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अतीत के पन्नों में भवाली

27/09/20
in उत्तराखंड, नैनीताल, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भवाली का इतिहास, आजादी के पूर्व स्वतंत्रता संग्राम में इसकी भूमिका, स्वातंत्रोत्तर भारत में इसके विकास की दशा एवं दिशा, कई नामी शख्सियतों की जन्म व कर्मभूमि भवाली या भुवाली उत्तराखण्ड राज्य के नैनीताल जनपद में स्थित एक नगर है। यह कुमाऊँ मण्डल में आता है। शान्त वातावरण और खुली जगह होने के कारण श्भवालीश् कुमाऊँ की एक शानदार नगरी है। यहाँ पर फलों की एक मण्डी है। यह एक ऐसा केन्द्र . बिन्दु है जहाँ से काठगोदाम हल्द्वानी और नैनीतालए अल्मोड़ा . रानीखेत भीमताल . सातताल और रामगढ़ . मुक्तेश्वर आदि स्थानों को अलग . अलग मोटर मार्ग जाते हैं।भवाली नगर अपने प्राचीन टीबी सैनिटोरियम के लिए विख्यात हैए जिसकी स्थापना १९१२ में हुई थी। चीड़ के पेड़ों की हवा टीण् बीण् के रोगियों के लिए लाभदायक बताई जाती है। इसीलिए यह अस्पताल चीड़ के घने वन के मध्य में स्थित किया गया। श्रीमती कमला नेहरू का इलाज भी इसी अस्पताल में हुआ था।
भवाली चीड़ और वाँस के वृक्षों के मध्य और पहाड़ों की तलहटी में १६८० मीटर की ऊँचाई में बसा हुआ एक छोटा सा नगर है। भवाली की जलवायु अत्यन्त स्वास्थ्यवर्द्धक है। भवाली में ऊँचे.ऊँचे पहाड़ हैं। सीढ़ीनुमा खेत है। सर्पीले आकार की सड़कें हैं। चारों ओर हरियाली ही हरियाली है। घने वाँस . बुरांश के पेड़ हैं। चीड़ वृक्षों का यह तो घर ही है। और पर्वतीय अंचल में मिलने वाले फलों की मण्डी है। भवालीश् नगर भले ही छोटा हो परन्तु उसका महत्व बहुत अधिक हैं। भवाली के नजदीक कई ऐसे ऐतिहासिक स्थल हैंए जिनका अपना महत्व है। यहाँ पर कुमाऊँ के प्रसिद्ध गोलू देवता का प्राचीन मन्दिर हैए तो यहीं पर घोड़ाखाल नामक एक सैनिक स्कूल भी है। श्शेर का डाण्डाश् और श्रेहड़ का डाण्डाश् भी भवाली से ही मिला हुआ है। सेनिटोरियम में प्राचीन जाबर महादेव शिव मंदिर लड़ियाकाटा की पहाड़ी की तलहटी पर स्थित है । यहाँ पर पहुचने के लिए नैनीताल भवाली मोटर मार्ग पर स्थित सेनिटोरियम गेट से पहाड़ी पर लगभग दो किमी चलना पड़ता है । इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहाँ लकड़ी का शिवलिंग प्राचीन समय से स्थापित है जो अब भी अपनी पूर्व की स्थिति में है और पुरे नैनीताल जिले का एक मात्र शिव मंदिर है जहाँ 18 फ़ीट लम्बा त्रिशूल स्थापित है। भीमताल, नौकुचियाताल, मुक्तेश्वर, रामगढ़ अल्मोड़ा और रानीखेत आदि स्थानों में जाने के लिए भी काठगोदाम से आनेवाले पर्यटकों, सैलानियों एवं पहारोहियों के भवाली की भूमि के दर्शन करने ही पड़ते हैं। अतः भवाली का महत्व जहाँ भौगोलिक है वहाँ प्राकृतिक सुषमा भी है। इसीलिए इस शान्त और प्रकृति की सुन्दर नगरी को देखने के लिए सैकड़ों . हजारों प्रकृति . प्रेमी प्रतिवर्ष आते रहते हैं।
नैनीताल से भवाली की दूरी केवल ११ किनोमीटर है। नैनीतैल आये हुए सैलानी भवाली की ओर अवश्य आते हैं। कुछ पर्यटक कैंची के मन्दिर तक जाते हैं तो कुछ श्गगार्ंचलश् पहाड़ की चोटी तक पहुँचते हैं। कुछ पर्यटक श्लली कब्रश् या लल्ली की छतरी को देखने जाते हैं। कुछ पदारोही रामगढ़ के फलों के बाग देखने पहुँचते हैं। कुछ जिज्ञासु लोग काफल के मौसम में यहाँ काफल नामक फल खाने पहुँचते हैं। भवाली १६८० मीटर पर स्थित एक ऐसा नगर है जहाँ मैदानी लोग आढ़ू, सेब, पूलम आलूबुखारा और खुमानी के फलों को खरीदने के लिए दूर-दूर से आते हैं। भवाली शहर के उत्तरोत्तर विकास के पीछे सामाजिक, राजनैतिक, साहित्यिक, प्रशासनिक, धार्मिक आदि कई कारक रहे हैं।
स्वतंत्रता संग्राम में भवाली ने भी अपने हिस्से का पूरा योगदान देने में कोई कोर.कसर नहीं छोड़ीण् भारत रत्न पं0 गोबिन्द बल्लभ पन्त के स्वतंत्रता आन्दोलन का गवाह रहा भवाली कस्बे का तिराहा उनकी सार्वजनिक सभाओं का केन्द्र रहता। आज भी उनकी याद में भवाली चौराहे पर उनकी प्रतिमा इसकी याद में प्रतिस्थापित है। उन्होंने पन्त इस्टेट नाम से भवाली बाजार के सामने की पहाड़ी पर अपना आवास बनाया तथा उनके सुपत्र कृष्ण चन्द्र पन्त का जन्म भी 10 अगस्त 1931 को भवाली में ही हुआ। पं0 पन्त से ही प्रेरणा लेकर भवाली के उस समय के युवकों में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आक्रोश बढ़ा और कई स्थानीय युवक स्वतंत्रता संग्राम में उनके अनुयायी बन गये। स्वण् हीरा लाल भवाली के एक ऐसे ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। पं0 जवाहर लाल नेहरू से उनका घनिष्ठ संबंध था।
107 साल पूर्व वर्ष 1912 में टीबी के इलाज के लिए भवाली में टीबी सेनिटोरियम स्थापित किया गया। टीवी के सफल इलाज को लेकर यहां की आबोहवा एक महत्वपूर्ण कारण रहा। उन्होंने कहा कि पूर्व में यही एक अस्पताल टीबी के इलाज के लिए बनाया गया, लेकिन वर्तमान में देश और प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में टीबी के बेहतर इलाज की सुविधाएं उपलब्ध हैं। एक समय वह था जब भवाली के लिए मरीजों को रेफर करना पड़ता था और एक समय यह है जब सेनिटोरियम में मात्र 18 मरीजों का इलाज किया जा रहा हैए कमला नेहरू क्षयरोगाश्रम भवाली सेनेटोरियम में भर्ती थी, भवाली सेनेटोरियम में अंग्रेज चिकित्सक एलण्एसण् व्हाइट तथा चर्चित चिकित्सक डॉण् प्रेम लाल साह की देखरेख में श्रीमती कमला नेहरू का उपचार चल रहा था। कमला नेहरू के आउट डोर मरीज के रूप में डॉण् प्रेम लाल साह जब उनका उपचार करते तो श्रीमती कमला नेहरू स्वतंत्रता सेनानी हीरा लाल साह जी के आवास पर रहा करती।
पूर्व पुलिस महानिरीक्षक उण्प्रण् शैलेन्द्र प्रताप सिंह ने अपने फेसबुक वाल पर ये जानकारी साझा करते हुए बताया है कि जब अपनी पत्नी का हाल.चाल जानने पंण् नेहरू सेनेटोरियम आया करते थे तो अपनी बेटी इन्दिरा को भी साथ लाते, इन्दिरा इस दरम्यान हीरा लाल साह जी के आवास पर ही रहा करती। हीरा लाल साह जी के वंशज अब भवाली में नहीं रहते हैं, उनके वंशजों में वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार स्वण् कैलाश साह जी भी थे, जिनका परिवार अब दिल्ली में ही रहता है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान का उल्लेख भवाली से लगभग 11 किमीण् की दूरी पर स्थित रामगढ़ एक प्रमुख फल पट्टी के साथ ही कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर का प्रवास होने का गौरव भी समेटे हैं। टैगोर ने नोबेल पुरस्कार प्राप्त कृति गीतांजलि के कुछ अंश रामगढ़ में ही लिखे तथा आधुनिक विज्ञान पर आधारित ग्रन्थ विश्व परिचय की रचना भी रामगढ़ प्रवास पर की। वे वर्ष 1903, 1914 तथा 1937 में उत्तराखण्ड आयेण् उनके शिष्य डेनियल ने रामगढ़ की सबसे ऊंची चोटी पर उनके आवास के लिए एक भवन बनाया, यह चोटी आज भी टैगौर टॉप के नाम से जानी जाती है। बताते हैं कि गुरूदेव टैगोर शान्ति निकेतन की स्थापना भी इसी रामगढ़ में करना चाहते थेए लेकिन यह इस क्षेत्र का दुर्भाग्य रहा कि क्षयरोग से पीड़ित उनकी बेटी का स्वास्थ्य निरन्तर खराब होने लगा, जिस कारण उन्हें यहां से जाना पड़ा और उनका यह सपना अधूरा ही रह गया। जर्जर हालत में पहुंच चुके भवाली सैनिटोरियम में अभी भी करीब 70 फीसदी मरीज उत्तर प्रदेश के हैं। अस्पताल में उत्तराखंड के मरीजों की संख्या 30 फीसदी से भी कम है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो डाट्स योजना शुरू होने के बाद इलाज अधूरा छोड़ने वाले मरीजों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है। 1912 में अंग्रेजों ने क्षयरोग अस्पताल की स्थापना की, जो बाद में भवाली सैनिटोरियम के नाम से प्रसिद्ध हो गया। 207 कर्मियों वाले इस अस्पताल में हर माह 70 लाख रुपए से अधिक वेतन पर ही खर्च होते हैं। दवा की व्यवस्था भले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से निशुल्क होती है, लेकिन मरीजों के भोजन, रखरखाव और कर्मियों की वर्दी में हर साल 25 लाख रुपए खर्च होते हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो यूपी के मेरठ, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, शाहजहांपुर, बदायूं, पीलीभीत, बिलासपुर के मरीजों की संख्या अधिक है। जबकि उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जिले के मरीज भी यहां इलाज को पहुंचते हैं। जबकि राज्य के पहाड़ी जिलों से इलाज कराने वाले मरीजों की संख्या दस फीसदी से भी कम है।
सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से समृद्ध उत्तराखंड का गौरवशाली इतिहास रहा है। शहर स्थित हिमालय संग्रहालय इसी गौरवशाली अतीत से वर्तमान को जोड़ने का काम कर रहा है। पौराणिक इतिहास से लेकर स्वाधीनता के सफर में उत्तराखंड के योगदान को बयां करने वाले कई ऐतिहासिक प्रमाण यहा संरक्षित है। जो छात्रों में इतिहास की समझ विकसित करने करने के साथ ही उन्हें देवभूमि की संस्कृति, पौराणिकता और ऐतिहासिकता से भी रूबरू करवाता है। संग्रहालय को सांस्कृतिक पर्यटन से जोड़ने की कवायद भी की जा रही है।

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