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ढूंढे नहीं मिलता उत्तराखंड का अखरोट

04/02/25
in उत्तराखंड, देहरादून, हेल्थ
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

 

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

अखरोट का उद्भव एशिया से माना जाता है, परन्तु विश्व में मुख्य रूप से भारत, मेक्सिको,
संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, यूक्रेन, इटली, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, श्रीलंका,
अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान तथा अरमेनिया में भी इसकी खेती की जाती है। इन देशों में
अखरोट की बहुत ज्यादा अनुवांशिक विविधता पायी जाती है। भारत में अखरोट की खेती
किसी भी हिमालयी राज्य में व्यवसायिक रूप से तो नहीं की जाती है, ना ही व्यवस्थित रूप
से कहीं अखरोट के बागान देखने को मिलते हैं, केवल जम्मू कश्मीर का भारत के कुल
अखरोट उत्पादन में 90 प्रतिशत का योगदान है जो कि 2.69 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर जो
83,613 भूमि पर इसका उत्पादन किया जाता है। जबकि उत्तरी पश्चिमी हिमालय के अन्य
राज्य सिक्किम, हिमाचल, अरूणाचल, दार्जिलिंग तथा उत्तराखण्ड में भी अखरोट का
पारम्परिक उत्पादन किया जाता रहा है। भारत में प्रमुख रूप से काठी अखरोट, मध्य काठी
तथा कागजी अखरोट मुख्यतः पाये जाते हैं।जहाँ तक भारत में उगाये जाने वाली अखरोट की
प्रजातियों की बात की जाय तो जम्मू कश्मीर, हिमाचल में विल्सन, गोविन्द, यूरेका तथा
उत्तराखण्ड में चकराता सलेक्शन का उगाया जाना साहित्य में वर्णित है। जहां तक अखरोट
की वैज्ञानिक विश्लेषण की बात की जाय तो विश्व में मुख्यतः दो ही प्रजातियां पायी जाती
हैं, एक पारसियन अखरोट तथा दूसरा काला अखरोट। पारसियन अखरोट का उद्भव पर्सिया
से माना जाता है जबकि काला अखरोट का उद्भव पूर्वी उत्तरी अमेरिका से माना जाता है।
काला अखरोट स्वाद में तो पारसियन अखरोट से बेहतर पाया जाता है परन्तु कठोर सेल होने
की वजह से व्यवसायिक रूप नहीं ले पाया, जबकि एक अन्य प्रजाति रूट स्टॉक के लिये
प्रयोग की जाती है, जबकि केवल जम्मू कश्मीर में अखरोट के व्यवसाय से ही 200 करोड़
का राजस्व प्राप्त होता है। अखरोट में मौजूद ओमेगा.3 और 6 फैटी एसिड, 60 प्रतिशत तेल
की मात्रा होने की वजह से यह पोष्टिक, औषधीय एवं औद्योगिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण
है। यह ब्लड में कोलेस्ट्रोल का स्तर कम करने के साथ.साथ रक्त वाहनियों की क्रियाओं के
सुचारू संचालन तथा मैमोरी बढ़ाने में भी सहायक होता है ओमेगा 3 व 6 फैटी अम्ल के
अलावा इसमें लिनोलेइक, पालमेटिक, स्टेरिक तथा मेलोटोनीन एंटीऑक्सीडेंट भी प्रचुर मात्रा
में पाया जाता है जो कि निद्रा रोग निवारण में काफी सहायक होता है। इसी महत्वपूर्ण
पोष्टिक एवं औषधीय गुणों की वजह से अखरोट को महत्वपूर्ण पौधों की सूची में सम्मिलित

किया है। फूड ड्रग एडमिनिसट्रेशन के अनुसार यदि अखरोट को खाद्य कड़ी में सम्मिलित
किया जाय तो यह हृदय विकार को काफी हद तक कम कर देता है। अखरोट उत्पादन के
लिए उत्तराखंड की परिस्थितियां अनुकूल हैं। राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में एक दौर में अखरोट
की ठीक-ठाक पैदावार होती थी। लोग इसे बेचकर मुनाफा भी कमाते थे। इसे देखते हुए राज्य
गठन के बाद अखरोट की पैदावार बढ़ाने को प्रयास शुरू किए गए, लेकिन यह पहल कागजों
में अधिक सीमित रही। विभागीय आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2015-16 में राज्य में अखरोट का
क्षेत्रफल 17243.84 हेक्टेयर और उत्पादन था 19322.93 मीट्रिक टन। वर्तमान में क्षेत्रफल
बढ़कर अवश्य 17764.11 हेक्टेयर हो गया है, लेकिन उत्पादन घटकर 18933.39 मीट्रिक
टन पर आ गया। वर्तमान में अखरोट उत्पादन के जो आंकड़े दर्शाये गए हैं, उसे देखते हुए
राज्य के बाजारों में यह आसानी से मिल जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा कहीं नजर नहीं
आता। अखरोट उत्पादन को लेकर इस स्थिति को देखते हुए उद्यान विभाग भी लंबी प्रतीक्षा
के बाद अब नींद से जागा है। निदेशक उद्यान के अनुसार सभी जिलों से अखरोट को लेकर
धरातलीय स्थिति की रिपोर्ट मांगी गई है। साथ ही राज्य में अखरोट को प्रमुख नकदी फसल
बनाने के मद्देनजर केंद्र सरकार को चार सौ करोड़ की योजना का प्रस्ताव भेजा गया है।
स्वीकृति मिलने के बाद इसे मिशन मोड में संचालित करने के साथ ही इसमें किसानों की
सक्रिय भागीदारी तय की जाएगी। साफ है कि या तो विभागीय आंकड़ों में झोल है या फिर
नीति और नीयत में खोट। यदि अखरोट को लेकर थोड़ा भी गंभीरता से कदम उठाए जाते तो
यह आज राज्य की प्रमुख नकदी फल फसलों में शामिल होने के साथ ही किसानों की
आर्थिकी संवारने का बड़ा जरिया होती। वर्तमान में अखरोट उत्पादन के जो आंकड़े दर्शाये गए
हैं, उसे देखते हुए राज्य के बाजारों में यह आसानी से मिल जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा
कहीं नजर नहीं आता। जब तक किसान जागरूक नहीं होंगे,योजनाओं में राज्य की भौगोलिक
स्थिति के अनुसार सुधार नहीं किया जाता तथा योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता नहीं
रखी जाती सरकारी योजनाओ में लगे बाग कागजों में अधिक व धरातल में कम ही दिखाई
देंगे।लेखक के निजी विचार हैं वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरतहैं।

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