डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जूनियर भारतीय पिस्टल टीम के मुख्य कोच जसपाल राणा उत्तराखंड(देहरादून) के रहने वाले हैं। उन्होंने निशानेबाजी में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं। साल 1994 में 18 साल की उम्र से ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने का सिलसिला शुरू कर दिया था। एशियन गेम्स में जसपाल राणा ने भारत को निशानेबाजी में स्वर्ण पदक दिलाकर देश का नाम रोशन किया था। खास बात ये है कि जसपाल राणा को निशानेबाजी का ये हुनर विरासत में मिला है। उनके पिता से लेकर बच्चे भी शूटिंग के क्षेत्र में देश नाम कमा रहे हैं। जूनियर भारतीय पिस्टल टीम के मुख्य कोच जसपाल राणा उत्तराखंड(देहरादून) के रहने वाले हैं। उन्होंने निशानेबाजी में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं। साल 1994 में 18 साल की उम्र से ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने का सिलसिला शुरू कर दिया था। एशियन गेम्स में जसपाल राणा ने भारत को निशानेबाजी में स्वर्ण पदक दिलाकर देश का नाम रोशन किया था। खास बात ये है कि जसपाल राणा को निशानेबाजी का ये हुनर विरासत में मिला है। उनके पिता से लेकर बच्चे भी शूटिंग के क्षेत्र में देश नाम कमा रहे हैं। जूनियर भारतीय पिस्टल टीम के मुख्य कोच जसपाल राणा उत्तराखंड(देहरादून) के रहने वाले हैं। उन्होंने निशानेबाजी में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं। साल 1994 में 18 साल की उम्र से ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने का सिलसिला शुरू कर दिया था। एशियन गेम्स में जसपाल राणा ने भारत को निशानेबाजी में स्वर्ण पदक दिलाकर देश का नाम रोशन किया था। खास बात ये है कि जसपाल राणा को निशानेबाजी का ये हुनर विरासत में मिला है। उनके पिता से लेकर बच्चे भी शूटिंग के क्षेत्र में देश नाम कमा रहे हैं। जूनियर भारतीय पिस्टल टीम के मुख्य कोच जसपाल राणा उत्तराखंड(देहरादून) के रहने वाले हैं। उन्होंने निशानेबाजी में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं। साल 1994 में 18 साल की उम्र से ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने का सिलसिला शुरू कर दिया था। एशियन गेम्स में जसपाल राणा ने भारत को निशानेबाजी में स्वर्ण पदक दिलाकर देश का नाम रोशन किया था। खास बात ये है कि जसपाल राणा को निशानेबाजी का ये हुनर विरासत में मिला है। उनके पिता से लेकर बच्चे भी शूटिंग के क्षेत्र में देश नाम कमा रहे हैं। जूनियर भारतीय पिस्टल टीम के मुख्य कोच जसपाल राणा उत्तराखंड(देहरादून) के रहने वाले हैं। उन्होंने निशानेबाजी में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं। साल 1994 में 18 साल की उम्र से ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने का सिलसिला शुरू कर दिया था। एशियन गेम्स में जसपाल राणा ने भारत को निशानेबाजी में स्वर्ण पदक दिलाकर देश का नाम रोशन किया था। खास बात ये है कि जसपाल राणा को निशानेबाजी का ये हुनर विरासत में मिला है। उनके पिता से लेकर बच्चे भी शूटिंग के क्षेत्र में देश नाम कमा रहे हैं। भारत के दिग्गज निशानेबाज और उत्तराखंड के शान जसपाल राणा का निधन हो गया है। जर्मनी के म्यूनिख में आयोजित आईएसएसएफ वर्ल्ड कप से भारतीय दल के साथ वापस लौटते समय फ्लाइट में उनकी तबीयत बिगड़ गई थी। नई दिल्ली पहुंचने पर उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। जसपाल राणा का असमय जाना उत्तराखंड सहित पूरे देश और खेल दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा आघात है।उत्तराखंड के टिहरी जिले के जौनपुर ब्लॉक स्थित भाल गांव के मूल निवासी जसपाल राणा देश के सबसे बेहतरीन निशानेबाजों में से एक रहे हैं। उन्हें उनके पिता और बीएसएफ अधिकारी नारायण सिंह राणा ने प्रशिक्षित किया था।महज 12 वर्ष की उम्र में जसपाल राणा ने अहमदाबाद में 31वीं राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप के जरिए अपना नेशनल डेब्यू किया और सबको चौंकाते हुए रजत पदक पर कब्जा जमाया। वर्ष 1994 में 46वीं विश्व शूटिंग चैंपियनशिप (जूनियर सेक्शन) में उन्होंने स्टैंडर्ड पिस्टल शूटिंग में स्वर्ण पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमाई।अपने पूरे करियर में जसपाल राणा ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुल 600 से अधिक पदक अपने नाम किए। खेल के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें अर्जुन पुरस्कार और वर्ष 2002 में देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाजा था।निशानेबाजी से संन्यास लेने के बाद जसपाल राणा ने बतौर कोच भारतीय शूटिंग को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उनके मार्गदर्शन में देश को कई विश्वस्तरीय निशानेबाज मिले।जसपाल राणा राजनीति में भी अपना हाथ आजमा चुके हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर में पहले भारतीय जनता पार्टी और फिर कांग्रेस पार्टी का हाथ थामा। जसपाल राणा ने साल 2009 का लोकसभा चुनाव टिहरी सीट से भाजपा प्रत्याशी के रूप में लड़ा, लेकिन उन्हें कांग्रेस के विजय बहुगुणा के हाथों हार का सामना करना पड़ा। खास बात ये भी है कि जसपाल राणा और राजनाथ सिंह के बीच पारिवारिक रिश्ते हैं। जसपाल के पिता नारायण सिंह राणा और राजनाथ सिंह आपस में समधी हैं। जसपाल राणा राजनीति में भी अपना हाथ आजमा चुके हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर में पहले भारतीय जनता पार्टी और फिर कांग्रेस पार्टी का हाथ थामा। जसपाल राणा ने साल 2009 का लोकसभा चुनाव टिहरी सीट से भाजपा प्रत्याशी के रूप में लड़ा, लेकिन उन्हें कांग्रेस के विजय बहुगुणा के हाथों हार का सामना करना पड़ा। खास बात ये भी है कि जसपाल राणा और राजनाथ सिंह के बीच पारिवारिक रिश्ते हैं। पूर्व खेल मंत्री नारायण सिंह राणा की पोती और पूर्व अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज और वर्तमान में भारतीय निशानेबाजी टीम के कोच जसपाल राणा की बेटी हैं। अपने पिता से ही प्रेरणा लेकर वह शूटिंग के क्षेत्र में आई हैं। मंझौन शूटिंग रेंज में उन्होंने शूटिंग की बारीकिया सीखीं। इसके बाद पिता ने उन्हें दिल्ली के डॉ. कर्णी सिंह शूटिंग रेंज में प्रोफेशनल शूटिंग का प्रशिक्षण लेने भेजा। वो भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीत चुकी हैं। इसके साथ ही उनका बेटा युवराज भी निशानेबाजी की बारीकियां सीख रहा है। जसपाल के पिता नारायण सिंह राणा और राजनाथ सिंह आपस में समधी हैं। जसपाल राणा इस समय कई और युवा खिलाड़ियों को तैयार कर रहे हैं. वो देहरादून में जसपाल राणा इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन एंड टेक्नोलॉजी भी चलाते हैं. जहां पर कई युवा प्रतिभाओं को निखारा जाता है वर्ष 2024 के पेरिस ओलंपिक में इतिहास रचने वाली स्टार निशानेबाज मनु भाकर के वे निजी कोच रहे, जिन्होंने भारत को दो कांस्य पदक दिलाए।इसके अलावा उन्होंने सौरभ चौधरी, अनीश भानवाला और चिंकी यादव जैसे युवा सनसनीखेज खिलाड़ियों को भी तराशा। खेल और कोचिंग में उनके इस अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें साल 2020 में द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। हाल ही में वे भारतीय पिस्टल टीम के हाई-परफॉर्मेंस कोच के रूप में सेवाएं दे रहे थे।जसपाल राणा ने हमेशा ओलंपिक में पदक जीतने का सपना देखा, लेकिन उन्हें इस बात का अफसोस रहा कि स्टैंडर्ड पिस्टल और सेंटर-फायर पिस्टल जैसी स्पर्धाएं ओलंपिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं थीं। इसके बावजूद उन्होंने अपने खेल जीवन में कई अंतरराष्ट्रीय पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाया।प्रतियोगी निशानेबाजी से दूरी बनाने के बाद भी उनका खेल से रिश्ता नहीं टूटा। उन्होंने देहरादून में युवा निशानेबाजों को तैयार करने का जिम्मा उठाया और पौंधा स्थित जसपाल राणा शूटिंग अकादमी के माध्यम से नई प्रतिभाओं को प्रशिक्षण दिया। बाद में उन्हें राष्ट्रीय जूनियर शूटिंग टीम का कोच भी बनाया गया। इसी दौरान उन्होंने युवा प्रतिभाओं को पहचानने और तराशने का काम किया। भारतीय निशानेबाजी की स्टार खिलाड़ियों में शामिल मनु भाकर और सौरभ चौधरी जैसी प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। दोनों खिलाड़ियों ने बाद में ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया।जसपाल राणा का परिवार भी निशानेबाजी से जुड़ा रहा। उनकी बेटी देवांशी राणा राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीत चुकी हैं और परिवार की यह खेल परंपरा आगे बढ़ा रही हैं। उनके निधन से भारतीय खेल जगत में शोक की लहर है। लेकिन अब उनके अचानक निधन की खबर ने खेल जगत को हिलाकर रख दिया हैपद्म श्री’ जसपाल राणा जी का निधन अत्यंत दु:खद एवं भारतीय खेल जगत की अपूरणीय क्षति है। विनम्र श्रद्धांजलि।..लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











