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संकटः आर्किड के बिना कैसे बनेगा च्यवनप्राश ?

16/12/20
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
लगभग 5.5 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल में फैले हिमालय में जंतुओं की 30,377 प्रजातियां और उप.प्रजातियां हैं। हिमालय धरती पर सबसे ऊंचा और विशाल माउंटेन सिस्टम है जो 2,400 किलोमीटर लम्बा और 300 किलोमीटर से अधिक चौड़ा है। मध्य हिमालय में बसे उत्तराखंड में ही वनस्पतियों की 7000 और जंतुओं की 500 महत्वपूर्ण प्रजातियां मौजूद हैं। इस राज्य में तराई से भाभर और फिर मध्य हिमालय से लेकर हिमाद्रि और ट्रांस हिमालय तक 5 इको क्लाइमेटिक जोन हैं। पूरी दुनिया में पच्चीस हजार से अधिक प्रजातियों वाले आर्किड पादप हिमालय में यह 700 मीटर से करीब 3000 मीटर तक की ऊंचाई पर पाए जाते हैं। उत्तराखंड में आर्किड की लगभग 250 प्रजातियां पहचानी गई हैं, लेकिन वे वजूद खोने के कगार पर हैं। कम से कम 5 या 6 प्रजातियां तो विलुप्त होने ही वाली हैं। अगर हिमालय की जैव विविधता नहीं बची तो भारत के घर-घर में खाये जाने वाले च्यवनप्राश का उत्पादन ठप हो सकता है। हिमालय में ही आर्किड फूल की वे प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनको मिलाए बिना असली च्यवनप्राश बन ही नहीं सकता। असल में आर्किड पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं, क्योंकि जिन ऊंचाइयों पर वे पनपते हैं, उन ऊंचाइयों से निर्मित हिमालय के जैव विविधता के अक्षय स्रोत पर संकट मंडरा रहा है, जिसके चलते भारत की जैव विविधता भी खतरे में है।
जमीन या फिर बांज या तून जैसे पेड़ों पर उगने वाला आर्किड कई वनस्पतियों में परागण को सुगम बनाता है। च्यवनप्राश में आर्किड की कम से कम 4 प्रजातियों का इस्तेमाल होता है। ये प्रजातियां उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाती है। आर्किड को वनस्पति विज्ञानी लगभग डायनासोर जितनी पुरानी वनस्पति बताते हैं। अष्टवर्ग की तमाम औषधियां भारत में मौजूद हैं। 300 वर्षों से औषधियों के बारे में खोज नहीं हुई और भ्रम बना रहा। अष्टवर्ग के पौधों की उपलब्धता कम होने तथा औषधियों का निर्माण बड़े पैमाने पर होने के कारण शतावरी, अश्वगंधा आदि प्रतिनिधि द्रव्यों का प्रयोग किया जा रहा है। तराई और पहाड़ में तीन.चार दशक पहले तक मिलने वाली जड़ी.बूटियां नदारद हो रही हैं। पिथौरागढ़, मुनस्यारी, तुंगनाथ जैसे क्षेत्रों में जीवक, ऋषभक, काकोली, पटकी, सातमपंजा, अतनिस जैसी कई औषधियां पाई जाती थीं और आसानी से मिलती थीं।
जंगल में इन्हें मुफ्त मिलता देख लोगों ने उखाड़कर बेचना शुरू कर दिया और अब ये औषधियां दुर्लभ हो गई हैं। पहले एक ट्रिप में 50-60 जड़ी बूटियां मिल जाती थीं लेकिन अब 2-3 पौधे मिल जाएं तो बहुत हैं। च्यवनप्राश को तैयार करने में बेल, गनियार, गम्भारी, पाढल की छाल के अलावा बरियश मूल, सरिवन, पकिवन, वनमूंग, वनउड़द, पीपर, गोक्षरू, वनभष्टा, भटकैया, काकड़ासिंगी, भूमिआंवला, मुनक्का, जीवंती, पुष्करमूल, कालाअगर, बड़ी हरड़, गुड्ची, बड़ी इलायची, लाल चंदन, नील कमल, आडूसा की पत्ती, जीवक, ऋषभक, मेदा, मदामेदा, काकोली, क्षीर का कोली, ऋद्धि, बुद्धि और सबसे अधिक मात्रा में आंवले का प्रयोग होता है।
गाय का घी, खांड की चाशनी, शहद, वंशलोचन, दालचीनी, तेजपत्ता, नाग केसर भी मिलाए जाते हैं। इनमें कई औषधियां हिमालयी क्षेत्र में मिलती हैं। च्यवनप्राश को तैयार करने में बेल, गनियार, गम्भारी, पाढल की छाल के अलावा बरियश मूल, सरिवन, पकिवन, वनमूंग, वनउड़द, पीपर, गोक्षरू, वनभष्टा, भटकैया, काकड़ासिंगी, भूमिआंवला, मुनक्का, जीवंती, पुष्करमूल, कालाअगर, बड़ी हरड़, गुड्ची, बड़ी इलायची, लाल चंदन, नील कमल, आडूसा की पत्ती, जीवक, ऋषभक, मेदा, मदामेदा, काकोली, क्षीर का कोली, ऋद्धि, बुद्धि और सबसे अधिक मात्रा में आंवले का प्रयोग होता है। गाय का घी, खांड की चाशनी, शहद, वंशलोचन, दालचीनी, तेजपत्ता,
नाग केसर भी मिलाए जाते हैं। इनमें कई औषधियां हिमालयी क्षेत्र में मिलती हैं। च्यवनप्राश की शक्तियां कमजोर पड़ती जा रही हैं। ऐसा च्यवनप्राश के निर्माण में प्रयोग होने वाली 54 औषधियों में से कई के विलुप्त होने की वजह से हो रहा है।
कोरोना के कहर से बचने के लिए हर एक को अपनी इम्यूनिटी स्ट्रांग करने की सलाह दी जा रही है। ऐसे में अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए एक्सपर्ट्स द्वारा च्यकवनप्राश का सेवन करना काफी फायदेमंद माना जाता है। बच्चों की इम्यूनिटी कमजोर होने से इन्हें खासतौर पर इसका सेवन करवाना चाहिए। हालाँकि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वय स्थापित करने वाले कानून भी देश में क्रियान्वित किए गए हैं। इनके तहत वर्ष 2002 का जैव.विविधता कानून महत्वपूर्ण है। जैविक विविधता पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन का सदस्य होने के कारण, भारत में यह कानून लाया गया। यह कानून जैव.विविधता के संरक्षण, उसके तत्त्वों के टिकाऊ इस्तेमाल और जैविक संसाधनों के उपयोग से मिलने वाले लाभ के समान एवं उचित वितरण का प्रावधान करता है। यह वन अधिनियम से भिन्न, ग्रामीण व जनजातीय लोगों की पर्यावरण संरक्षण में भागीदारी को महत्ता देता है। यह इस कार्य में उनके पारम्परिक ज्ञान एवं अनुभवों को पहचान कर उनके विस्तार को प्रोत्साहित करने का प्रावधान भी करता है। विलुप्ति के हाशिये पर खड़ी वनस्पति प्रजातियों की यह केवल झाँकी भर है। अधिक दोहन के कारण यह विलुप्तप्रायः है।

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