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कद्दू के हैं अद्भुत फायदे

19/06/20
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
यह भारत की प्रसिद्ध सब्जी है जो कि बारिश के मौसम में उगाई जाती है। इसे हलवा कद्दू के नाम से भी जाना जाता है और यह कुकरबिटेसी परिवार से संबंधित है। भारत कद्दू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। इसे खाने और मिठाई बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। यह विटामिन ए और पोटाशियम का अच्छा स्त्रोत है। कद्दू नज़र तेज करने और रक्तचाप को कम करने में सहायक है और इसकी एन्टीऑक्सीडेंट विशेषताएं भी हैं। इसके पत्तों, तने, फल का रस और फूलों के औषधीय गुण भी हैं। कुम्हड़ा या कद्दू एक स्थलीय, द्विबीजपत्री पौधा है जिसका तना लम्बा, कमजोर व हरे रंग का होता है। तने पर छोटे.छोटे रोयें होते हैं। यह अपने आकर्षों की सहायता से बढ़ता या चढ़ता है। इसकी पत्तियां हरी, चौड़ी और वृत्ताकार होती हैं। इसका फूल पीले रंग का सवृंत, नियमित तथा अपूर्ण घंटाकार होता।
नर एवं मादा पुष्प अलग.अलग होते हैं। नर एवं मादा दोनों पुष्पों में पाँच जोड़े बाह्यदल एवं पाँच जोड़े पीले रंग के दलपत्र होते हैं। नर पुष्प में तीन पुंकेसर होते हैं जिनमें दो एक जोड़ा बनाकार एवं तीसरा स्वतंत्र रहता है। मादा पुष्प में तीन संयुक्त अंडप होते हैं जिसे युक्तांडप कहते हैं। इसका फल लंबा या गोलाकार होता है। फल के अन्दर काफी बीज पाये जाते हैं। फल का वजन ४ से ८ किलोग्राम तक हो सकता है। सबसे बड़ी प्रजाति मैक्सिमा का वजन ३४ किलोग्राम से भी अधिक होता है।यह लगभग संपूर्ण विश्व में उगाया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिको, भारत एंव चीन इसके सबसे बड़े उत्पादक देश हैं। इस पौधे की आयु एक वर्ष होती है। कद्दू हृदयरोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है।
यह कोलेस्ट्राल कम करता है, ठंडक पहुंचाने वाला और मूत्रवर्धक होता है। यह पेट की गड़बड़ियों में भी असरदायक है। कद्दू रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करता है और अग्न्याशय को सक्रिय करता है। इसी कारण चिकित्सक मधुमेह रोगियों को कद्दू खाने की सलाह देते हैं। इसका रस भी स्वास्थ्यवर्धक माना गया है। कद्दू में मुख्य रूप से बीटा केरोटीन पाया जाता है, जिससे विटामिन ए मिलता है। पीले और नारंगी रंग के कद्दू में केरोटीन की मात्रा अधिक होती है। कद्दू के बीज भी आयरन, जिंक, पोटेशियम और मैग्नीशियम के अच्छे स्रोत हैं। दुनिया भर में इस्तेमाल होने के कारण ही २९ सितंबर को पंपकिन डे के रूप में मनाया जाता है कद्दू के बीज में सेहत का खजाना होते हैं, कई समस्याओं के निवारण के लिए इस चीज का सेवन कई बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। इसमें पाया जाने वाला बीटा कैरोटीन सेहत के लिए फायदेमंद है कद्दू के बीज का उपयोग प्राकृतिक जड़ी.बूटियों के रूप में किया जा सकता है। इसका आपके शरीर पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है।
कद्दू के बीजों के सेवन से शरीर में रक्त और ऊर्जा का स्तर ठीक से विकसित होता है। कद्दू विटामिन डी, विटामिन ए, विटामिन बी 1, बी 2, बी 6, विटामिन सी और ई के अलावा बीटा कैरोटीन का एक बहुत अच्छा स्रोत है। कद्दू में कौपर, आयरन और फास्फोरस भी होता है जिसके कारण कद्दू स्वास्थ्य के लिए बहुत पौष्टिक है। लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कद्दू ही नहीं, बल्कि इसके बीज भी आपके स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होते हैं। कद्दू के बीज में कई पोषक तत्व और रसायन होते हैं, जो आपके स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होते हैं डेंगू.चिकनगुनियां की चपेट में आए मरीजों की सेहत को दुरूस्त करने में कद्दू लौकी लाभकारी साबित होता है।
आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉण् रोहित पराशर के मुताबिक डेंगू में प्लेटलेट कम होने की समस्या होती है कद्दू में मौजूद विटामिन ए की भरपूर मात्रा प्लेटलेट बढ़ाने में सक्षम होता है। वहीं कद्दू शरीर की कोशिकाओं में प्रोटीन तत्वों के विनियमन में भी मदद करता है। जिससे प्लेटलेट्स की संख्या बढ़ जाती है। दुर्गम परिस्थितियों में भी इस तकनीक के जरिए फसल मैं 30 दिन में तैयार हो जाती है जबकि आमतौर पर ऐसी फसलों को तैयार होने में 45 दिन लगते हैं। डीआरडीओ की ग्रीन लेबोरेटरी में कई फसलों पर रिसर्च की जा रही है। ऐसी ही पश्चिमी देशों में मिलने वाली जुकिनी नामक सब्जी को भी उगाया जाता है। आमतौर पर यह सब्जी पश्चिमी देशों में खाने का प्रमुख हिस्सा है।
प्रयोगशाला में उगाए जा रहे जुकिनी का आकार और चमक भारत के बाजारों में मिलने वाले जुकिनी से कहीं बेहतर है। इतना ही नहीं डीआरडीओ की इस प्रयोगशाला में कद्दू बम तो हैरतअंगेज है। आमतौर पर बाजार में मिलने वाले कद्दू का वजन 14 से 15 किलो हो सकता है लेकिन डीआरडीओ की इस प्रयोगशाला में उगने वाले कद्दू का वजन 40 से 50 किलो तक हो सकता है। बॉटनी विभाग की डॉक्टर दोरजी आंचुक ने आज तक को बताया, लेह जैसे सफेद रेगिस्तान में जहां सर्दियों में तापमान .25 के नीचे चला जाता है। वहां ऐसी सब्जियां उगाना अपने आप में चुनौती है लेकिन जमीन के नीचे प्लास्टिक और दूसरी तकनीकों के जरिए हम यहां पर सब्जियां उगा रहे हैं प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी का काशी शुभांगी या छप्पन भोग कद्दू बड़े.बड़े गुणों से लबालब हैं।
यह आमदानी बढ़ाने वाला तो है ही, स्वास्थ्य के लिए गुणकारी है। इसमें न सिर्फ किसानों को ताकत देने की क्षमता है, बल्कि स्वास्थ को भी दुरुस्त रखने की भी क्षमता है। किसानों को आर्थिक मजबूती देने वाला यह पौधा औषधीय गुणों से भरपूर है। इसमें हाईडीजीज रिस्क, ब्लड प्रेशर मोटापा कम करने की क्षमता है। 50 से 55 दिन में प्रथम तुड़ाई और लगातार 70 दिन तक फल देने वाली इस फसल में लगभग सभी प्रकार के विटामिन एवं खनिज तत्व हैं। इनमें मुख्य रूप से विटामिन ए 211 मिग्रा, विटामिन सी 20़.9 मिग्रा तथा पोटैग्रायम 319 मिग्रा एवं फॉस्फोरस 52 मिग्रा मिलता है। यह प्रति 100 ग्राम फल में पाया जाता है। इतना ही नहीं, इस सब्जी में पोषक तत्वों की प्रचुरता है। आईआईवीआर में विकसित इस प्रजाति को खेत के अलावा गमले में भी लगाया जा सकता है। आज उत्तराखंड में जहां.देखो वहां शराब की मांग की जाती है चाहे कोई अच्छा काम हो या बुरा, वो बिना शराब पिए या पिलाए पूरा नहीं होता। इससे वहां के बच्चों का भविष्य बर्बादी की कगार पर पहुंच रहा है। वो टीवी या मनोरंजन के अन्य माध्यमों की देखा.देखी वस्तुओं की मांग करने लगे हैं जो पूरा न होने की स्थिति में वहां के युवा अधिक से अधिक संख्या में पहाड़ से पलायन करने लगे हैं इसके अलावा वहां के लोग अपने प्राकृतिक संसाधनों की भी अनदेखी करने लगे हैं अधिकतर लोग अपनी पुरानी औषधियों की अनदेखी कर अंग्रेजी दवाइयों पर विश्वास करने लगे हैं। बाहरी संस्कृति के संपर्क में आने के कारण वहां के लोग अपनी प्राचीन और खूबसूरत संस्कृति को भुला देना चाहते हैं।
हमें उत्तराखंड के लोगों के जीवन को और बेहतर बनाने और वहां की पहले वाली खूबसूरत पहचान को सुरक्षित रखने और उसमें सुधार लाने के लिए वहां की प्रकृति और समाज में पैर पसारती जा रही बुराइयों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए लेकिन इसके लिए हमें केवल सरकार के भरोसे रहने की बजाय स्वंय मिलकर प्रयास करना होगा ताकि हमारी हजारों साल पहले की गौरवपूर्ण संस्कृति और समाज पर हमारी तरह हमारे आने वाली पीढ़ी भी गर्व महसूस करती रहे। उत्तराखंड ही नहीं प्रवास में भी आज भी कद्दू को पारम्परिक भुज्जी माना जाता है। कई सांस्कृतिक कार्यक्रम तेरहवीं, बारखी, श्राद्ध, भागवत अादि भोजन में कद्दू आवश्यक भोज्य पदार्थ माना जाता है। जबकि कद्दू खीरा का मूल स्थान भी अमेरिका मैक्सिको है जहां ५००० सालों से खाया जाता रहा है। कद्दू भी पुर्तगाली व्यापारियों द्वारा भारत आया और मुख्य भोज्य पदार्थ बन गया। उत्तराखंड में संभवतः कद्दू आठवीं या उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में आया होगा। कद्दू ने कद्दू खरीफ का मुख्य भोज्य पदार्थ बना व बारह महीनों की सब्जी बनने से कद्दू ने सांस्कृतिक बदलाव तो किये ही आर्थिक स्थिति भी सुधारी ।

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