डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
हिमालय के ग्लेशियर कभी बिल्कुल सफेद हुआ करते थे, लेकिन अब उन पर कारों से निकला धुआं और कोयला संयंत्रों व कारखानों से निकलने वाला प्रदूषण परत के रूप में तेजी से जम रहा है।विज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि जैसे-जैसे यह काली परत ग्लेशियर की सतह पर जम रही है, वे सूरज से ज्यादा गर्मी सोख रहे हैं और तेजी से पिघल रहे हैं। हिमालय क्षेत्रों में यही आपदाओं की वजह हो सकती है।नेपाल में आपदा का सही कारण अभी भी स्पष्ट नहीं है, लेकिन विज्ञानी चेतावनी देते हैं कि वायु प्रदूषण दुनिया के ग्लेशियरों के लिए एक बढ़ता हुआ खतरा है और यह ग्लोबल वार्मिंग के साथ मिलकर ग्लेशियरों के टूटने व बाढ़ के खतरे को बढ़ा रहा है।कोलंबिया यूनिवर्सिटी में लैमोंट-डोहर्टी अर्थ आब्जर्वेटरी में जियोफिजिक्स के प्रोफेसर ने कहा, “इसका इन ग्लेशियरों पर बहुत अधिक असर पड़ रहा है, खासकर जब वे पतले होते जा रहे हैं।”दरअससल, स्वच्छ और अधिक ऊंचाई पर मौजूद बर्फ आने वाली धूप को 90 प्रतिशत तक रिफ्लेक्ट (परावर्तित) कर देती है। लेकिन जब कालिख के रूप में हवा में मौजूद प्रदूषक बर्फ पर गिरते हैं, तो वे रिफ्लेक्टिविटी को बहुत कम कर देते हैं, जिससे सतह ज्यादा गर्मी सोखती है। इससे बर्फ पिघलने की गति बढ़ सकती है।जैसे-जैसे बर्फ की सतह पर जमा पानी नीचे की ओर बहना शुरू होता है, वह ग्लेशियर में गहरी सुरंगें बनाता है। इससे ग्लेशियर अस्थिर हो सकते हैं और बुरी तरह से ढह सकते हैं।न्यूजीलैंड के शोधकर्ता ने कहा कि अगर प्रदूषण पर काबू नहीं पाया गया, तो भविष्य में और अधिक नुकसान हो सकता है।इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रापिकल मेटियोरोलाजी के 2023 के एक अध्ययन में हिमालय के ग्लेशियरों को बचाने के लिए 2020 में कोविड-19 लाकडाउन को एक असल दुनिया के प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किया गया।टीम ने पाया था कि प्रदूषण में कुछ समय की कमी से बर्फ की परत चमकदार हो गई थी और हिमालय में बर्फ पिघलने में 40 प्रतिशत तक की कमी आईनिया में हिमालय से संभावित आने वाली त्रासदी को लेकर नए सिरे से चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है. इसके पीछे की मुख्य वजह है कि नेपाल में आई त्रासदी हिमालय राज्यों के लिए एक बड़ी चेतावनी है. हालांकि, नेपाल में आए त्रासदी की तरह ही उत्तराखंड में पूर्व में आई आपदाओं में बारिश का महत्वपूर्ण कनेक्शन देखा गया है. इसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग और अनियंत्रित विकास के साथ ही उच्च हिमालयी क्षेत्र में इंसानों की पहुंच शामिल है. आइए जानते हैं कि उच्च हिमालय क्षेत्रों से आने वाली आपदा का बारिश से क्या कनेक्शन है.नेपाल देश में आई भीषण त्रासदी के बाद देश-दुनिया में हिमालयी क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर नए सिरे से चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है. वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल की ये त्रासदी उत्तराखंड समेत अन्य हिमालयी राज्यों के लिए एक बड़ा अलर्ट है. ऐसे में नेपाल की त्रासदी से सबक लेते हुए हिमालय के संवेदनशील क्षेत्रों का नए सिरे से अध्ययन करने की जरूरत है. उत्तराखंड में साल 2013 में आई केदारनाथ आपदा या फिर 2021 की चमोली (रैणी) त्रासदी, इन सभी में बारिश और तेजी से बदलते मौसम चक्र का सीधा कनेक्शन देखा गया. अत्यधिक बारिश, तेजी से पिघलते ग्लेशियर ने हिमालय को काफी अधिक संवेदनशील बना दिया है. ग्लोबल वार्मिंग आज देश दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. क्योंकि इसकी वजह से न सिर्फ ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं बल्कि हिमालयी क्षेत्रों में प्रेसिपिटेशन में भी बड़ा बदलाव आया है. जिस कारण उच्च हिमालयी क्षेत्रों यानी करीब 4 हजार मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जहां पहले सिर्फ बर्फबारी होती थी, ग्लोबल वार्मिंग की वजह से अब मूसलाधार बारिश का दौर देखा जा रहा है. इसके अलावा, ग्लोब का तापमान बढ़ने के कारण वायुमंडल में नमी सोखने की क्षमता बढ़ गई है, जिससे बादलों के फटने या कम समय में बहुत तेज बारिश की घटनाएं भी तेजी से बढ़ती जा रही हैं. उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हो रही बारिश अब नीचे की घाटियों के लिए विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन में तब्दील हो रही है. दरअसल, ग्लेशियरों के पिघलने या फिर पीछे खिसकने से पहाड़ों पर भारी मात्रा में मोरेन मलबा जमा हो जाता है. ऐसे में जब इन क्षेत्रों में भारी बारिश होती है, तो ये लूज मलबा पानी सोखकर भारी हो जाता है और फिर अचानक भूस्खलन का रूप ले लेता है. इसके साथ ही कई बार अत्यधिक बारिश से होने वाले भूस्खलन नदियों का रास्ता रोककर कृत्रिम झीलें भी बना देते हैं. ऐसे में जब इन कृत्रिम झीलें पर पानी का दबाव बढ़ता है तो ये अस्थायी बांध टूट जाते हैं, जो नीचें के क्षेत्रों में भारी तबाही मचाते हैं. इसके अलावा, ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं. भारी बारिश के कारण झील में पानी तेजी से बढ़ रहा है. पहले जिस झील को भरने में 6 महीने का समय लगता था, वर्तमान समय में इस झील को भरने में लगभग एक हफ्ते का ही समय लग रहा है. जिस कारण झील टूट जाती है. ऐसे में उच्च हिमालय क्षेत्रों में आपदा की घटनाओं को बढ़ाने में भारी बारिश का होना महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. वर्षा ऋतु में हिमालय में हो रही अप्रिय घटनाओं को अब मात्र हिमालय की नहीं माना जा सकता। खास तौर से जब आने वाले समय में टूटते हिमालय के कारण देश में पारिस्थितिकी असुरक्षा बढ़ सकती हो, क्योंकि यह तो सब स्वीकार करेंगे ही किअकेला हिमालय देश के ६५ प्रतिशत से ज्यादा लोगों को पानी देता है। हवा का तो कोई मोल भाव ही नहीं है। यदि सबसे ज्यादा वन कहीं पनपते हैं तो वे हिमालय में ही हैं। इन सबके ऊपर ये हिमखंड ही हैं, जो हमारे लिए एक फिक्स डिपाजिट की तरह हैं, जो हर परिस्थिति में मानव को अमूल्य जल उपलब्ध कराते हैं। वर्तमान संकट फिर बारिश के रूप में कहर ढा रहा है। हिमालय का कोई भी कोना ऐसा नहीं है, खास तौर से पश्चिमी हिमालय, जहां उसका असर न दिखाई दे रहा हो। हिमाचल प्रदेश अबकी बार ज्यादा प्रभावित हुआ, लेकिन जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड भी उसकी चपेट में हैं। यह सब कुछ लंबे समय से होता चला जा रहा है और अब हिमालय के लोग चिंतित हैं। जब तमाम रास्ते उजड़ गए हों, आवाजाही बाधित हो गई हो और खाने-पीने का संकट सिर पर आ गया हो तो फिर कुछ बचा हुआ नहीं दिखता। देश की सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी रुकी हुई आवाजाही सीमाओं को असुरक्षित बना सकती है। इस बार की बारिश ने एक बार फिर 2013 की त्रासदी की याद दिला दी। तब केदारनाथ की घटना ने जान-माल का बड़ा नुकसान किया था। इस बार की बारिश ने फिर से हिमाचल और उत्तराखंड को पूरी तरह झकझोर दिया है। अब पहाड़ मानसून का स्वागत नहीं करते। स्थानीय लोगों के लिए मानसून का समय संकट भरा हो जाता है। पिछले एक दशक में हर साल हिमालय के किसी न किसी इलाके में बारिश से तबाही होती चली आ रही है। अब यह तबाही चिंता का विषय बननी चाहिए। जिस भूभाग से देश को जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अवयव मिलते हों, यदि वह संकट में हो तो फिर देश की परिस्थितियों को सुरक्षित नहीं समझ सकते। हिमालयी राज्यों का गठन आर्थिक असुरक्षा और पिछड़ेपन को दूर करने को लेकर हुआ था। इन राज्यों के गठन का एक उद्देश्य यह भी था कि उनके पिछड़ेपन को दूर करते हुए उन्हें देश की मुख्यधारा से जोड़ा जाए ताकि वहां से पलायन थमे। इस क्रम में उस सवाल की अनदेखी कर दी गई, जो पूरे हिमालय की पर्यावरण सुरक्षा को लेकर था। परिणाम सामने है, आज हिमालय त्रस्त है। आज हमें उन तमाम वैज्ञानिक अध्ययनों का संज्ञान लेना चाहिए, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो चुके हैं। धरती के बढ़ते तापमान ने सबको चिंतित कर दिया है। वैसे तो दुनिया का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं, जहां किसी न किसी तरह की प्राकृतिक आपदाएं न आती हों। इन्हीं वैज्ञानिक अध्ययनों का मानना है कि आने वाले समय में धरती के बढ़ते तापमान का सबसे ज्यादा असर हिमालयी क्षेत्रों में पड़ेगा। इसका कारण भी साफ है। हिमालय पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील हैं। पहाड़ों का हिस्सा कच्चा-पक्का है। एक छोटी सी छेड़छाड़ भी भारी पड़ जाती है। बढ़ते तापक्रम के साथ प्रकृति से छेड़छाड़ का सबसे अधिक असर कहीं दिखाई दे रहा है तो हिमालयी क्षेत्र में। दुर्भाग्य की बात है कि पहले हिमालय के पर्वत आर्थिक असमानता को झेलते थे और अब उन्हें पारिस्थितिकी असमानता ने भी घेर लिया है। हवा, मिट्टी, जंगल, पानी को पालने वाले लोग ही अब पारिस्थितिकी के दंश को झेल रहे हैं। भिन्न-भिन्न कारणों से पहाड़ जिस तरह टूटते चले जा रहे हैं, उसके कारण उनका अस्तित्व खतरे में है। पहाड़ी क्षेत्रों की तबाही का असर पूरे देश को झेलना पड़ेगा, क्योंकि अवैध खनन, अनियोजित निर्माण आदि के चलते पहाड़ बंजर हो जाएंगे। इससे वहां से पलायन की प्रवृत्ति को और बल मिलेगा। प्रधानमंत्री हमेशा पहाड़ों के प्रति संवेदनशील रहे हैं। उत्तराखंड को तो वह अपना घर मानते हैं। केदारनाथ के प्रति उनकी प्रबल आस्था है। वह जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब केदारनाथ आपदा के बाद उन्होंने अपने स्तर पर वहां कार्य कराने की इच्छा प्रकट की थी। उत्तराखंड की तरह हिमाचल से भी उनका खास लगाव है। समय आ गया है कि प्रधानमंत्री हिमालय की स्थिति का संज्ञान लेते हुए वहां के पर्यावरण की स्थितियों की गहन समीक्षा कराएं। हिमालयी राज्यों के पर्यावरण की जैसी अनदेखी हो रही है, उसे देखते हुए यह आवश्यक हो चुका है कि केंद्र सरकार हिमालय की रक्षा के लिए आगे आए। हिमालयी राज्यों की आर्थिकी ऐसी होनी चाहिए, जो पारिस्थितिकी पर केंद्रित हो। पहाड़ अब एक ऐसे माडल के प्रतीक्षा में हैं जो उसे हर तरह से स्थिरता प्रदान कर सकें। हिमालय और वहां के जनजीवन को बचाने की पहल तभी सार्थक सिद्ध हो सकेगी, जब उन कारणों का सही तरह निवारण किया जाएगा, जिनके चलते वे संकट में घिर रहे हैं। हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि जोशीमठ में क्या हुआ? जोशीमठ जैसी स्थितियां अन्यत्र भी उभर रही हैं। हिमालयी राज्यों के नीति-नियंताओं के साथ मिलकर एक ऐसी कार्यशैली बननी चाहिए, जो समस्त पर्वतीय क्षेत्रों के लिए आदर्श बने। यदि आज यह काम नहीं किया गया तो आने वाले समय में हिमालय एक बड़े खतरे से घिर जाएगा और यदि हिमालय खतरे में पड़ा तो देश भी पर्यावरणीय संकट से ग्रस्त हो जाएगा। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं











