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संकट में हैं नौले-धारे

18/11/20
in उत्तराखंड, पिथौरागढ़
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जल अत्यन्त महत्वपूर्ण और अपर्याप्त प्राकृतिक संसाधनों में से एक है, जो जीवन, जीवकोपार्जन, कृषि, चिरस्थायी सामाजिक विकास के साथ.साथ पारिस्थितिकीय एवं पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिये अति आवश्यक है।
पिथौरागढ़ का पुरातन नाम सोर था। सोर का अर्थ स्थानीय स्तर पर सरोवर से निकाला जाता है। आज भी पिथौरागढ़ नगर की ड्रेनेज व्यवस्था प्राकृतिक है। नगर के निचले हिस्से में तीन नाले बहते हैं। एतिहासिक तथ्यों के अनुसार उक्त प्राकृतिक ड्रैनेज सिस्टम सदियों पूर्व यहां मौजूद सरोवर के चलते है। शताब्दियों पूर्व सरोवर होने के कारण सोर वर्तमान पिथौरागढ़ में जल स्रोतों की संख्या काफी अधिक थी। जिला बनने से पूर्व यहां की जनता इन स्रोतों नौलों-धारों पर निर्भर थी। वर्तमान में भी बचे, खुचे नौलों-धारों पर नगर की 25 फीसद आबादी आश्रित है। पिथौरागढ़ के पर्वतीय क्षेत्र होने से यहां पर बड़े तालाब नहीं हैं। छोटे.छोटे नौले पोखर, धारे व गधेरे हैं। जिनका अस्तित्व वर्तमान में पूरी तरह खतरे में है। पिथौरागढ़ नगर व इसके आसपास में तीन दशक तक मौजूद अधिकांश नौले और धारे सूख चुके हैं। कुछ पोखरों का जल प्रदूषित हो चुका है। बामुश्किल बचे इन नौलों और धारों का भविष्य भी अब अधिक समय तक नहीं है।
पिथौरागढ़ नगर के फैलाव के साथ ही नौले धारे सिमटते गए। जिन स्थानों पर मौजूद नौलों.धारों का पानी लोग पीते थे। उन स्थानों पर अब कई मंजिला मकान बन चुके हैं। पानी वाले स्थानों पर सड़कें बनी हैं और अभी भी इस तरह का निर्माण जारी है।पहाड़ के गांवों में पलायन के कारण नौलों का अस्तित्व मिट रहा है। शहरों में जो नौले थे भी तो वह प्रदूषित हो गए हैं। दुल्हन जब पहली बार ससुराल में कदम रखती थी। उसके स्वागत के बाद उसे नौला बावड़ी में ले जाया था। एक टोकरी में गांव की महिलाएं फल, फूल, अक्षत, दुल्हन और दूल्हे के हाथ में बंधा कंकण लेकर जाते।
यह सब नौले के पास अर्पित कर दी जाती। वहां नाच गाना होता। दुल्हन को नौले का रास्ता दिखाना भी इस परंपरा का उद्देश्य रहता था। अब तो शादी किसी होटल, बारातघर में होती है। वहीं से दुल्हन को ससुराल की राह पकड़नी पड़ती है। लोग अब पेयजल के लिए नौलों पर निर्भर नहीं हैं। हर घर के पास या फिर घर के भीतर नलों के कनेक्शन हैं। ऐसे में न तो नौले की जरूरत रहती है और न विवाह के बाद इसकी कोई अनिवार्यता रह गई है। यहां तक कि गांवों में भी नौला सिवाने की प्रथा समाप्त होने लगी है। विवाह की बदलती परंपरा में जो चीजें लुप्त हो रही हैं। नौले हमारी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रहे हैं। यह जीवन का आधार थे और जीवन जीने की प्रेरणा भी देते थे। आने वाले समय में नई पीढ़ी न तो नौलों के बारे में जानकारी रख पाएगी और न उसे विवाह के बाद होने वाली नौल सिवाने की परंपरा का ही पता रहेगा। यदि आने वाले समय में शहर इस समस्या से बाहर निकलना चाहता है तो इसका हल जनसहभागिता से ही निकल सकता है। जनसहभागिता से ही हालात में बदलाव आ सकता है। सरकारी परियोजनाएं एक हजार करोड़ की भी आ जाएं तो इस समस्या से कुमाऊ बाहर नहीं आ सकता। समाधान के लिए पानी के प्रति समाज में जागृति का आना जरूरी है। पानी का मोल जब तक शहरों में रहने वाले नहीं समझेंगे और पानी की गुणवत्ता को लेकर वह जागरूक नहीं होगा, तब तक उसे इस बात की समझ नहीं होगी कि पानी से जुड़ी सभी बीमारियों के जड़ में प्रदूषित पानी है। और इससे बचाव के लिए परिवेश को साफ रखना होगा।
पानी की सफाई के संकल्प से पहले पूरे जनसहभागिता को मन की सफाई करनी होगी। मन का मैल साफ करना होगा। वहां मैल होगा तो असर नौलो और धारों की पानी में भी साफ दिखेगा। इस पूरी प्रक्रिया में सरकार की भूमिका नेतृत्व की नहीं बल्कि एक सहयोगी की होनी चाहिए। 2022 तक हर घर में नल और हर नल में जल की परिकल्पना को साकार करने का लक्ष्य रखा गया हैण् राष्ट्रीय जल जीवन मिशन का उद्देश्य हर घर में नल और हर नल में जल है। उन्होंने कहा कि मिशन तभी सार्थक होगाए जब हर नल में पानी होगा। यदि हिमालयी क्षेत्रों में भी जल के प्रति श्रद्धा और पवित्रता की भावना को समाज में फिर से स्थापित करने की ईमानदार कोशिश की जाए तो जलग्रहण क्षेत्रों को बचाना आसान हो सकता है। मूल में पानी को महज एक संसाधन भर समझने की उपभोक्तावादी मानसिकता कहीं भी नहीं थी। जल के साथ जीवन की समृद्धि की, सम्पूर्णता और श्रद्धा की भावना जुड़ी थी। दरअसलए नौलों और गधेरों के जलस्रोतों के साथ हमारे उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति और लोक साहित्य के गहरे सांस्कृतिक स्रोत भी जुड़े हुए हैं। वर्त्तमान हालात में नौलों और जलधारों के सूखने का मतलब है एक जीवंत पर्वतीय जल संस्कृति का लुप्त हो जाना। इसलिए जल की समस्या महज एक उपभोक्तावादी समस्या नहीं बल्कि जल, जमीन और जंगलों के संरक्षण से जुड़ी एक पर्यावरणवादी समस्या भी है।
हम यदि अपनी देवभूमि को हरित क्रांति से जोड़ना चाहते हैं तो हमें अपने पुराने नौलों, धारों, खालों, तालों आदि जल संचयन के संसाधनों को पुनर्जीवित करना होगा। पारंपरिक जलण्स्रोत यथा नोले, धारे, चाल, खाल बचाने की मुहिम जलसंचेतना की दिशा में अच्छी पहल है। आज आवश्यकता है चीड़ के स्थान पर चौड़ी पत्तियों वाले बाँज, बुरांश, उतीस आदि वृक्षों को लगाए जाने की ताकि भूमिगत जल रिचार्ज हो सके। प्रदेश शासन को इस मुहिम में अपना भरपूर योगदान देना चाहिए।जल समस्या का सबसे बड़ा समाधान है।

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