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सुख समृद्धि का प्रतीक है ये हरेला पर्व

16/07/20
in उत्तराखंड, संस्कृति
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत कृषि प्रधान देश है ऐसे में अच्छी वर्षा और अछी कृषि की आस लिए हमारे कृषक हरेला पर्व मनाते हैं। श्रावण मास में हरेला को ज्यादा महत्व देने की एक वजह इस माह का शंकर भगवान को विशेष प्रिय होना भी है। उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है और पहाड़ों पर ही भगवान शंकर का वास माना जाता है। इसलिए भी उत्तराखण्ड में श्रावण मास में पड़ने वाले हरेला का अधिक महत्व मिला है। भारत कृषि प्रधान देश है ऐसे में अच्छी वर्षा और अछी कृषि की आस लिए हमारे कृषक हरेला पर्व मनाते हैं। श्रावण मास में हरेला को ज्यादा महत्व देने की एक वजह इस माह का शंकर भगवान को विशेष प्रिय होना भी है। उत्तराखंड प्रारंभ से ही आंदोलन की धरती रहा है।
अपने हक, समाज हित और पर्यावरण को लेकर उत्तराखंड़ में सैंकड़ों आंदोलन हुए हैं। चिपको आंदोलन और उत्तराखंड़ राज्य आंदोलन की गूंज तो पूरे विश्व ने सुनी थीए जिसमे राज्य की महिला शक्ति ने बढ़.चढ़कर भाग लिया था और दिल्ली तक सरकार को हिला दिया था, लेकिन राज्य बनने के बाद भी उत्तराखंड में न तो अपेक्षाकृत विकास हुआ और न ही पहाड़ी इलाकों में समस्या का समाधान। हां, उत्तरखंड की प्राकृतिक संपदा का बड़े स्तर पर दोहन जरूर किया गया। उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है और पहाड़ों पर ही भगवान शंकर का वास माना जाता है। इसलिए भी उत्तराखण्ड में श्रावण मास में पड़ने वाले हरेला का अधिक महत्व मिला है। अपने जीवन में हमेशा ज्यादा से ज्यादा संख्या में पौधे लगाने चाहिए। पर्यावरण के बिना हमारा जीवन अधूरा हैं। अगर पेड़ों की संख्या घटती रही और हम पौधे ज्यादा न लगा सके तो आने वाली पीढ़ी भी हमें किसी सूरत में माफ नहीं करेगी। इसलिए सभी को अपने आसपास पौधा जरूर लगाना चाहिए ताकि हमारा वातावरण हरा भरा रहे। एक पौधा स्वयं धूप सहन कर सभी को छाया व फल देने का काम करता हैं।
प्रकृत्ति ने हमें बहुत कुछ दिया हैं हमारा भी दायित्व बनता है कि हम भी प्रकृत्ति को और ज्यादा सुंदर बनाएं। इतना ही नहीं सभी को चाहिए कि वह अपने व परिवार के किसी भी सदस्य के जन्मदिवस, बुजुर्गों की पुण्यतिथि के साथ साथ अन्य किसी भी शुभ अवसर पर एक पौधा अवश्य लगाएं ताकि हमारा पर्यावरण शुद्धता से भरा रहे। 15 प्रतिशत जंगल ही भारत में बचे रहने की बात कहते हुए कहा गया कि सरकार 2 प्रतिशत जंगल बढ़ाने को करोड़ों रूपए खर्च रही है। धरती पर कम से कम 33 प्रतिशत जंगल होने ही चाहिए । वृक्षारोपण आसान है, लेकिन उसकी सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण है। वृक्ष की सुरक्षा से ही मानव की सुरक्षा होगी। मांगलिक कार्य उपनयन संस्कार, जन्मदिनए विवाह आदि शुभ अवसर पर कम से कम एक पेड़ अवश्य लगाने का आह्वान कि एक वृक्ष 100 पुत्र समान है अपने पूर्वजों की पुण्यस्मृति में पीपल या बरगद का पेड़ अवश्य लगाएं और उसकी सुरक्षा करें क्योंकि वृक्ष हमारे लिए जीवन है और वृक्ष बचेगा तो ही जीवन बचेगा।
देश को प्रदूषण मुक्त करने से उनका कोई लेना देना नही है।पर्यावरण संरक्षण जागरूकता कार्यक्रम सरकार को चलाना चाहिए। सभी व्यक्ति अपने घरों पर एक पौधा लगाने का जगह खाली रखकर पौधा जरूर लगाएं। प्रदूषण मुक्त भारत का संकल्प लेकर अपने जीवन में हर नागरिक एक पौधा अवश्य लगाये लेकिन सरकार के साथ साथ देश प्रदेश के सभी सम्मानित नागिरकों को ध्यान आकृष्ट करने की आवश्यक्ता है कि क्या एक दिन एक पेड़ लगाने और फोटो खिंचाने से क्या पर्यावरण में सुधार होगा। ऐसा बिल्कुल नही हो सकता जिस प्रकार साल में एक दिन पर्यावरण दिवस हरेला पर सभी बुद्धजीवी वर्ग पौधा लगाते है। उनको थोड़ा जागरूक होने की आवश्यक्ता है कि देश प्रदेश का प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन के जन्मदिन शादी के वैवाहिक वर्षगाठ, शादी के शुभ अवसर पर या किसी भी किसी भी पर्व पर एक वृक्ष लगाने का प्रयास और उसको करें। जिससे मानव समाज के लिए शुद्ध वातावरण प्राप्त हो।
आज के समय में पौधारोपण की तस्वीरें खिंचाने का जो होड़ है।हर व्यक्ति पेड़ पर हाथ लगाकर फोटो खिंचाते नजर आते रहते हैं। एक पौधरोपण पर अनेकों लोग एक साथ फोटो खिंचाते है और सोशल मीडिया पर अपलोड करते हैं। अच्छी बात है मगर देश हित व मानव जीवन के विशेष हित को ध्यान में रखते हुये देश का प्रत्येक व्यक्ति एक.एक पौधा अपने जीवन के जन्मदिन, शादी के शुभ अवसर पर, वैवाहिक वर्षगाठ पर एक पौधा जरूर लगाएण्उत्तराखण्ड के वनों की सुरक्षा के लिए वहां के लोगों द्वारा 1970 के दशक में आरम्भ किया गया आंदोलन है। इसमें लोगों ने पेड़ों केा गले लगा लिया ताकि उन्हें कोई काट न सके। यह आलिंगन दरअसल प्रकृति और मानव के बीच प्रेम का प्रतीक बना और इसे ष्चिपको ष् की संज्ञा दी गई। उसके लिए जंगल का प्रश्न उसकी जीवन. मृत्यु का प्रश्न है। अतः वनों से संबंधित किसी भी निणर्य में उनकी राय को शामिल करनी चाहिए। चिपको आंदोलन ने वंदना शिवा को विकास के एक नये सिद्धांत पर्यावरण नारीवाद के लिए प्रेरणा दीए जिसमें पर्यावरण तथा नारी के बीच अटूट संबंधों को दर्शाया गया है। मैती आंदोलन भारत का एक ऐसा पर्यावरण आंदोलन है जिसने पर्यारण और लोगों के बीच एक भावनात्मक संबंध बनाया है। कल्याण सिंह रावत द्वारा 1995 में इस आंदोलन को प्रारंभ किया था।

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