। चांई गांव के लोगों का मानना है कि माता उनकी हर आपदा-विपदा से रक्षा करती है। वर्ष 2007, 2013 और फिर 2018 में आई भीषण आपदा में भी गांव सुरक्षित रहा, जबकि गांव के ऊपर से पांच नाले आते हैं और नीचे से भारी भू-धंसाव हुआ है। ग्रामीण बताते हैं कि गांव की खुशहाली एवं समृद्धि के लिए दशहरे के मौके पर यहां माता सीता के जागर लगाए जाते हैं। इस दौरान दो-दिवसीय मेले का आयोजन होता है और माता सीता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा में शामिल होने के लिए सभी धियाणियां (ब्याहता बेटियां) गांव बुलाई जाती हैं।चमोली जिले के ज्योतिर्मठ विकासखंड के चाईं गांव में स्थित माता-सीता का पौराणिक और धार्मिक महत्व का मंदिर आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. स्थानीय लोगों की मान्यता के अनुसार, यह उत्तर भारत का एकमात्र ऐसा प्राचीन मंदिर है, जो माता सीता को समर्पित है. वर्षों पुराना यह मंदिर अब पूरी तरह जर्जर और क्षतिग्रस्त हो चुका है. हालात ऐसे हैं कि मंदिर में पूजा-अर्चना तक संभव नहीं रह गई है. माता-सीता की प्रतिमा को एक कमरे में स्थापित कर वहीं नियमित पूजा कराई जा रही है. ये मंदिर BKTC के अंतर्गत आता है. दिलचस्प बात ये है कि बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति बीकेटीसी ने 2025-26 के लिए लगभग ₹127 करोड़ का वार्षिक बजट स्वीकृत किया था. इसके बावजूद उस पर लापरवाही के आरोप लग रहे हैं.स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि, यह मंदिर बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अधीन है, लेकिन लंबे समय से इसकी मरम्मत और पुनर्निर्माण को लेकर कोई ठोस पहल नहीं की गई. ग्रामीणों के अनुसार, मंदिर की खराब स्थिति को लेकर कई बार समिति को लिखित और मौखिक रूप से अवगत कराया गया, लेकिन इसके बावजूद आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.ग्रामीणों का कहना है कि, यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है. हर वर्ष यहां स्थानीय श्रद्धालु बड़ी संख्या में पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं. मंदिर की जर्जर स्थिति के कारण लोगों में चिंता और नाराजगी दोनों बढ़ रही है. उनका कहना है कि यदि समय रहते मंदिर का पुनर्निर्माण नहीं कराया गया, तो इस ऐतिहासिक धरोहर को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है. ग्राम प्रधान ने कहा कि ग्रामीणों की पहली प्राथमिकता मंदिर का संरक्षण और पुनर्निर्माण है. यदि बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति किसी कारणवश इस मंदिर की जिम्मेदारी निभाने में सक्षम नहीं है और अपना अधिकार छोड़ देती है, तो गांव के लोग स्वयं अपने संसाधनों और जनसहयोग से मंदिर का निर्माण कराने के लिए तैयार हैं. उन्होंने कहा कि ग्रामीण किसी भी कीमत पर इस प्राचीन धार्मिक धरोहर को समाप्त नहीं होने देंगे.स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी कहना है कि, उत्तर भारत के इस दुर्लभ सीता मंदिर की उपेक्षा न केवल धार्मिक आस्था बल्कि सांस्कृतिक विरासत की भी अनदेखी है. उनका कहना है कि सरकार और मंदिर समिति को इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जल्द पुनर्निर्माण की योजना बनानी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस ऐतिहासिक मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपरा और विरासत को सुरक्षित देख सकें.ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने उम्मीद जताई है कि उनकी वर्षों पुरानी मांग पर अब संबंधित विभाग और बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति गंभीरता से विचार करेगी और माता सीता के इस प्राचीन मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए जल्द आवश्यक कार्रवाई शुरू की जाएगी. फिलहाल श्रद्धालुओं की आस्था एक अस्थायी कमरे में स्थापित माता सीता की प्रतिमा के सामने कायम है, लेकिन सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आखिर इस ऐतिहासिक मंदिर को उसका पुराना स्वरूप वापस कब मिल पाएगा. चाई गांव में स्थित सीता माता का पौराणिक मंदिर है। उत्तर भारत में एकमात्र सीता माता के इस पौराणिक मंदिर को लेकर पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। लेकिन बीकेटीसी के अधीन यह मंदिर तीन साल पहले जर्ज हो गया था। मंदिर की स्थिति ऐसी है कि कभी भी गिर सकता है। तीन साल से समिति को मंदिर की स्थिति से अवगत करा रहे हैं। लेकिन कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मजबूरी में माता सीता की मूर्ति को एक कमरे में शिफ्ट करना पड़ा। वहीं पर पूजा अर्चना की जा रही है। ग्राम प्रधान का कहना है कि यदि बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति इस मंदिर से अपना अधिकार छोड़ देती है तो ग्रामीण खुद के संसाधनों से इसका निर्माण कर लेंगे। वहीं ग्रामीण का कहना है कि यदि नवरात्रि तक मंदिर निर्माण का कार्य आरंभ नहीं होता है तो हम चंदा व दान एकत्र कर निर्माण शुरू कर देंगे। चांई गांव पहुंचने के लिए ब्लॉक मुख्यालय जोशीमठ से मारवाड़ी पुल होते हुए 15 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। 570 की आबादी वाले इस गांव तक सड़क सुविधा उपलब्ध है। फूलों की खूबसूरत ‘चेनाप घाटी’ का रास्ता भी इसी गांव से होकर जाता है। चेनाप घाटी चमोली जिले में स्थित दूसरी फूलों की घाटी है, जिसे आज तक पर्यटन मानचित्र पर जगह नहीं मिल पाई। ग्रामसभा चांई के प्रधान ह बताते हैं कि दशहरे के अलावा नंदाष्टमी के मौके पर भी ग्रामसभा में माता सीता के जागर (धार्मिक आह्वान गीत) लगाए जाते हैं। श्री बदरीनाथ धाम के पुजारी रघुनंदन डिमरी बताते हैं कि वर्ष 1960 से पूर्व चांई गांव में लकड़ी का पठाल वाला मंदिर था। इसके बाद ग्रामीणों ने नया मंदिर बनाया। श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति की ओर से ही इस मंदिर के लिए पुजारी नियुक्त किया जाता है। कई बार समिति के अधिकारी व पदाधिकारी इस मंदिर का निरीक्षण कर चुके हैं, इस मामले में बीकेटीसी अध्यक्ष ने कहा कि “सीता माता मंदिर का निरीक्षण किया गया है। इसके जीर्णोद्धार की योजना बनाई जा रही है। कुछ दानी-दाताओं से बातचीत चल रही है। जर्जर मंदिरों का जीर्णोद्धार किया जाएगा और सीता माता मंदिर को भी व्यवस्थित किया जाएगा।” हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि बयान कई बार आ चुके हैं, अब ज़मीन पर काम दिखना चाहिए। लेकिन आज तक मंदिर निर्माण की दिशा में कोई काम नहीं हुआ है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











