डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरणीय अस्थिरता एक गंभीर मोड़ पर पहुँच गई है। हाल ही में किए गए एक व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन में उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में 219 ‘हैंगिंग ग्लेशियर’ (लटकते हुए ग्लेशियर) की पहचान की गई है, जो तेजी से पिघल रहे हैं और कभी भी टूटकर गिर सकते हैं। यह अध्ययन विशेष रूप से उन ग्लेशियरों पर केंद्रित है जो खड़ी ढलानों पर स्थित हैं और जिनका आधार कमजोर हो चुका है। बढ़ते वैश्विक तापमान और बदलते मौसम चक्र ने इन बर्फ के विशाल पहाड़ों को अत्यधिक संवेदनशील बना दिया है, जिससे भविष्य में चमोली जैसी आपदाओं की आशंका गहरा गई है। वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक सैटेलाइट डेटा और जमीनी सर्वेक्षणों का उपयोग करते हुए अलकनंदा नदी के जलग्रहण क्षेत्र का विश्लेषण किया है। इस शोध में पाया गया कि 219 ऐसे ग्लेशियर हैं जो अपनी भूगर्भीय स्थिति के कारण अस्थिर हैं। ये ग्लेशियर मुख्य रूप से उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्थित हैं और तीव्र ढलान पर टिके हुए हैं। जब ये ग्लेशियर तापमान में वृद्धि के कारण अपना संतुलन खो देते हैं, तो वे अचानक नीचे गिर सकते हैं, जिससे निचले इलाकों में अचानक बाढ़ और मलबे का प्रवाह होने की संभावना बढ़ जाती है। अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि इन ग्लेशियरों की संवेदनशीलता केवल बर्फ पिघलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके नीचे की चट्टानी संरचना भी कमजोर हो रही है। आमतौर पर पहाड़ की मुख्य चोटी से जुड़े होते हैं लेकिन उनकी अपनी कोई ठोस आधार भूमि नहीं होती। वे केवल अपनी पकड़ और ठंडे तापमान के कारण वहां टिके रहते हैं। पिछले कुछ दशकों में, हिमालयी क्षेत्र में तापमान वृद्धि की दर वैश्विक औसत से कहीं अधिक रही है। इस गर्मी के कारण ग्लेशियर के अंदरूनी हिस्सों में पानी का रिसाव होने लगता है, जो बर्फ और चट्टान के बीच स्नेहक का काम करता है। इससे घर्षण कम हो जाता है और भारी बर्फ का द्रव्यमान गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की ओर खिसकने लगता है। 2021 की चमोली आपदा इसका एक ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ इसी तरह की एक घटना ने भारी तबाही मचाई थी। पर्यावरणविदों का मानना है कि हिमालय अब ‘तीसरे ध्रुव’ के रूप में अपनी स्थिरता खो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, ब्लैक कार्बन और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन ने बर्फ की चादरों को काला कर दिया है, जिससे वे सूर्य की गर्मी को अधिक सोख रही हैं। यह प्रक्रिया ग्लेशियरों के पिघलने की दर को कई गुना बढ़ा देती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अलकनंदा बेसिन में पहचाने गए ये 219 ग्लेशियर एक टाइम बम की तरह हैं। यदि समय रहते इनकी निरंतर निगरानी और चेतावनी प्रणालियों को सुदृढ़ नहीं किया गया, तो जान-माल का नुकसान अपरिहार्य हो सकता है। यह अध्ययन नीति निर्माताओं को हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति अधिक सतर्क रहने की चेतावनी देता है। इन अस्थिर ग्लेशियरों का प्रभाव केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड में बन रही जलविद्युत परियोजनाएं, रणनीतिक सड़कें और चार धाम यात्रा मार्ग इन संभावित खतरों के सीधे दायरे में आते हैं। यदि कोई बड़ा ग्लेशियर टूटता है, तो वह अपने साथ भारी मात्रा में गाद, पत्थर और पानी लेकर आता है, जो बांधों और बिजली घरों को नष्ट करने की क्षमता रखता है। इसके अलावा, नदी किनारे बसी बस्तियों और कृषि भूमि पर भी इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा। आर्थिक रूप से, यह राज्य के पर्यटन और ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है, जिससे हजारों लोगों की आजीविका और सुरक्षा पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने रीयल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम और अर्ली वार्निंग सेंसर लगाने की सिफारिश की है। वर्तमान तकनीक की मदद से ग्लेशियरों की हलचल और तापमान परिवर्तन को सेकंडों में ट्रैक किया जा सकता है। सरकार को चाहिए कि वह आपदा प्रबंधन टीमों को उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात करे और स्थानीय समुदायों को आपदा के समय बचाव के लिए प्रशिक्षित करे। साथ ही, हिमालयी क्षेत्रों में विकास कार्यों को पर्यावरण के अनुकूल बनाना होगा। सस्टेनेबल इंजीनियरिंग और ग्लेशियरों के स्वास्थ्य का नियमित आकलन ही आने वाले समय में आपदा के जोखिम को कम करने का एकमात्र तरीका है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने मध्य हिमालय में हैंगिंग ग्लेशियर से होने वाले खतरों पर स्वतः संज्ञान लिया है. साथ ही केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा और दूसरे संबंधित स्टेकहोल्डर्स को इस बारे में अपना जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया है.एनजीटी की प्रिंसिपल बेंच, जिसमें अध्यक्ष जस्टिस और एक्सपर्ट शामिल हैं, ने ‘मध्य हिमालय में पहाड़ी ढलानों पर हैंगिंग ग्लेशियर से होने वाले खतरे को स्टडी फ्लैग्स ने नजरअंदाज किया’ टाइटल वाली एक खबर पर ध्यान देते हुए यह निर्देश जारी किया है. शोधकर्ता की एक वैज्ञानिक अध्ययन का जिक्र किया गया है, जिसमें चेतावनी दी गई है कि उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में अस्थिर हैंगिंग ग्लेशियर एवलांच और नीचे की तरफ आपदाओं को बढ़ावा दे सकते हैं. स्टडी में ग्लेशियर के पीछे हटने, भूकंप की संवेदनशीलता और बद्रीनाथ, माना और हनुमान चट्टी जैसे कमजोर ऊंचाई वाले इलाकों में इंसानी बस्तियों और आधारभूत संरचनाओं के तेजी से बढ़ने से बढ़ते खतरों पर रोशनी डाली गई है.बड़े पर्यावरण संबंधी मुद्दों और पर्यावरण (संरक्षण) एक्ट, 1986 के संभावित उल्लंघन को देखते हुए, ट्रिब्यूनल ने कहा है कि यह मामला पर्यावरण सुरक्षा और कानूनी जरूरतों के पालन के बारे में जरूरी सवाल उठाता है.सुप्रीम कोर्ट द्वारा मानी गई अपनी स्वतः संज्ञान अधिकार का इस्तेमाल करते हुए, ट्रिब्यूनल ने कई अधिकारों को प्रतिवादी के तौर पर शामिल किया है. इनमें पर्यावरण मंत्रालय, वन और जलवायु परिवर्तन, , उत्तराखंड टूरिज्म डेवलपमेंट बोर्ड, शहरी विकास विभाग, उत्तराखंड, और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, रुड़की शामिल हैं.ट्रिब्यूनल ने सभी प्रतिवादियों को नोटिस भेजा है, और उन्हें अगली सुनवाई से पहले एफिडेविट के रूप में अपने जवाब जमा करने का निर्देश दिया है. विकास और विश्वास के इस सफर में विज्ञान की अनदेखी आत्मघाती सिद्ध हो सकती है। अंततः, हिमालय की पवित्रता और सुरक्षा की रक्षा करना ही सबसे बड़ी सेवा है, क्योंकि प्रकृति के कोप के आगे मानवीय हठ और नीतियां दोनों ही असहाय सिद्ध होती हैं।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.









