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पहाड़ का पारम्परिक त्यौहार दूतिया

13/11/20
in उत्तराखंड, संस्कृति
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
कुमाऊं में मनाया जाता है पहाड़ का पारम्परिक त्यौहार दूतिया दीपावली एक ऐसा त्यौहार है जिसे पूरे देश भर में हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता हैं। जब बात त्यौहारो की आती है तो हमारे उत्तराखंड में हर त्यौहार को मनाने का अंदाज़ थोड़ा अलग है। यहां पर विभिन्न तरीकों से त्यौहारों को मनाया जाता है, एक ऐसा ही त्यौहार जिसे भारतवर्ष में भाईदूज के नाम से मनाया जाता है, जबकि उत्तराखंड के कुमाऊं में भाईदूज का त्यौहार नहीं बल्कि दूतिया त्यौहार मनाने की मान्यता है। तीज, त्यौहार व कौतिक पहाड़ की वे समृद्ध परम्पराएं रही हैं, जो सदियों से हमें अपनी जड़ों से जोड़े रही हैं। वैसे भी इतिहास गवाह है कि जो कौमें अपने संस्कृति को संजोये व सहेजे रहीं, वही इतिहास में कालजयी बनी रही।
कुमाऊं की संस्कृति अपने आप में वैभवशाली रही है। लेकिन लगातार हो रहे सांस्कृतिक अतिक्रमण की आबोहवा से कुमाऊं की लोक संस्कृति भी अछूती नहीं रही है। ऐसे ही दीपावली के तीन दिन बाद मनाये जाने वाले भैयादूज त्यौहार की बात करें तो भैयादूज का त्यौहार कुमाऊं की लोक संस्कृति का हिस्सा ही नहीं है। करीब तीन दशक पूर्व कब दबे पांव यह हमारी लोक सस्कृति का हिस्सा बन गया इसका हमें एहसास तक नहीं हुआ। यहां बता दे कि कुमाऊं में भैयादूज की जगह दूतिया त्यार मनाने की लोक परम्परा रही है, जिसे मनाने की तैयारी एकादशी या धनतेरस के आसपास शुरू हो जाती है। दूतिया में दीपवाली के दिन एक बर्तन में धान पानी में भिगौने के लिए डाले जाते हैं। इसके बाद गौवर्धन पूजा के दिन इस धान को पानी से बाहर निकाल लिया जाता है। धान को निखारने के लिए उसे एक कपड़े में बांध दिया जाता है। धान का सारा पानी निखरने के बाद धान का कढ़ाई में भूना जाता है। उसके बाद उसे गर्म ओखले में मूसल से कूटने की परम्परा है। इस दौरान धान गर्म होने के कारण उसका आकार चपटा हो जाता है और भूसा भी उससे अलग हो जाता है। इन भूने हुए व चपटे चावलों को चूड़ा कहते हैं। ये चूडे़ सिर में चढ़ाने के साथ ही मजे से खाने के लिए भी उपयोग किये जाते हैं।
बुजुर्ग महिला दूब के गुच्छों से परिवार के सदस्यों के सिर में तेल लगाती है। इस दौरान कई बार तेल सिर से बहने लग जाता है, इसे भी दूतिया की धार कहा जाता है। तेल बहने के बाद घर के सदस्यों के घुटनों, कंधों व सिर में च्यूड़े चढ़ाये जाते हैं, जिसे तीन से पांच बार क्रम में दौहराया जाता है।
इस प्रक्रिया को दौहराने के दौरान बुजुर्ग महिला घर के सदस्यों को आशीष वचन देती हैं, आप अपने जीवन में खुश व खुशहाल रहें। सुख शांति बनी रहे, खुशी का यह दिन यूं ही आपके जीवन में खुशियां लाता रहें। कुल मिलाकर कहने का अर्थ है कि इस दिन घर के बड़े बुजुर्गा द्वारा परिवार के सदस्यों के दुर्घायु के लिए मंगल कामना की जातीहै। इतना ही नहीं घर के सदस्यो के सिर पर च्यूड़ा चढ़ाने के बाद गाय व बैल के सिरों में भी च्यूड़े चढ़ाये जाने का रिवाज है। च्यूड़ा चड़ाने से पूर्व बैल के सींगों में सरसों का तेल लगाया जाता है गले में फूल माला पहनायी जाती है व गाय व बैल के माथे पर तिलक किया जाता हैए जो दर्शाता है कि हमारी लोक परम्पाओं में पालतू जानवरों को भी इंसान के समकक्ष सम्मान दिया जाता है। लेकिन समय में तेजी से आ रहे बदलाव व लगातार हो रहे सांस्कृतिक अतिक्रमण का असर हमारी लोक परम्पराओं पर भी दिखने लगा है। आधुनिकता की हवा ने हमारी परम्पराओं पर असर दिखाना शुरू कर दिया है। उसी का नतीजा है कि जातर, ओखल की जगह बाजार में मौजूद उपकरणों ने ले ली है। आने वाले समय में न तो दादी, ईजा-कुमाउं में मां को ईजा कहा जाता है, चाची द्वारा ओखल में तैयार च्यूड़ों का स्वाद ही लोगों को चखने को मिलेगा और न ही अपनों का वह अपनापन। गनीमत है कि विकास की आंधी के बाद बावजूद हमारी दूतिया त्यार की परम्परा अभी बची हुई है।
उत्तराखंड 9 नवंबर को अपनी उत्तराखंड राज्य के 21वें वर्षगांठ स्थापना दिवस के मनाने है लेकिन राज्य आंदोलनकारियों का सपना आज भी अधूरा है। राज्य आंदोलनकारियों का मानना है कि जिस मकसद को लेकर उत्तराखंड का गठन किया गया था, वो आज भी पूरा नहीं हो पाया है। घर गाँव.गाँव में जब से मशीन से धान की कुटाई होने लगी है, तब से ओखल भी खत्म हो रहे हैं प्रगति और विकास ने हमसे हमारा लोक व संस्कृति ही नहीं, बल्कि अपनापन भी छीन लिया है। इस सब के बाद भी दूतिया त्यार की परम्परा अभी काफी हद तक बची हुई हैण्सरकार ने भी संरक्षण के लिए किसी ने ये नहीं सोचा था।

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