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सेहत के लिहाज से अहम हैं उत्तराखंड के जंगली फल

13/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल को कुदरत ने बेपनाह खूबसूरती प्रदान की है। यहां प्रकृति ही नहीं, सभ्यता में, संस्कृति में, संस्कारों में, रीति-रिवाज एवं परंपराओं में जितनी स्निग्धता है, उतनी ही विविधता भी। यही वजह है कि दूर रहकर कठोर नजर आने वाला पहाड़ करीब जाने पर अंतर्मन को आल्हादित कर देता है। यह वही पहाड़ है, जो अनंतकाल से मानवता को नाना रूपों में सुख-समृद्धि बांटता रहा है और आज भी यह क्रम अनवरत जारी है। पहाड़ की उदारता देखिए कि अपनी शरण में आए किसी भी जीव को उसने कभी भूखा-प्यासा नहीं सोने दिया। उसने अपने वनों को औषधीय संपन्नता प्रदान की तो उन्हें फूल-फलकर जन से जुडऩे का आशीष भी दिया। तभी तो हिमालय में पाए जाने वाले जंगली फल यहां की लोक संस्कृति में गहरे तक रच-बस गए। ये जंगली फल न केवल स्वाद, बल्कि सेहत की दृष्टि से भी बेहद अहमियत रखते हैं।बेडू, तिमला, मेलू (मेहल), काफल, अमेस, दाडि़म, करौंदा, बेर, जंगली आंवला, खुबानी, हिंसर, किनगोड़, खैणु, तूंग, खड़ीक, भीमल, आमड़ा, कीमू, गूलर, भमोरा, भिनु समेत जंगली फलों की ऐसी सौ से ज्यादा प्रजातियां हैं, जो पहाड़ को प्राकृतिक रूप में संपन्नता प्रदान करती हैं। इन जंगली फलों में विटामिन्स और एंटी ऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। अच्छी बात यह है कि इन्हीं गुणों की वजह से धीरे-धीरे ये पहाड़ की आर्थिकी से भी जुडऩे लगे हैं। दरअसल, जंगली फलों के साथ इनके पेड़, फूल, पत्ते, छाल व जड़ें विभिन्न औषधियों के निर्माण ही नहीं, रंग, चर्मशोधक आदि बनाने में भी सहायक हैं। बावजूद इसके ज्यादातर फलों की व्यावसायिक उपयोगिता के बारे में स्थानीय लोगों को जानकारी न होने के कारण वह बाजार से नहीं जुड़ पाए। अगर इस ओर ध्यान दिया जाए तो ये जंगली फल पहाड़ में विकास की एक नई परिभाषा गढ़ सकते हैं। कुछ प्रमुख जंगली फलों की खूबियों से हम भी परिचित हो लें।बेडु पाको बारामासा, नारैणा काफल पाको चैता।’ इस उत्तराखंडी लोकगीत पर भले ही लोगों की थिरकन बढ़ जाती हो और वे खुद के पहाड़ की वादियों में होने का अहसास करते हों, पर जिन फलों का इसमें जिक्र हुआ है, क्या वे उनके बारे में भी जानते हैं। अधिकांश का जवाब ना में होगा। असल में महत्व न मिलने से बेडू, तिमला, काफल, मेलू, घिंघोरा, अमेस, हिंसर, किनगोड़ जैसे जंगली फल हाशिये पर चले गए। जबकि स्वादिष्ट एवं सेहत की दृष्टि से महत्वपूर्ण इन फलों को बाजार से जोड़ने पर ये आर्थिकी संवारने का जरिया बन सकते हैं, मगर अभी तक इस दिशा में कोई पहल होती नहीं दीख रही।उत्तराखंड में पाए जाने वाले जंगली फल यहां की लोकसंस्कृति में गहरे तक तो रचे बसे हैं, मगर इन्हें वह महत्व आज तक नहीं मिल पाया, जिसकी दरकार है। अलग राज्य बनने के बाद जड़ीबूटी को लेकर तो खूब हल्ला मचा, मगर इन फलों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी गई। और ये सिर्फ लोकगीतों तक ही सिमटकर रह गए। देखा जाए तो ये जंगली फल न सिर्फ स्वाद, बल्कि सेहत की दृष्टि से कम अहमियत नहीं रखते। बेडू, तिमला, मेलू, काफल, अमेस, दाड़िम, करौंदा, जंगली आंवला व खुबानी, हिसर, किनगोड़, तूंग समेत जंगली फलों की ऐसी सौ से ज्यादा प्रजातियां हैं, जिनमें विटामिन्स और एंटी ऑक्सीडेंट की भरपूर मात्रा है। विशेषज्ञों के अनुसार इन फलों की इकोलॉजिकल और इकॉनामिकल वेल्यू है। इनके पेड़ स्थानीय पारिस्थितिकीय तंत्र को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाते हैं, जबकि फल सेहत व आर्थिक दृष्टि से अहम हैं।बात सिर्फ इन जंगली फलों को महत्व देने की है। अमेस (सीबक थार्म) को ही लें तो चीन में इसके दो-चार नहीं पूरे 133 प्रोडक्ट तैयार किए गए हैं और वहां के फलोत्पादकों के लिए यह आय का बड़ा स्रोत है। उत्तराखंड में यह फल काफी मिलता है, पर इस दिशा में अभी तक कोई कदम नहीं उठाए गए हैं। काफल को छोड़ अन्य फलों का यही हाल है। काफल को भी जब लोग स्वयं तोड़कर बाहर लाए तो इसे थोड़ी बहुत पहचान मिली, लेकिन अन्य फल तो अभी भी हाशिये पर ही हैं। पद्मश्री डा.अनिल जोशी कहते हैं कि उत्तराखंड में पाए जाने वाले जंगली फल पौष्टिकता की खान हैं। लिहाजा, अब वक्त आ गया है कि इन फलों को भी महत्व दिया जाए। जंगली फलों की क्वालिटी विकसित कर इनकी खेती की जाए और इसके लिए मिशन मोड में कार्ययोजना तैयार करने की जरूरत है। वह जंगली फलों को क्रॉप का दर्जा देने की पैरवी भी करते हैं।
जंगली फलों में पोषक तत्व
फल————–पोषक तत्व
काफल———-अन्य फलों की अपेक्षा 10 गुना ज्यादा विटामिन सी
अमेस———–विटामिन सी
खुबानी———-विटामिन सी, एंटी ऑक्सीडेंट
आंवला———-विटामिन सी, एंटी ऑक्सीडेंट
तिमला———-विटामिन्स से भरपूर
बेडू————–विटामिन्स से लबरेज
उपेक्षा का दंश झेल रहे जंगली फलों को महत्व देते हुए पूर्व में उद्यान विभाग ने मेलू (मेहल), तिमला, आंवला, जामुन, करौंदा, बेल समेत एक दर्जन जंगली फलों की पौध तैयार कराने का निर्णय लिया। इस कड़ी में कुछ फलों की पौध तैयार कर वितरित भी की जा रही है, लेकिन इसे विस्तार मिलना अभी बाकी है।
लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत  हैं।

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