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श्रीमती वीना तिवारी लोक संस्कृति की अडिग प्रहरी श्रीमती वीना तिवारी

14/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून, संस्कृति
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखण्ड के लोक गायन में श्रीमती वीना तिवारी का नाम एक सुपरिचित लोक गायिका के तौर पर उभर कर आता है। उनके कंठ से उपजे हर गीत हर लोगों के मन में आज भी गहराई तक रचे-बसे हैं। उनकी सुरीली आवाज में गजब का आकर्षण रहता है जिसमें पहाड़ के लोक की भीनी सुगन्ध हर समय महकती रहती है। पिचहत्तर बसन्त देख चुकीं वीना तिवारी के गायन में पहले जैसी मधुरता उसी पहाड़ी ठसक के साथ उसी रुप में आज भी बरकरार है।
आज से कोई 50 साल पूर्व आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले कई कुमाउनी गीतों की गूंज आज भी जब-तब मन के कोने में समाये हुए हैं। सत्तर का यह दशक हमारे सुनहरे बचपन का दौर हुआ करता था। दिन ढलते ही छःह बजे के आसपास हम रेडियो के आसपास इकट्ठा हो जाते। लखनऊ के आकाशवाणी केन्द्र से पहाड़ के लिए प्रसारित होने वाला उत्तरायण कार्यक्रम तब उस समय एक घण्टे चला करता था। जिसमें बंशीधर पाठक जिज्ञासु व जीत जड़धारी जैसे सधे हुए दमदार संचालकों की भूमिका उस कार्यक्रम को विशिष्टि बना देती थी। पहाड़ के समाज, संस्कृति, बोली-भाषा व साहित्य पर वार्ता, कहानी, रुपक, भेटवार्ता, रेडियो नाटक के साथ-साथ आकाशवाणी का उत्तरायण का यह कार्यक्रम पहाड़ के डानों-कानों, गाड़-गधेरों व वन प्रान्तों में उपजे एक से बढ़कर एक गढ़वाली व कुमाउनी लोकगीतों से पर्वतवासियों को रु-ब-रु कराने में अपनी शानदार भूमिका निभा रहा था। पहाड़ के अनेक फौजी भाइयों का इस कार्यक्रम से गहराई से लगाव था। पहाड़ का गीत-संगीत उत्तरायण कार्यक्रम के माध्यम से उस दौर में जन-जन में अपनी पैठ बनाने में सफल दिखता था। जीतसिंह नेगी, केशब अनुरागी, चन्द्र सिंह राही ,कबूतरी देवी, मोहन उप्रेती व नईमा खान उप्रेती,रमेश जोशी, भानुराम सुकोटी जैसे गायकों के मध्य वीना तिवारी के मधुर कंठ से उपजे गीत उस दौरान खूब प्रसारित हुए। रेडियो के नियमित श्रोताओं की तरफ से तब वीना तिवारी के गाये गीत ‘पाराक भिड़पन जाणिंया बटोवा रे म्यर उनहुण इक लिजै दे जबाब‘ और ’झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी…लागला बिलौरी का घामा’ जैसे अन्य कई गीतों को सुनाने की फरमाइसें आते रहती थी। इनमें अधिकांश फरमाइस दूर बार्डर पर डठे फौजी भाईयों की ओर से सुनने को मिलती।
वीना तिवारी ने अनेक कुमाउनी लोकगीतों को अपने सुरीले कंठ से स्वर दिये हैं। कुमाऊनी गीतों के साथ ही उन्होंने कुछ गढवाल के लोकगीतों को भी अपना स्वर दिया है। माता श्रीमती मोहिनी देवी व पिता श्री कृष्ण चन्द्र के घर लखनऊ शहर में हुआ। इनका पैतृक गांव अल्मोड़ा के निकट ज्योली-हवालबाग है। वीना तिवारी की शैक्षिक व र सांगीतिक पृष्ठभूमि को देखें तो उन्होंने बी0ए0, संगीत निपुण शिक्षा लेकर भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय लखनऊ से वोकल में परास्नातक की उपाधि ली है।एक संगीत अध्यापिका के बतौर पर भी उन्होंने कुछ समय नौकरी की है। वीना जी ने संगीत की शिक्षा गोबिन्द नारायण नाटू ,श्री कृष्ण नारायण रातनजनकर से प्राप्त की है। इन्हें कुछ समय बेगम अख्तर तथा बिरजू महाराज के सानिध्य में भी संगीत सीखने का अवसर भी प्राप्त हुआ है। मोती लाल नेहरू कन्या इन्टर कालेज न्यू हैदराबाद, लखनऊ में लगभग छःह सालों तक बारह से अधिक सालों तक दयावती मोदी एकेडेमी रामपुर (उ0प्र0) में भी संगीत शिक्षिका के रूप में सेवाएं प्रदान की हैं।
आकाशवाणी लखनऊ से उनका जुड़ाव साठ के दशक के आरम्भ में हुआ। वीना जी ’बी हाईग्रेड ’कलाकार के रूप में वर्ष 1963 में आयीं और ’’उत्तरायण कार्यक्रम’’ से सम्बद्ध रही। आपने कुमाउनी व गढ़वाली लोकगीतों के अलावा हिन्दी गीत, भजन एवं गजलों का गायन भी किया है। लखनऊ आकाशवाणी केन्द्र के अलावा आकाशवाणी, रामपुर, नजीबाबाद, तथा अल्मोड़ा केन्द्र से भी आपके कई कार्यक्रमों का प्रसारण हुआ है। वीना तिवारी ने पहाड़ के अनेक प्रतिष्ठित गीतकारों के सानिध्य में अपनी बेहतरीन गीत प्रस्तुतियां दी हैं। इनमें अल्मोड़ा के स्व. चारूचन्द्र पाण्डे,स्व. बृजेन्द्र लाल साह, गरूड़ के श्री गोपालदत्त भट्ट, लखनऊ के स्व. वंशीधर पाठक ’जिज्ञासु’, सल्ट के स्व. हीरा सिंह राणा, पौड़ी के स्व.चन्द्र सिंह राही, व स्व.केशव अनुरागी, नैनीताल के स्व.गिरीश तिवाड़ी ’गिर्दा’ और स्व. शेरसिंह बिष्ट ’अनपढ़’ आदि प्रमुख नाम रहे हैं ।
वीना तिवारी ने हांलाकि सैकड़ो गीत गाये हैं परन्तु उनके द्वारा गाये गये कई लोकगीत अत्यधिक चर्चित व लोकप्रिय रहे, जिनमें मुख्य रूप से ’छाना बिलोरी झन दिया बौज्यू…लागला बिलौरी का घामा…’ लोकगीत सर्वाधिक लोकप्रिय माना जाता है। इसके अलावा ’बाट लागी बरयात चेेली भैट डोली मां…’, ओ परूवा बौज्यू चपल कि ल्याछा यस..’, ’पाराक भिड़पन जाणिंया बटोवा रे… म्यर उनहुण इक लिजै दे जबाब…’ के साथ ही चारू चन्द्र पांडे जी रचित कुमाउनी होली गीत ’गिरधारी तेरो अति चकान…जशोदा, म्यर दै कि कमलि घुरै गो, और ’बुरूशी को फूलों को कुमकुम मारो..डाना-काना छजि गै बसंती नरंगी..’ जैसे अति लोकप्रिय गीतों के साथ ही ’ऋतु औनी रौली..भंवर उड़ाला बलि..हमारा मुलुका भंवर उड़ाला बलि..’ , ’दिन-दिन आखिन बरसन रै गईं…’ पर्वतीय समाज में बहुत ही लोकप्रिय रहे हैं। वीना जी ने कई गढ़वाली गीतों का भी गायन किया है। उनका गाया एक गढ़वाली मांगल गीत ’दे देवा बावाजी कन्या को दान…’ लोगों की जबान पर था। उन्होंने गढ़वाल अंचल की लोकप्रिय लोकगाथा पर आधारित ’’ रामी बौराणी ’’ का गढ़वाली व हिन्दी गायन बहुत ही बेहतरीन किया था। इसके अलावा वीना तिवारी को प्रख्यात भजन व गजल गायक अनूप जलोटा के साथ भी कुछ गीत गाने के अवसर मिले हैं जिसे लोगों द्वारा बहुत सराहना मिली।
आकाशवाणी लखनऊ से प्रसारित होने वाले कुछ धारावाहिकों/रूपकों आदि में भी वीना तिवारी जी को वाचिक अभिनय करने का अवसर मिला। वर्ष 2022 के गणतंत्र दिवस की बीटिंग रिट्रीट परेड हेतु उनके द्वारा संगीतबद्ध व आकाशवाणी में अपने स्वर में रिकॉर्ड किये गये गीत ’’ झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी’’ की धुन का चयन किया गया इसे तत्कालीन समय में मीडिया मे खूब चर्चा भी मिली।आपको समय-समय पर अनेकों विभिन्न संस्था/संगठनों की ओर से सम्मान भी दिये गये हैं। इनमें मुख्यतः क्रियेटिव उत्तराखण्ड – म्यर पहाड की तरफ से जनकवि शेरदा स्मृति सम्मान – 2013, ’भिटौली’ कार्यक्रम के तहत शैल सांस्कृतिक समिति, रूद्रपुर द्वारा प्रदत्त सम्मान- 2019, मोहन उप्रेती लोकसंस्कृति कला एवं शोध समिति द्वारा मोहन उप्रेती लोक संस्कृति सम्मान -2021, कल्याणी महिला समिति , हल्द्वानी, की ओर से कबूतरी देवी सम्मान एवं पुरस्कार, लोक प्रकृति संस्था, बग्वालीपोखर , अल्मोड़ा से ’लोक प्रकृति’ सम्मान’ ,राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मेलन के अवसर पर ’पहरू’ कुमाउनी मासिक पत्रिका की ओर से वैद्य कल्याण सिंह बिष्ट स्मृति कुमाउनी संस्कृति सेवी सम्मान-2022,जोहार महोत्सव सम्मान-2022,अभिव्यक्ति कार्यशाला सम्मान-2022 और यंग इण्डिया सिन अवार्ड र्नइ दिल्ली द्वारा प्रदत्त यंग इण्डिया लीजेन्डरी सिंगर अवार्ड-2022, बड़थ्वाल कुटुम्ब की ओर से लोक संस्कृति सम्मान -2023 और लोकगायक पप्पू कार्की की 39वीं जयन्ती समारोह पर विशिष्ट सम्मान -2023 मिल चुका है।
बातचीत में कुमाउनी बोली का प्रयोग और व्यवहार में अत्यंत सहज, सरल और मृदुभाषी वाना तिवारी जी का सबसे बड़ा ही आत्मीय लगाव बना रहता है। सप्ताह में दो-तीन बार फोन पर कुशल बात पूछने का उनका क्रम वर्तमान तक नियमित बना हुआ है। कुमाउनी संस्कृति तथा बोली-भाषा के प्रति उनका अगाध प्रेम निश्चित ही प्रेरणादायी है। उनके चिर स्वास्थ एवं सफल संगीत जीवन की सुखद कामना करते हुए उनसे पर्वतीय गीत संगीत के संरक्षण और उसे नये आयाम तक पहुंचाने की आशा रखते हैं।आपके सुदीर्घ एवं निरोगी जीवन की कामना करता हूं
लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।

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