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उत्तराखंड के जन आंदोलनकारी और विचारक स्व. शमशेर सिंह बिष्ट की पुण्य तिथि

22/09/20
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
अल्मोड़ा, अपनी कुदरती छटा के लिए ही मशहूर नहीं रहा है, वो उत्तराखंड राज्य का एक प्रमुख सांस्कृतिक ठिकाना रहा है। जनांदोलनों के लिए भी ये सुलगता रहा है। महात्मा गांधी, रविन्द्र नाथ टेगौर और उदयशंकर जैसी शख्सियतों ने अल्मोड़ा को अपने अपने ढंग से नवाज़ा। उत्तराखंड जनसंघर्ष वाहिनी के अध्यक्ष रहे डॉण् बिष्ट का जन्म फरवरी.1947 में अल्मोड़ा जिले में स्याल्दे क्षेत्र के खटल गांव में हुआ था। पहाड़ के ख्यात पत्रकारों और बुद्धिजीवियों में शुमार रहे डॉण् शमशेर सिंह बिष्ट का जन्म 4 फरवरी 1947 में अल्मोड़ा जिले में स्याल्दे क्षेत्र के खटल गांव में हुआ था। उनके दादा फर्स्ट जीआर में नायक सूबेदार रहे। उनके पिता गोविन्द सिंह कचहरी में क्लर्क रहे। शमशेर सिंह बिष्ट का शुरुआती जीवन अभावों में बीता। जब वे सातवीं कक्षा में थे, अंगीठी जलाते वक्त दुर्घटनाग्रस्त हो गये थे। अंगीठी जलाते वक्त मिट्टी का तेल उन पर भी पड़ गया था, जिससे वो गंभीर रूप से जल गये। तब वे छह महीने तक अस्पताल रहे। बाद में उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा जारी रखी।
अल्मोड़ा इण्टर कॉलेज से 12वीं करने के बाद अल्मोड़ा डिग्री कॉलेज में प्रवेश लेते ही उन्होंने छात्रों के बीच विभिन्न राजनीतिक.सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। जब वे कॉलेज में थे तब फुटबॉल खेल में शहर के लड़कों का दबदबा रहता था। वे गांव के लड़को को खेलने नहीं देते थे, मगर तब शमशेर सिंह बिष्ट हस्तक्षेप करते और ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को भी खेल का अवसर दिलवाते। यानी किसी के हक.हकूकों के लिए लड़ने का जज्बा उनमें बचपन से ही था। उनका राजनीतिक सफर 1972 में अल्मोड़ा कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष के तौर पर शुरू हुआ। उस समय छात्रसंघ अध्यक्ष बनने के लिए छात्र पूरा सिनेमा हॉल बुक कर छात्रों को फिल्म दिखाते थे। तब शमशेर सिंह बिष्ट 50 रुपये खर्च कर छात्रसंघ अध्यक्ष बने थे। छात्रसंघ अध्यक्ष बनने के बाद इसके बाद स्वण् बिष्ट विश्वविद्यालय आंदोलन से जुड़े और इसके बाद ही कुमाऊं और गढ़वाल विश्वविद्यालय अस्तित्व में आये थे।
उनका राजनीतिक सफर 1972 में अल्मोड़ा कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष के तौर पर शुरू हुआ। डॉण् बिष्ट उत्तराखंड राज्य आंदोलन से 1070 के दजशक के उत्तरार्ध और 1980 के दशक के उस शुरुआती दौर से जुड़े रहे हैंए जब बहुत कम लोग ही इस मांग को उठा रहे थे। 1980 के दशक में दिल्ली से निकलने वाली हिमालयन कार रैली को उत्तराखंड राज्य की मांग के समर्थन में जब रोका गया और पहाड़ पर न घुसने देने के लिए कई जगह रैली का विरोध हुआ, तब डॉण् बिष्ट उस आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं में प्रमुख थे। शमशेर सिंह बिष्ट उत्तराखण्ड के ख्यातिलब्ध आन्दोलनकारी, सामाजिक कार्यकर्ताए लेखकए पत्रकार और बुद्धिजीवी थे। अभावग्रस्त बचपन को अपनी ताकत बना लेने वाले शमशेर सिंह बिष्ट ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 80 के दशक के आरम्भ में अल्मोड़ा कॉलेज के छात्र संघ अध्यक्ष के रूप में की। इसके बाद राजनीतिकए सामाजिक सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध शमशेर उत्तराखण्ड के सभी महत्वपूर्ण आंदोलनों के ध्वजवाहक बने रहे विश्वविद्यालय आंदोलन, चिपको आंदोलन व उत्तराखंड आंदोलन में अग्रणी और कई मोर्चों पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाले डॉण् शमशेर सिंह बिष्ट 1980 के दशक में चले ष्नशा नहीं.रोजगार दो आंदोलन का भी प्रमुख स्तम्भ रहे। डॉण् बिष्ट को हर तरह के माफिया राज के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए भी जाना जाता है।1989 में जब पौड़ी के पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या हुई और शराब माफिया के खौफ के चलते कोई आवाज़ नहीं उठा पा रहा थाए तब डॉण् बिष्ट कुमायूं से पौड़ी पहुंचे और चंद लोगों के साथ जुलूस निकाला। इसके बाद पहाड़ से ले कर मैदान तक बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ और सरकार को पत्रकार हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपनी पड़ी थी विभिन्न छात्र आंदोलनों के अलावा वे नशा नहीं रोजगार दोए चिपको आन्दोलनए राज्य आन्दोलन समेत कई आंदोलनों के प्रमुख योद्धा रहेण् राज्य गठन के बाद भी वे सत्ता के गलियारों में जगह तलाशने के बजाय आजीवन जनसंघर्षों का हिस्सा बने रहे शमशेर सिंह बिष्ट अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय गढ़वाल.कुमाऊं की एकता और पूरे अंचल के सामाजिक.सांस्कृतिक परिवेश को समझने के लिए ष्पहाड़ष् के प्रमुख डॉण् शेखर पाठक के नेतृत्व में 1974 में आरम्भ हुई करीब एक हजार किलोमीटर की अस्कोट.आराकोट पदयात्रा अभियान में वे शामिल रहे।इस पदयात्रा में प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा समेत तत्कालीन उत्तर प्रदेश के इस पर्वतीय अंचल के कुछ अन्य सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी भी शामिल हुए। प्रत्येक 10 वर्ष में आयोजित होने वाले अस्कोट.आराकोट अभियान में डॉण् बिष्ट आगे भी लगातार शामिल रहे। वे ताउम्र जल.जंगल.जमीन के सवालों पर मुखर रहे। माफ़ियामुक्त उत्तराखंड के लिए निरंतर संघर्ष करते रहे। उनके निधन से उत्तराखंड ने अपना सच्चा हितैषी और अपनी प्रबल आवाज़ को खो दिया है। वह ठेठ पहाड़ी थे। उत्तराखंड के पहाड़ी ग्राम्य जीवन का एक खुरदुरा, ठोस और स्थिर व्यक्तित्व। जलए जंगल और ज़मीन को किसी नारे या मुहावरे की तरह नहीं बल्कि एक प्रखर सच्चाई की तरह जीता हुआ। शमशेर सिंह बिष्ट इसलिए भी याद आते रहेंगे कि उन्होंने पहाड़ के जनसंघर्षों के बीच खुद को जिस तरह खपाया और लंबी बीमारी से अशक्त हो जाने से पहले तक जिस तरह सक्रियतावादी बने रहे, वह दुर्लभ है। यहां के प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, सरकार की गलत शिक्षा नीति, लोगों के जल.जंगल.जमीन के अधिकारों के लिए वे हमेशा लड़ते रहे।
यह उनकी संघर्ष चेतना ही नहीं उनकी जिजीविषा और पहाड़ के प्रति उनके अटूट लगाव का भी प्रमाण है। वो बहुत स्पष्ट वक्ता थे। बेलाग बोलते थे और उनकी सार्थक और साहसी टिप्पणियां अलग ही ध्यान खींचती थीं। वह सत्ताओं को अपनी आंदोलनधर्मिता से चुनौती देते रहे और पहाड़ के आम नागरिकों के मानवाधिकारों से लेकर संसाधनों पर उनके हकों की लड़ाई और पर्यावरण बचाने की लड़ाई से कभी पीछे नहीं हटे। अलग राज्य बनने के बाद जब पहाड़ की सामाजिकए राजनीतिक और सांस्कृतिक विडंबनाएं और गहरी और स्पष्ट होती गईं और नये नये सत्ता केंद्र विकसित होते गए और पहाड़ए निवेश और मुनाफे की लपलपाहटों में जर्जर होता गया तो इसका सिर्फ वे मलाल ही नहीं करते रह गए। वो लड़े और निर्भय होकर बोले। उत्तराखंड में स्थायी राजधानी का सवाल हो या देहरादून में फलती.फूलती सत्ता संस्कृति. शमशेर जी मनमसोस कर रह जाने वाले साधारण बुद्धिजीवी नहीं थे। हालांकि यह सच है कि शासनए प्रशासन और भामाशाह वर्ग ही अपने दायित्व से नहीं गिरे, बल्कि समुदाय भी अपने दायित्व निर्वाह में लापरवाह हुआ है। इसके अन्य कारण भी हो सकते हैं, किन्तु धीरे.धीरे यह धारणा पुख्ता होती जा रही है कि जब तक स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के मालिकानाए समुदाय के हाथों में नहीं सौंप दिया जाता, न तो इनकी व्यावसायिक लूट को रोकना सम्भव होगा और न ही इनके प्रति समुदाय को जवाबदेह बनाना सम्भव होगा।
नवगठित राज्य झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखण्ड में राज्य बनने के बाद प्राकृतिक संसाधनों की लूट की जो तेजी सामने आई हैए इसने जहाँ एक ओर राज्यों को छोटा कर बेहतर विकास के दावे को समग्र विकास के आइने में खारिज किया है, वहीं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में समाज का स्वावलम्बन देखने वालों को मजबूर किया है कि अब वे स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर सामुदायिक मालिकाना सुनिश्चित करने के लिये रास्ता खोजें।शमशेर सिंह बिष्ट का न रहना बेशक एक गहरा खालीपन है। लेकिन इसे जनसंघर्षों की निरंतरता ही भरती रह सकती है।

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