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डॉ यशोधर मठपाल उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर

25/04/26
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
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.डॉ हरीश चन्द्र अन्डोला
लोककला और प्रागैतिहासिक चित्रकला के संरक्षण के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाम हैं। वे एक प्रतिष्ठित चित्रकार, इतिहासकार, पुरातत्वविद् और लोकसंस्कृति के गहरे अध्येता रहे हैं। उनका जीवन भारतीय परंपरा, विशेषकर हिमालयी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को समझने, सहेजने और दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के लिए समर्पित रहा है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
श्री यशोधर मठपाल का जन्म 6 जून 1939 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले की भीकियासैन तहसील के नौला गांव में क्षेत्र में हुआ। बचपन से ही उन्हें चित्रकला और प्रकृति से गहरा लगाव था। पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता, लोकजीवन और परंपराओं ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ यशोधर मठपाल ने मनीला और रानीखेत में प्रारंभिक शिक्षा पूरी की इसके बाद लखनऊ से ललित कला में पांच वर्षीय डिप्लोमा कर स्वर्ण पदक हासिल किया। उसके बाद आगरा में पढ़ाई की। पूना से पुरात्व में पीएचडी हासिल की। उन्होंने उच्च शिक्षा के दौरान कला और इतिहास दोनों क्षेत्रों में रुचि विकसित की, जिससे आगे चलकर उनका कार्य बहुआयामी बना।
चित्रकला और कलात्मक योगदान
यशोधर मठपाल एक कुशल चित्रकार रहे हैं। उनकी कला में भारतीय परंपरा, लोकजीवन और प्रकृति का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उन्होंने विशेष रूप से प्रागैतिहासिक शैलचित्रों (Rock Art) के अध्ययन और पुनर्निर्माण में उल्लेखनीय कार्य किया।
उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों में पाए जाने वाले प्राचीन गुफा चित्रों का अध्ययन किया और उनकी प्रतिकृतियाँ तैयार कीं, जिससे आम लोगों को इन दुर्लभ कलाकृतियों को समझने का अवसर मिला।
प्रागैतिहासिक शैलचित्रों का संरक्षण
उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान भारत की प्राचीन शैलचित्र परंपरा के संरक्षण में रहा है। उन्होंने मध्य प्रदेश के भीमबेटका जैसे विश्व प्रसिद्ध शैलाश्रयों का गहन अध्ययन किया। इन चित्रों के माध्यम से उन्होंने यह समझाने का प्रयास किया कि हजारों वर्ष पहले के मानव का जीवन, उसकी सोच और उसकी संस्कृति कैसी थी।
उन्होंने न केवल इन चित्रों का अध्ययन किया बल्कि उन्हें संरक्षित करने और उनके महत्व को जन-जन तक पहुंचाने का भी प्रयास किया।
लोक संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण
यशोधर मठपाल ने उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, रीति-रिवाजों, त्योहारों और लोककला को संरक्षित करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने देखा कि आधुनिकता के प्रभाव से पारंपरिक कला और संस्कृति धीरे-धीरे लुप्त हो रही है, इसलिए उन्होंने इसे बचाने के लिए ठोस कदम उठाए।
इसी उद्देश्य से उन्होंने भीमताल (नैनीताल) में “फोक कल्चर म्यूज़ियम” (Folk Culture Museum) की स्थापना की। इस संग्रहालय में उत्तराखंड की लोककला, हस्तशिल्प, पारंपरिक वस्त्र, आभूषण और अन्य सांस्कृतिक वस्तुओं का संग्रह किया गया है।
उनके द्वारा स्थापित संग्रहालय आज एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र के रूप में जाना जाता है। यहाँ आने वाले लोगों को उत्तराखंड की समृद्ध परंपरा और इतिहास के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है।
यह संग्रहालय केवल वस्तुओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत प्रयास है—अपनी जड़ों को पहचानने और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक
श्री मठपाल एक लेखक और शोधकर्ता भी रहे हैं। उन्होंने भारतीय प्रागैतिहासिक कला, लोकसंस्कृति और इतिहास पर कई पुस्तकें और शोधपत्र लिखे हैं। उनके लेखन में गहन अध्ययन, अनुभव और संवेदनशील दृष्टिकोण दिखाई देता है।
उनकी पुस्तकों के माध्यम से छात्रों, शोधकर्ताओं और आम पाठकों को भारतीय संस्कृति की गहराई को समझने का अवसर मिलता है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान
यशोधर मठपाल के कार्यों को न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है। उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय शैलचित्रों और लोकसंस्कृति पर व्याख्यान दिए।
उनकी मेहनत और समर्पण के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया।
पुरस्कार और सम्मान
उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत सरकार और विभिन्न संस्थाओं ने उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया है। वे उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिन्होंने अपने कार्य से भारतीय सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दिलाई।
व्यक्तित्व और प्रेरणा
श्री यशोधर मठपाल का व्यक्तित्व अत्यंत सरल, विनम्र और समर्पित रहा है। उन्होंने अपने जीवन से यह सिखाया कि यदि किसी व्यक्ति में अपनी संस्कृति के प्रति प्रेम और समर्पण हो, तो वह समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।
उनका जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो कला, इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में कुछ करना चाहते हैं।
श्री यशोधर मठपाल केवल एक कलाकार या इतिहासकार नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने अपने कार्यों से अतीत और वर्तमान के बीच एक मजबूत सेतु का निर्माण किया है। उन्होंने यह साबित किया कि हमारी परंपराएँ और सांस्कृतिक धरोहर केवल अतीत की चीज़ें नहीं हैं, बल्कि वे हमारी पहचान और भविष्य की दिशा भी निर्धारित करती हैं।
उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर है, जिसे सदैव याद रखा जाएगा।
लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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