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पहाड़ में खत्म न होने वाला इंतजार

23/08/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

उत्तराखंड में जब आपदा के समय पहाड़ पर कुछ भी होता है, तो सिर्फ सड़कें पुल और मकान ही नहीं टूटते, कई परिवारों की जिंदगी भी अचानक ठहर जाती है. कोई नदी के उफान में बह जाता है, कोई मलबे के नीचे दब जाता है. कोई भूस्खलन के बाद जंगल और खाइयों के बीच कहीं गुम हो जाता है, तो कोई ट्रेकिंग के दौरान अपने साथियों से बिछड़ने के बाद फिर कभी दिखाई नहीं देता.हादसे के बाद प्रशासन और आपदा राहत एजेंसियां पूरी ताकत के साथ सर्च ऑपरेशन शुरू करती हैं. लेकिन हर लापता व्यक्ति की कहानी, शव मिलने या सुरक्षित घर लौटने के साथ खत्म नहीं होती. कई मामलों में दिन सप्ताह में और सप्ताह महीनों में बदल जाते हैं, मगर परिवार के पास जवाब नहीं आता. उत्तराखंड में पिछले कुछ महीनों के दौरान सामने आए ऐसे मामलों ने अब एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. क्या प्रदेश में आपदा के बाद रेस्क्यू सिस्टम उतनी ही तेजी से काम करता है, जितनी तेजी से पहाड़ में हादसा होता है. अगर किसी का सुराग नहीं मिलता है, तो उसकी तलाश की आखिरी सीमा आखिर कौन तय करता है. चमोली जिले के पीपलकोटी क्षेत्र में THDC की निर्माणाधीन विष्णुगाड़-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की सुरंग में 13 अगस्त को हुए हादसे ने एक बार फिर उत्तराखंड की आपदा और रेस्क्यू व्यवस्था की परीक्षा ले ली. सुरंग में अचानक पानी और मलबा घुसने के बाद वहां काम कर रहे श्रमिक फंस गए. शुरुआती चरण में बड़ी संख्या में श्रमिकों को बाहर निकाला गया. लेकिन हादसे ने कई परिवारों को ऐसी चिंता में डाल दिया, जिसका जवाब अभी तक नहीं मिला है. 16 अगस्त तक एक और शव बरामद हुआ. फिर 18 अगस्त को एक और डेड बॉडी मिली. एक श्रमिक अब भी लापता है. सुरंग के भीतर पानी, गाद और मलबे के कारण रेस्क्यू टीमों के सामने लगातार मुश्किलें बनी हुई हैं. यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उत्तराखंड में लापता लोगों की तलाश की चुनौती का सबसे ताजा उदाहरण बन गया है. जिस सुरंग में कुछ दिन पहले मजदूर रोज की तरह काम कर रहे थे, वही अब उनके परिवारों के लिए उम्मीद और आशंका के बीच खड़ी एक बंद दुनिया बन गई है.  रेस्क्यू टीम संभावित स्थानों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, लेकिन सुरंग की अस्थिर स्थिति गाद, पानी और मलबा अभियान की रफ्तार को प्रभावित कर रहे हैं. कैबिनेट मंत्री ने कहा कि जब तक लापता श्रमिकों तक टीम नहीं पहुंचा जाती, तब तक सर्च अभियान जारी रहेगा. टनल हादसे के साथ-साथ चमोली में ही इसी महीने आई आपदा में बीआरओ के हवलदार भी लापता हैं, जिनका अभी तक कोई सुराग नहीं मिला है. उत्तराखंड में आपदा के बीच सबसे कठिन मामले वो हैं, जहां कोई व्यक्ति सीधे किसी हादसे का शिकार हुआ या नहीं इसका भी पता नहीं चलता. उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल ट्रेक से 29 मई को लापता हुई रामनगर निवासी बबीता पांडे इसका उदाहरण हैं. उनकी तलाश में पुलिस, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, आईटीबीपी, सेना, वन विभाग, डॉग स्क्वायड और स्थानीय लोगों तक को लगाया गया. अलग-अलग संभावित इलाकों में सर्च ऑपरेशन चलाया गया. लेकिन लंबे अभियान के बावजूद कोई निर्णायक सुराग नहीं मिला. अब जांच एजेंसी बस इस इंतजार में हैं कि कहीं से उसकी खबर आ जाए. पिंडारी ग्लेशियर ट्रेक से 29 मई को लापता हुए नोएडा निवासी का मामला भी इसी चुनौती को सामने लाता है. कई दिनों तक तलाश चलने के बावजूद सुराग नहीं मिलने पर परिवार ने जानकारी देने वाले के लिए इनाम की घोषणा तक की. ऐसे मामलों में सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि रेस्क्यू एजेंसियों के पास एक निश्चित घटनास्थल नहीं होता. नदी में हादसा हो तो संभावित बहाव क्षेत्र तलाशा जा सकता है. सुरंग में हादसा हो तो मलबे के भीतर संभावित स्थान तय किए जा सकते हैं. लेकिन ट्रेकिंग में लापता व्यक्ति किस दिशा में गया, यह पता न हो, तो पूरा पहाड़ ही सर्च एरिया बन जाता है.  उत्तराखंड की नदियां भी लापता लोगों की तलाश को बेहद कठिन बना देती हैं. पहाड़ों में अचानक बढ़ता जलस्तर, तेज बहाव, गहरी खाइयां, बड़े-बड़े बोल्डर और नदी के भीतर बने गड्ढे सर्च ऑपरेशन की दिशा को हर घंटे बदल सकते हैं. कई बार जिस जगह हादसा होता है, व्यक्ति वहां नहीं मिलता. क्योंकि तेज बहाव उसे काफी दूर तक ले जा सकता है. यही कारण है कि एसडीआरएफ की डीप डाइविंग टीमें और जल पुलिस जैसे विशेषज्ञ दल लगातार संभावित जलक्षेत्रों की तलाशी लेते हैं. लेकिन पानी के भीतर दृश्यता कम होने और तेज बहाव के कारण हर जगह पहुंचना आसान नहीं होता. यानी उत्तराखंड में लापता व्यक्ति की तलाश तीन अलग-अलग मोर्चों पर लड़ाई बन जाती है. आपदा प्रबंधन विभाग की रिपोर्ट कहती है पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है. किसी हादसे के तुरंत बाद एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, पुलिस, आईटीबीपी, सेना, डीडीआरएफ, वन विभाग और स्थानीय लोग मैदान में उतरते हैं. लेकिन अगर कई दिनों तक कोई सुराग नहीं मिले, तो क्या सर्च ऑपरेशन उसी तीव्रता से जारी रहता है. क्या परिवारों को बताया जाता है कि अब कितने क्षेत्र की तलाशी बाकी है. क्या अभियान समाप्त होने के बाद भी नई सूचना मिलने पर दोबारा सर्च शुरू करने की कोई तय व्यवस्था है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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