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उत्तरकाशी में मंडरा रहा नया खतरा!

12/08/25
in उत्तरकाशी, उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तरकाशी के धराली गांव में आई आपदा ने भारी तबाही मचाई है, जहां जान के साथ-साथ माल का भी भारी नुकसान हुआ है. साथ ही धराली में आई अचानक बाढ़ ने भागीरथी नदी का रास्ता बदल दिया. इसरो के सैटेलाइट इमेज से पता चला है कि बाढ़ ने नदी के रास्ते को चौड़ा करते हुए उसका आकार बदल दिया है. बाढ़ के चलते भागीरथी नदी की सहायक खीर गद ने किनारे की मिट्टी को बहा दिया. इसके चलते नदी अपने पुराने रास्ते पर लौट आई है.उत्तरकाशी धराली आपदा ऐसे जख्म दे गई, जो आजीवन नहीं भर पाएंगे. धराली महातबाही के खौफनाक तस्वीर को याद कर अभी भी लोगों की रूह कांप जाती है. साथ ही इस त्रासदी ने कई अंतहीन सवाल भी छोड़े हैं. कई लोग अपनों को तलाशने में जुटे हैं. लेकिन हर किसी की किस्मत नेपाली मूल के रहने वाले लालमणि अधिकारी जैसी नहीं है, जो धराली आपदा में लापता अपने बेटे को तलाशने के लिए जद्दोजदह कर रहा था, जिसकी झोली में पुलिस ने अच्छी खबर डाल दी. बेटे के मिलने के बाद जैसे पिता को उसका खोया संसार फिर से मिल गया और उसके आंखू से खुशी के आंसू छलक पड़े. उत्तराखंड की धामी सरकार आपदाग्रस्त क्षेत्र में प्रभावितों के आंसू पोंछने में लगी हुई है और रेस्क्यू ऑपरेशन तेजी से चलाया जा रहा है. लेकिन हर्षिल, धराली आपदा में कई लोग लापता हैं, जिनकी की तलाश में परिजन काफी परेशान हैं. नेपाली मूल के लालमणि अधिकारी का बेटा धराली आपदा के बाद लापता था. परिजनों का उससे कोई संपर्क नहीं हो पा रहा था. जिसके बाद परिजन काफी परेशान थे और उन्हें अनहोनी की चिंता सता सताने लगी थी. इसी बीच टिहरी जिले में निवास कर रहे लालमणि अधिकारी ने 112 पर कॉल कर बताया गया कि उनका बेटा आपदा के दौरान धराली, हर्षिल क्षेत्र में था. उत्तरकाशी धराली जलप्रलय ने लोगों के घर, होटल और होमस्टे को मलबे में दफन कर दिया. इस त्रासदी में जो लोग बचे हैं, उनके पास सिर छिपाने की तरह की जगह नहीं बची है. आपदा के बाद चारों तरफ सन्नाटा पसरा है. वहीं नियति ने जो जख्म लोगों को दिए हैं, उनके आंखों में साफ झलक रहे हैं. लोग जहां भी नजर दौड़ा रहे हैं वहां उन्हें मलबे का ढेर नजर आ रहा है, जिसमें वो अपनों को तलाश रहे हैं. उत्तरकाशी धराली जलप्रलय ने लोगों के घर, होटल और होमस्टे को मलबे में दफन कर दिया. इस त्रासदी में जो लोग बचे हैं, उनके पास सिर छिपाने की तरह की जगह नहीं बची है. आपदा के बाद चारों तरफ सन्नाटा पसरा है. वहीं नियति ने जो जख्म लोगों को दिए हैं, उनके आंखों में साफ झलक रहे हैं. लोग जहां भी नजर दौड़ा रहे हैं वहां उन्हें मलबे का ढेर नजर आ रहा है, जिसमें वो अपनों को तलाश रहे हैं.उत्तरकाशी के धराली में आई त्रासदी के बाद भागीरथी नदी के पास एक नई झील का निर्माण हो गया है. ये झील खीर गंगा और तैलसांग नदी के मलबे की वजह से बन गई है. जिसने भागीरथी के प्रवाह को रोक दिया है. जिसके चलते यहां करीब एक किलोमीटर लंबी झील बन गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस झील का समय रहते वैज्ञानिक तरीके से ट्रीटमेंट नहीं किया गया, तो अचानक पानी का बहाव नीचे की ओर आकर विनाशकारी बाढ़ ला सकता है. झील निर्माण से बढ़े खतरे को देखते हुए प्रशासन और आपदा प्रबंधन टीम लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है. उत्तरकाशी के धराली में आई त्रासदी के बाद भागीरथी नदी के पास एक नई झील का निर्माण हो गया है. ये झील खीर गंगा और तैलसांग नदी के मलबे की वजह से बन गई है. जिसने भागीरथी के प्रवाह को रोक दिया है. जिसके चलते यहां करीब एक किलोमीटर लंबी झील बन गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस झील का समय रहते वैज्ञानिक तरीके से ट्रीटमेंट नहीं किया गया, तो अचानक पानी का बहाव नीचे की ओर आकर विनाशकारी बाढ़ ला सकता है. झील निर्माण से बढ़े खतरे को देखते हुए प्रशासन और आपदा प्रबंधन टीम लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है. इस झील को मैनुअल तरीके से चैनलाइज किया जाएगा इसके लिए आज 30 लोगों का एक दल वहां के लिए रवाना होगा जो मैनुअल तरीके से झील का पानी कम करने का प्रयास करेगा, क्योंकि बड़ी मशीन वहां तक ले जाने में अभी 10 से 15 दिन लग सकते है. अभी इतना समय भी नहीं है, इसलिए मैनुअल तरीके से झील को चैनलाइज करने का प्लान बनाया गया है.विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तरकाशी जैसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में समय-समय पर भूगर्भीय सर्वे और नालों की सफाई जैसे कदम आवश्यक हैं, ताकि मलबा जमा होकर नदी के प्रवाह को न रोके. साथ ही, आपदा के बाद बनने वाली झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन और प्रबंधन अनिवार्य है. जिससे अचानक बाढ़ की आशंका को रोका जा सके.  इस झील को मैनुअल तरीके से चैनलाइज किया जाएगा इसके लिए आज 30 लोगों का एक दल वहां के लिए रवाना होगा जो मैनुअल तरीके से झील का पानी कम करने का प्रयास करेगा, क्योंकि बड़ी मशीन वहां तक ले जाने में अभी 10 से 15 दिन लग सकते है. अभी इतना समय भी नहीं है, इसलिए मैनुअल तरीके से झील को चैनलाइज करने का प्लान बनाया गया है. आपदा के बाद से ही एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस और आईटीबीपी की टीमें राहत व बचाव कार्य में जुटी हैं. अब तक छह शव बरामद किए जा चुके हैं. जबकि 48 लोग अब भी लापता हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, लापता लोगों में सबसे ज्यादा 14 उत्तराखंड के निवासी हैं, जबकि नेपाल के 9, बिहार के 12, उत्तर प्रदेश के 3, राजस्थान का 1 और सेना के एक जवान का भी कोई पता नहीं चल सका है.धराली और आसपास के क्षेत्रों में पर्यटन मुख्य आजीविका का स्रोत है. आपदा के कारण यहां का पर्यटन पूरी तरह ठप हो गया है. होटल, दुकानों और परिवहन सेवाओं के ठप पड़ने से लोगों की रोजी-रोटी पर गहरा संकट आ गया है. स्थानीय लोग उम्मीद कर रहे हैं कि सड़क संपर्क बहाल होने और सुरक्षा सुनिश्चित होने के बाद धीरे-धीरे पर्यटन फिर से पटरी पर आएगा.विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तरकाशी जैसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में समय-समय पर भूगर्भीय सर्वे और नालों की सफाई जैसे कदम आवश्यक हैं, ताकि मलबा जमा होकर नदी के प्रवाह को न रोके. साथ ही, आपदा के बाद बनने वाली झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन और प्रबंधन अनिवार्य है. जिससे अचानक बाढ़ की आशंका को रोका जा सके.पहाड़ी राज्य उत्तराखंड प्राकृतिक आपदाओं और भूकंपीय दृष्टि से अति संवेदनशील है. इसका एक उदाहरण उत्तरकाशी का धराली आपदा है. जो भारी तबाही के साथ ही चेतावनी भी अब सरकार इस दिशा में गंभीरता से कदम उठाएगी। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पहाड़ी राज्य में तेजी से हो रहा अनियंत्रित निर्माण अब प्रकृति के लिए खतरे की घंटी बनता जा रहा है। धराली का भयंकर मंजर अब भी डरा रहा है। प्राकृतिक सौंदर्य और जैव विविधता से भरपूर इन पर्वतीय इलाकों में बेतहाशा इमारतों और सड़कों का निर्माण न केवल पर्यावरणीय संतुलन बिगाड़ रहा है, बल्कि आपदा का बड़ा कारण भी बन रहा है। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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