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महिला सशक्तिकरण की मिसाल है अल्मोड़ा की कृष्णा बिष्ट

08/03/21
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत में दैविक काल से नारी की पूजा की जाती है। वेदों में इसका वर्णन किया गया है। महिलाओं के योगदान, सम्मान और अधिकारों को दुनिया के सामने लाने और उन्हें खुद जागरूक करने के वास्ते हर साल 8 मार्च को दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। जिसकी शुरुआत सन् 1909 से हुई थी। इसके बाद से हर साल मनाया जाता है। हालांकि, 1921 में पहली बार 8 मार्च के दिन महिला दिवस मनाया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं को समाज में समान अधिकार दिलाना है। मनुस्मृति में साफ़ साफ़ लिखा है.‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ यानी जहां नारी का सम्मान होता है, वहां देवता वास करते हैं।

इस मौके पर दुनियाभर में कई सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन कर महिलाओं को सम्मानित किया जाता है। जब भी महिला जागृति व उत्थान की बात आती है, कृष्णा बिष्ट का नाम अवश्य आता है। कृष्णा बिष्ट खुद गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद से हिन्दी में पीजी किया है। यह वह नाम है, जिसने पहाड़ की गरीब महिलाओं की पीड़ा को महसूस कर उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने का संकल्प लिया और दशकों से इसे पूरा करने में जुटी हैं। महिला हाट संस्था की स्थापना कर सैकड़ों महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कर पर्वतीय क्षेत्र की गरीब.लाचार महिलाओं के दुख.दर्द को दूर कर उनका जीवन संवारने में जुटी कृष्णा मूलतः अल्मोड़ा जिले की सोमेश्वर तहसील के सौन कोटुली गांव की रहने वाली हैं। पहाड़ की महिलाओं की पीड़ा को देख कृष्णा के मन में उनके लिए कुछ करने का जज्बा जागा। उन्हें लगा कि बुनाई व कला में दक्ष इन महिलाओं को उचित मंच नहीं मिल पा रहा। सो वर्ष 1987 में उन्होंने महिला हाट नामक संस्था की स्थापना की। शुरुआत कताई.बुनाई जानने वाली महिलाओं को इससे जोड़कर हुई। इन महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधरी तो अन्य जिलों में भी शाखाएं खोली गईं। इनसे जुड़कर कई महिलाएं भविष्य संवार रही हैं। संस्था महिलाओं को कताई.बुनाई के लिए कच्चा माल समेत उनके उत्पादों को बाजार भी उपलब्ध कराती है।

कौशल प्रशिक्षण मुफ्त देती है। इतना ही नहीं कृष्णा ने स्वयं सहायता समूह बनाकर महिलाओं में एकजुटता की भावना भी जगाई।संस्था से जुड़कर होने वाली आय को जमा करने की प्रेरणा देने के साथ ही बचत का महत्व बताया। बैंकों में खाते खुलवाए। शैक्षिक व स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम भी शुरू किए गए। वर्ष 2004 से उन्होंने संस्था के माध्यम से गरीब परिवारों की महिलाओं के बच्चों के लिए शिक्षा प्रायोजित करने का भी काम किया। आज सैकड़ों महिलाएं इस संस्था से जुड़ लाभ अर्जित कर रही हैं। कृष्णा बिष्ट के अनुसार पहाड़ की महिलाओं की तमाम तरह की आर्थिक एवं सामाजिक समस्याएं हैं। इन समस्याओं से अधिकाधिक महिलाओं को निजात दिलाने के लिए मैंने प्रयास शुरू किए। हमारा लक्ष्य पहाड़ की महिलाओं को आर्थिक एवं सामाजिक रूप से मजबूत बनाना है। प्रतिवर्ष देशभर से किसी एक महिला को यह पुरस्कार मिलता है, जिसमें पांच लाख रुपये नकद व प्रशस्ति पत्र शामिल है। वर्ष 2010 में उन्हें इंडियन डेवलपमेंट फाउंडेशन की ओर से महिला सशक्तीकरण व पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार दिया गया। इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए उन्हें जानकी देवी बजाज पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।

पहाड़ की इन निडर और सबल महिलाओं के लिये भी महिला दिवसों के कुछ मायने होंगे या एक दिन की खानापूर्ति महज कुछ संस्थाओं और सेमिनारों के जेब भरने और टेसुए बहाने के लिये होगी, सवाल बहुत बड़ा है। पहाड़ की नारी ने उसे जो भूमिका मिली, उसे बखूबी निभाया है, सुबह ४ बजे से शुरु हुई हाड.तोड़ शुरुआत रात १० बजे तक अन्धेरे में बर्तन मलते.मलते खत्म होती है, इसके बाद भी इन्हीं महिलाओं ने पहाड़ की सभ्यता भी बचा कर रखा, संस्कृति भी बचा कर रखी, ऋतुरैंण से लेकर झोड़े.चांचरी भी इन्हीं के गले में बचे हैं। ऐपण की धार से लेकर मातृका पीठें, इन्हीं की अंगुलियों में बची हैं। घर.परिवार.गोठ.पन्यार.जंगल.स्कूल.बैंक सब इनके भरोसे हैं, कोई भी जनान्दोलन हो, पहली हुंकार इन्हीं की है, पहाड़ की इन अदम्य साहसी महिलाओं को मेरा नमन।

आज पूरी दुनिया में महिलाओं के सम्मान में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा है। इस मौके पर गूगल ने भी एक खास डूडल बनाकर महिलाओं को समाज में उनके यो योगदान के लिए समर्पित किया है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर बनाए गए इस गूगल डूडल में महिलाओं के प्रति सम्मान दर्शाया गया है। एएसआई के महानिदेशक ने निर्देश दिया है कि आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर उन सभी स्मारकों में महिला आगंतुकों से कोई एंट्री फीस नहीं वसूली जाएगी जिनके संरक्षण की जिम्मेदारी केंद्र के हाथों में है। इस महिला दिवस को उस सामान्य सी नारी के नाम, जो अपने.अपने दायरे में कर्मठता के सोपान रच रही हैं। हम बात उनकी नहीं कर रहे हैं जो सफलता के प्रतिमान गढ़ चुकी हैं, हम उनकी भी बात नहीं कर रहे हैं जो कीर्तिमान रच रही हैं, हम उनकी भी बात नहीं कर रहे हैं शिखर पर परचम लहरा रही हैं। हम बात कर रहे हैं उनकी जो ना अधिकार जानती है न प्रतिकार जो सिर्फ अपने अपनों के लिए जीना चाहती है। नहीं जानती है मंचों से दोहराए जाने वाले नारों को, अनजान है वह गुलाबी रंग की कोमलता सेए उसके हाथ स्याह हैं अथक परिश्रम से और हम उसी मेहनत को सलाम करते हुए महिला दिवस के गुलाबी रंग को प्रतीकात्मक रूप से सुर्ख लाल कर रहे हैं। जब तक स्वतंत्रता का आकाश, सम्मान की धरा, स्नेह की नदी और सुरक्षा का मजबूत कवच उसे हासिल नहीं होता है, यह अभियान जारी रहेगा।

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