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एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर शकरकंद

19/09/20
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
यह उष्ण अमरीका का देशज है। अमरीका से फिलिपीन होते हुए, यह चीन, जापान, मलेशिया और भारत आया, जहाँ व्यापक रूप से तथा सभी अन्य उष्ण प्रदेशों में इसको खेती होती है। यह ऊर्जा उत्पादक आहार है। इसमें अनेक विटामिन रहते हैं विटामिन ए और सी की मात्रा सर्वाधिक है। इसमें आलू की अपेक्षा अधिक स्टार्च रहता है। यह उबालकर या आग में पकाकर खाया जाता है। कच्चा भी खाया जा सकता है। सूखे में यह खाद्यान्न का स्थान ले सकता है। इससे स्टार्च और ऐल्कोहॉल भी तैयार होता है। बिहार और उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से इसकी खेती होती है। फलाहारियों का यह बहुमूल्य आहार हैशकरकंद में स्टार्च की भरपूर मात्रा होती है, इसलिए इस का प्रयोग शरीर में ऊर्जा बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसे भूख मिटाने के लिए सब से उपयोगी माना जाता है।
शकरकंद की खेती वैसे तो पूरे भारत में की जाती है, लेकिन ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र में इस की खेती सब से अधिक होती है। शकरकंद की खेती में भारत दुनिया में छठे स्थान पर आता है। शकरकंद की खेती आलू की फसल की तरह की जाती है। शकरकंद में आलू से अधिक मात्रा में स्टार्च और मिठास की मात्रा पाई जाती हैं। इसके अलावा शकरकंद में विटामिन काफी मात्रा में पाई जाती हैं। शकरकंद विटामिन ए का बहुत अच्छा माध्यम है। इसके सेवन से शरीर की 90 प्रतिशत तक विटामिन ए की पूर्ति हो जाती है। शकरकंद पोटैशियम का एक बहुत अच्छा माध्यम है। यह नर्वस सिस्टम की सक्रियता को सही बनाए रखने के लिए आवश्यक है। साथ ही किडनी को भी स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण योगदान देता शुष्क प्रदेशों में शकरकंद मुख्य खाद फसल के रूप में कार्य करती हैं।
शकरकंद मानव शरीर के लिए कई तरह से उपयोगी मानी जाती है। इसके खाने से चेहरे पर चमक और बालों में वृद्धि भी देखने को मिलती हैं। इसके अलावा इसका इस्तेमाल दिल की बीमारी में काफी लाभदायक होता हैं। शकरकंद की खेती के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त मानी जाती हैं। शकरकंद की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। शकरकंद की खेती समुद्र तल से 1600 मीटर तक की ऊंचाई वाले भागों में सफलतापूर्वक की जा सकती हैं। इसकी खेती के लिए सर्दी का मौसम कम उपयोगी होता हैं। शकरकंद की खेती के लिए हल्की अम्लीय भूमि उपयुक्त होती हैं। शकरकंद की खेती किसानों के लिए अच्छी उपज देने वाली खेती मानी जाती हैं।
शकरकंद की खेती लगभग सभी मौसम में की जा सकती हैंण् लेकिन उत्तम पैदावार सिर्फ गर्मी और बरसात के मौसम में ही देती हैं। जायद के मौसम में इसकी खेती करने के लिए इसके पौधे की रोपाई मध्य जून से अगस्त माह तक कर देनी चाहिए। इस दौरान इसकी पैदावार खरीफ की फसल के साथ प्राप्त होती हैं शकरकंद की विभिन्न किस्मों की प्रति हेक्टेयर औसतन पैदावार 25 टन के आसपास पाई जाती हैं। जबकि इसका बाज़ार भाव 50 रूपये प्रति किलो के आसपास पाया जाता हैं। अगर इसका भाव 6 रूपये प्रति किलो किसान भाई को मिलता हैं तो इस हिसाब से एक बार में एक हेक्टेयर से सवा लाख तक की कमाई कर सकता हैं जौनसार के सुदूरवर्ती गांव कुनवा के एक युवक ने शकरकंद की तरह दिखने वाले और स्वाद में सेब की तरह मीठे ग्राउंड एप्पल भूमिगत सेब की खेती का सफल प्रयोग किया है। जौनसार में ग्राउंड एप्पल की खेती करने वाला वह पहला किसान है। हालांकि इसकी मार्केटिंग की व्यवस्था न होने से उसे खासी दिक्कतें पेश आ रही हैं।
देहरादून जिले के चकराता ब्लॉक की सुदूरवर्ती भरम खत के ग्राम कुनवा निवासी शूरवीर सिंह ने स्नातक तक की पढ़ाई की है। इसके बाद उसने गांव में ही रहकर कृषि.बागवानी में हाथ आजमाने का निर्णय लिया। शूरवीर ने देखा कि पहाड़ में मौसम की मार से सेब की फसल को भारी नुकसान पहुंचता है, सो तकनीकी खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेषज्ञों से रायशुमारी कर प्रयोग के तौर पर ग्राउंड एप्पल की खेती शुरू की। इसके लिए उसने बीते वर्ष हिमाचल के रामपुर से बीज मंगाकर उसे अपनी करीब दो नाली जमीन में बोया। मार्च में बीज डालने के बाद दिसंबर में भूमिगत सेब की फसल तैयार भी हो गई। शूरवीर ने बताया कि ग्राउंड एप्पल के एक किलो बीज से एक क्विंटल उत्पादन आसानी से मिल जाता है। इसके पौधे की ऊंचाई तीन से पांच फीट और फल का वजन 200 ग्राम से लेकर एक किलो तक होता है। एक पौधे से चार से सात किलो फल मिल जाते हैं। बताया कि उसे पहले प्रयास में ही दो नाली जमीन से लगभग 80 किलो ग्राउंड एप्पल मिला। अब इस तकनीक को जानने के लिए अन्य किसानों में भी खासी उत्सुकता है।
प्रगति किसान शूरवीर ने बताया कि ग्राउंड एप्पल को छिलका उतारकर खाया जाता है। पौष्टिकता से भरपूर इस फल से जैमए जूस और चटनी भी बनाई जाती है। मार्च में इसका बीज बोने के बाद गोबर की खाद डालकर खेत को छोड़ दिया जाता है। कुछ समय बाद पौधा अंकुरित होकर दिसबंर में फसल तैयार हो जाती हैए लेकिन उत्तराखंड में ग्राउंड एप्पल के विपणन की व्यवस्था न होने के कारण इसे बेचने के लिए अन्य जगह जाना पड़ता है।सेहत के लिए शकरकंद बहुत फायदेमंद होती है। शकरकंद को ऊर्जा का खजाना माना जाता है। शकरकंद मे पोषक तत्वों भरपूर मात्रा मे पाए जाते है जो सेहत के लिए बहुत जरुरी है। शकरकंद में फाइबर, एंटी.ऑक्सीडेंट्स और विटामिन पाया जाता है जो हमे अनेक बीमारियो से बचाता है। शकरकंद को स्वीट पोटैटो के नाम से भी जाना जाता है और इसमें ऊर्जा का खजाना होता है। लोग इसे आलू से जोड़कर देखते हैं लेकिन पोषक तत्वों और स्वास्थ्य के लिहाज से इसके कई फायदे हैं। शकरकंद में भरपूर मात्रा में विटामिन बी6 पाया जाता है, जो शरीर में होमोसिस्टीन नाम के अमीनो एसिड के स्तर को कम करने में सहायक होता है। अगर इस अमीनो एसिड की मात्रा बढ़ने पर बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। शकरकंद विटामिन डी का एक बहुत अच्छा सोर्स है। यह विटामिन दांतों, हड्डियों, त्वचा और नसों की ग्रोथ और मजबूती के लिए आवश्यक होता है। शकरकंद विटामिन ए का बहुत अच्छा माध्यम है। इसके सेवन से शरीर की 90 प्रतिशत तक विटामिन ए की पूर्ति हो जाती है। शकरकंद में भरपूर मात्रा में आयरन होता है। आयरन की कमी से हमारे शरीर में एनर्जी नहीं रहती, रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है और ब्लड सेल्स का निर्माण भी ठीक से नहीं होताण् शकरकंद आयरन की कमी को दूर करने में मददगार रहता है। शकरकंद पोटैशियम का एक बहुत अच्छा माध्यम है। यह नर्वस सिस्टम की सक्रियता को सही बनाए रखने के लिए आवश्यक है। साथ ही किडनी को भी स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
उत्तराखंड सरकार को चाहिये कि वह अपनी भौगोलिक स्थिति के आधार पर बने समाज को ध्यान में रखकर नीतियों का निर्माण करे। सेहत के लिए भी किसी औषधि से कम नहीं है।

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