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उत्तराखंड में श्रद्धापूर्वक पूजा का वसंत पंचमी का पर्व

06/02/22
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
बसंत पंचमी’ हिंदुओं का एक प्रसिद्ध त्यौहार है। इसे ‘श्रीपंचमी’ भी कहते हैं। यह पूजा पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह त्यौहार माघ महीने के पांचवें दिन (पंचमी) पर हर साल मनाया जाता है।उत्तराखंड में बसंत पंचमी से बैठकी होली की शुरुआत हो जाती है।

मां सरस्वती के पूजन के साथ लोग पंचमी के दिन पीले कपड़े पहनते हैं और पीला खाना खाते हैं।उत्तराखंड के ज्यादातर हिस्सों में बसंत पंचमी के दिन पीले और मीठे चावल बनाएं जाते हैं और लोग इसका सेवन करते हैं।बसंत पंचमी, ज्ञान, संगीत और कला की देवी, ‘सरस्वती’ की पूजा का त्यौहार है। इस त्यौहार में बच्चों को हिंदू रीति के अनुसार उनका पहला शब्द लिखना सिखाया जाता है।

बसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। इस दिन पीले वस्त्र धारण करने का रिवाज़ है। बसंत पंचमी सर्दियों के मौसम के अंत का प्रतीक है।माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी से ऋतुओं के राजा वसंत का आरंभ हो जाता है। यह दिन नई ऋतु के आने का सूचक है। इसीलिए इसे ऋतुराज वसंत के आने का पहला दिन माना जाता है। साथ ही यह मां सरस्वती की जयंती का दिन है।इस दिन से प्रकृति के सौंदर्य में निखार दिखने लगता है। वृक्षों के पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और उनमें नए-नए गुलाबी रंग की कलियां और पत्ते मन को मुग्ध करते हैं। इस दिन को बुद्धि, ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती की पूजा-आराधना के रूप में मनाया जाता है।

हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर बसंत पंचमी का त्योहार बड़े ही उत्साह और जोश के साथ मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि माघ माह पंचमी तिथि पर मां सरस्वती प्रकट हुई थीं। बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की विशेष रूप से पूजा-आराधना होती है। मां सरस्वती को संगीत, कला, वाणी, विद्या और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। मान्यता है इस दिन विद्या आरंभ करने से ज्ञान में वृद्धि होती है। बसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्त कहा जाता है और दिन कोई भी शुभ कार्य बिना मुहूर्त के संपन्न किया जा सकता है।

बसंत पंचमी के दिन विवाह करना बहुत ही शुभ माना जाता है इसी कारण से बड़ी संख्या में इस दिन विवाह कार्यक्रम संपन्न किए जाते हैं। इसके अलावा बसंत पंचमी के दिन किसी नए काम का आरंभ करना शुभ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि बसंत पंचमी के दिन किसी नए व्यवसाय, गृह प्रवेश और शुभ कार्य आरंभ करने से सब मंगलमय होता है। बसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए कई चीजों को अर्पित किया जाता है पहाड़ियों के काज-काम में पैट-अपैट का भी बहुत ध्यान रखा जाता है. किसी भी काज-काम के लिये पैट होना अनिवार्य है.

पैट का शाब्दिक अर्थ हिन्दी माह की तारीख से है. काम-काज के संदर्भ में पैट का अर्थ शुभ दिन से है. पैट-अपैट की गणना कुंडली अनुसार, पंचांग देखकर की जाती है. माना जाता है कि बसंत पंचमी के दिन सभी शुभ कार्य किये जा सकते हैं. आज के दिन जनेऊ और विवाह जैसे शुभ कार्य बिना लग्न के किये जा सकते हैं.पहाड़ों में आज भी कृषक परिवारों के घरों में सुबह के समय खीर बनती है. सुबह-सुबह घर की लिपाई-पुताई की जाती है. मुख्य दरवाजे के ऊपर टीका लगाते हैं. घर के मंदिर में पूजा के बाद घर के मुख्य दरवाजे के ऊपर (स्तम्भ के दोनों ओर) गोबर के साथ जौ की हरी पत्तियों को लगा दिया जाता है. बहुत से गावों में बिना गोबर के जौ की पत्तियों को रखा जाता है.

कहीं कहीं घर की मुख्य देली में सरसों के पीले फूल भी डाले जाते हैं. मंदिर में भी सरसों के पीले फूल चढ़ाये जाते हैं. जौ की हरी पत्तियां घर के प्रत्येक सदस्य के सिर अथवा कान में रखे जाते हैं और उसे आर्शीवचन दिये जाते हैं. आज के दिन बच्चों को पीले कपड़े पहनाते हैं. बच्चियों के नाक और कान छेदे जाते हैं. बच्चियों के नाक कान छेदते समय खाज़ ( कच्चे चावल) और गुड़ खिलाया जाता है. बसंत पंचमी के ऐतिहासिक महत्व को लेकर यह मान्यता है कि सृष्टि रचियता भगवान ब्रह्मा ने जीवो और मनुष्यों की रचना की थी तथा ब्रह्मा जी जब सृष्टि की रचना करके उस संसार में देखते हैं तो उन्हें चारों ओर सुनसान निर्जन ही दिखाई देता है एवम् वातावरण बिलकुल शांत लगता है जैसे किसी की वाणी ना हो |

यह सब करने के बाद भी ब्रह्मा जी मायूस , उदास और संतुष्ट नहीं थे तब ब्रह्मा जी भगवान् विष्णु जी से अनुमति लेकर अपने कमंडल से जल पृथ्वी पर छिडकते हैकमंडल से धरती पर गिरने वाले जल से पृथ्वी पर कंपन होने लगता है और एक अद्भुत शक्ति के रूप में चतुर्भुजी(चार भुजाओं वाली) सुंदर स्त्री प्रकट होती है । उस देवी के एक हाथ में वीणा और दुसरे हाथ में वर मुद्रा होती है बाकी अन्य हाथ में पुस्तक और माला थी | ब्रह्मा जी उस स्त्री से वीणा बजाने का अनुरोध करते है | देवी के वीणा बजाने से संसार के सभी जीव-जंतुओ को वाणी प्राप्त को जाती है |

उस पल के बाद से देवी को “सरस्वती” कहा गया | उस देवी ने वाणी के साथ-साथ विद्या और बुद्धि भी दी इसलिए बसंत पंचमी के दिन घर में सरस्वती की पूजा भी की जाती है | अर्थात दुसरे शब्दों में बसंत पंचमी का दूसरा नाम “सरस्वती पूजा” भी है | उत्तराखंड कि धरती ने पूरे विश्व को हिमालय और गंगा के रूप में उपहार दिया है तो पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया है। चिपको आंदोलन के नेता गौरा देवी और सुंदरलाल बहुगुणा इसी भूमि से ताल्लुक रखते हैं। मैती आंदोलन के जरिए कल्याण सिंह रावत ने पर्यावरण बचाने का काम किया।

इसीलिए उन्हें पदम श्री से नवाजा गया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण हमारे सामने बड़ी चुनौती है। एक साथ मिलकर ही इसका मुकाबला किया जा सकता है। अगली पीढ़ी को धन दौलत नहीं बल्कि एक अच्छा पर्यावरण देने की जरूरत है। उन्होंने कहा बसंत में पुराने वक्त पर बच्चे घरों से पौधे लाकर लगाते थे। पीला वस्त्र, पीला तिलक धारण करते थे, लेकिन अब समय के साथ सब कुछ बदल गया है। वृक्ष हमें जीवन देते हैं। जीव-जंतुओं को संरक्षण देते हैं। हमने इन वन प्राणियों से उनके घरों को छीन लिया है। यही कारण है कि यह आबादी में आ रहे हैं। उन्होंने ऋतुराज वसंत उत्सव पर जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने का आह्वान है।

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