डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
डिजिटल क्रांति ने निस्संदेह भारत को बदल दिया है, लेकिन इसने एक समानांतर चुनौती भी खड़ी कर दी है इलेक्ट्रॉनिक कचरा (ई-कचरा)। ई-कचरे में प्लग या बैटरी वाले किसी भी बेकार उत्पाद को शामिल किया जाता है, जिसमें पुरानी वाशिंग मशीन और रेफ्रिजरेटर से लेकर उपयोग में समाप्त हो चुके स्मार्टफोन और लैपटॉप तक शामिल हैं।प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 1,500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी है. इस योजना का उद्देश्य देश में सेकेंडरी सोर्स से क्रिटिकल मिनरल्स को अलग करने और उत्पादन के लिए रीसाइक्लिंग क्षमता विकसित करना है. यह पहल नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य घरेलू उत्पादन क्षमता और सप्लाई चेन को मजबूत बनाना है.केंद्रीय खान मंत्रालय ने यह जानकारी दी. योजना का कार्यकाल वित्त वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक छह साल का होगा. इसमें ई-वेस्ट, लिथियम आयन बैटरी स्क्रैप और अन्य स्क्रैप (जैसे एंड-ऑफ-लाइफ व्हीकल्स के कैटलिटिक कन्वर्टर) को रीसाइक्लिंग के लिए पात्र फीडस्टॉक माना गया है.देश में मोबाइल फोन, लैपटॉप, टीवी, रेफ्रिजरेटर, बैटरियां, तार और छोटे-बड़े इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है. तकनीक तेजी से बदल रही है, जिसके कारण लोग पुराने उपकरणों की जगह नए उत्पाद खरीद रहे हैं. ऐसे में हर साल ई-वेस्ट की मात्रा भी तेजी से बढ़ रही है. अब इसे केवल प्रदूषण और जहरीले कचरे के रूप में देखने के बजाय रोजगार और संसाधन प्रबंधन के नजरिए से भी देखा जाने लगा है.ई-वेस्ट अब केवल पर्यावरण की चुनौती नहीं, बल्कि छोटे उद्यमियों, युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार और कारोबार का नया अवसर बनकर उभर रहा है. उत्तराखंड में भी इस दिशा में कई पहल शुरू हो चुकी हैं. घरों में पड़े पुराने मोबाइल, खराब लैपटॉप, टूटे टीवी, बेकार फ्रिज, इस्तेमाल से बाहर हो चुकी बैटरियां और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अब सिर्फ कबाड़ नहीं रह गए हैं. तेजी से बढ़ते ई-वेस्ट के बीच अब इन्हें ग्रीन जॉब्स, स्थानीय उद्यमिता और सर्कुलर इकोनॉमी के नए अवसर के रूप में देखा जा रहा है.विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ई-कचरे का वैज्ञानिक, सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से प्रबंधन किया जाए तो यह न केवल पर्यावरण संरक्षण में मदद करेगा, बल्कि हजारों युवाओं, तकनीशियनों, स्वयं सहायता समूहों और छोटे कारोबारियों के लिए रोजगार का स्थायी माध्यम भी बन सकता है. उत्तराखंड में भी सरकार इस दिशा में कई योजनाओं पर काम कर रही हैविशेषज्ञों का कहना है कि हर खराब इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को तुरंत तोड़कर रिसाइक्लिंग के लिए भेजना जरूरी नहीं होता. कई मोबाइल फोन, लैपटॉप और घरेलू उपकरण मामूली मरम्मत के बाद दोबारा उपयोग किए जा सकते हैं. वहीं पूरी तरह खराब हो चुके उपकरणों से भी स्क्रीन, कैमरा, सर्किट बोर्ड, मोटर, तार और अन्य उपयोगी पुर्जे निकाले जा सकते हैं. इससे एक ओर उत्पादों का जीवनकाल बढ़ता है तो दूसरी ओर कम कीमत पर उपकरण उपलब्ध होने से उपभोक्ताओं को भी फायदा मिलता है. साथ ही स्थानीय स्तर पर मोबाइल रिपेयर, कंप्यूटर सर्विसिंग और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मरम्मत करने वाले तकनीशियनों के लिए लगातार रोजगार के अवसर भी तैयार होते हैं. जो उपकरण दोबारा उपयोग योग्य नहीं हैं, उनके लिए सुरक्षित संग्रह, छंटाई और भंडारण बेहद जरूरी है. विशेषज्ञों का मानना है कि हर जिले में महंगे धातु पुनर्प्राप्ति संयंत्र लगाना जरूरी नहीं है, लेकिन प्रत्येक शहर और जिले में जिम्मेदार कलेक्शन सेंटर और एग्रीगेशन नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए.वार्ड स्तर पर छोटे संग्रह केंद्र, मोबाइल कलेक्शन वाहन और आवासीय सोसायटियों, स्कूलों, बाजारों व कार्यालय परिसरों में नियमित संग्रह अभियान चलाकर बड़ी मात्रा में ई-वेस्ट को अधिकृत रिसाइक्लरों तक पहुंचाया जा सकता है. ऐसे केंद्र केवल कबाड़ जमा करने के स्थान नहीं होंगे, बल्कि स्थानीय सेवा केंद्र के रूप में काम करेंगे, जहां उपकरण स्वीकार करने, प्राथमिक जांच, सुरक्षित पैकिंग, वजन दर्ज करने और अधिकृत रिसाइक्लिंग इकाइयों तक भेजने का काम किया जाएगा. विशेषज्ञ का मानना है कि ई-वेस्ट प्रबंधन में स्वयं सहायता समूहों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है. ये समूह घर-घर जागरूकता अभियान चलाने, लोगों से ई-वेस्ट एकत्र करने और स्थानीय स्तर पर संग्रह अभियान संचालित करने का काम कर सकते हैं. वहीं स्टार्टअप ऑनलाइन पिकअप बुकिंग, डिजिटल रसीद, सामग्री की ट्रैकिंग और रिकॉर्ड प्रबंधन जैसी सेवाएं विकसित कर सकते हैं. .स्थानीय उद्यमी संग्रह, सुरक्षित परिवहन, उपकरण परीक्षण और पुनः उपयोग योग्य पुर्जों की ग्रेडिंग जैसे क्षेत्रों में अपना कारोबार शुरू कर सकते हैं. वहीं वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रहे कबाड़ी और अनौपचारिक संग्रहकर्ताओं को व्यवस्था से बाहर करने के बजाय उन्हें प्रशिक्षण, सुरक्षा उपकरण और अधिकृत संस्थाओं के साथ जोड़ने की जरूरत है. इससे उनकी आजीविका भी सुरक्षित रहेगी और ई-वेस्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन भी सुनिश्चित होगा. उत्तराखंड के भगवानपुर में ई-वेस्ट डिस्पोजल के लिए प्लांट स्थापित किया गया है, जो देश के चुनिंदा अधिकृत ई-वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट्स में शामिल है. उनके अनुसार राज्य सरकार का उद्देश्य केवल ई-कचरे का निपटान करना नहीं, बल्कि इसे पर्यावरण संरक्षण, कौशल विकास और रोजगार सृजन के मजबूत माध्यम के रूप में विकसित करना भी है. उत्तराखंड के भगवानपुर में ई-वेस्ट डिस्पोजल के लिए प्लांट स्थापित किया गया है, जो देश के चुनिंदा अधिकृत ई-वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट्स में शामिल है. उनके अनुसार राज्य सरकार का उद्देश्य केवल ई-कचरे का निपटान करना नहीं, बल्कि इसे पर्यावरण संरक्षण, कौशल विकास और रोजगार सृजन के मजबूत माध्यम के रूप में विकसित करना भी है. कांवड़ मेले के दौरान रोजाना निकलने वाले सैकड़ों टन कूड़े के निस्तारण के लिए हरिद्वार नगर निगम भी पुरजोर कोशिश कर रहा है. कूड़े की सफाई के साथ पर्यावरण संरक्षण को लेकर नगर निगम प्रशासन ने कई नई पहल शुरू की है. जिसके तहत गंगा घाटों पर स्नान के बाद श्रद्धालुओं द्वारा छोड़े जाने वाले पुराने कपड़े और पॉलीथीन अब कचरे में नहीं जाएंगे. बल्कि, उनका पुनर्चक्रण कर रीसाइकिल्ड कॉटन फाइबर तैयार किया जाएगा.इसके साथ ही सिंगल यूज प्लास्टिक के बदले श्रद्धालुओं को निशुल्क कम्पोस्टेबल बैग दिए जा रहे हैं. जबकि, घाटों पर तैनात स्वच्छता दूत मेगाफोन यानी लाउडस्पीकर के जरिए लोगों को स्वच्छता का संदेश दे रहे हैं. ताकि, हरिद्वार में प्लास्टिक कचरा न फैले और स्वच्छ तरीके से कांवड़ यात्रा चलेकांवड़ मेले के दौरान रोजाना निकलने वाले सैकड़ों टन कूड़े के निस्तारण के लिए हरिद्वार नगर निगम भीपुरजोर कोशिश कर रहा है. कूड़े की सफाई के साथ पर्यावरण संरक्षण को लेकर नगर निगम प्रशासन ने कई नई पहल शुरू की है. जिसके तहत गंगा घाटों पर स्नान के बाद श्रद्धालुओं द्वारा छोड़े जाने वाले पुराने कपड़े और पॉलीथीन अब कचरे में नहीं जाएंगे. बल्कि, उनका पुनर्चक्रण कर रीसाइकिल्ड कॉटन फाइबर तैयार किया जाएगा.इसके साथ ही सिंगल यूज प्लास्टिक के बदले श्रद्धालुओं को निशुल्क कम्पोस्टेबल बैग दिए जा रहे हैं. जबकि, घाटों पर तैनात स्वच्छता दूत मेगाफोन यानी लाउडस्पीकर के जरिए लोगों को स्वच्छता का संदेश दे रहे हैं. ताकि, हरिद्वार में प्लास्टिक कचरा न फैले और स्वच्छ तरीके से कांवड़ यात्रा चले हरिद्वार नगर निगम क्षेत्र से रोजाना करीब 200 टन कूड़ा निकलता है और कांवड़ जैसे आयोजन में यह आंकड़ा दोगना हो जाता है. इसलिए नगर निगम ने नेचर फाउंडेशन के सहयोग से कांवड़ मेले में पुराने वस्त्रों के वैज्ञानिक संग्रहण का अभियान शुरू किया है. हरकी पौड़ी, मालवीय घाट, सुभाष घाट, नाई घाट, विष्णु घाट और सीसीआर घाट समेत प्रमुख घाटों पर विशेष डस्टबिन लगाए गए हैं.यहां तैनात 20 प्रशिक्षित कार्मिक श्रद्धालुओं की ओर से छोड़े गए वस्त्रों को अलग-अलग एकत्र कर सराय स्थित मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी सेंटर भेज रहे हैं. वहां वस्त्रों का वजन दर्ज करने के बाद उन्हें सुरक्षित रखा जा रहा है. इसके साथ ही कूड़े वहां कूड़ा निस्तारण प्लांट में कूड़े का निस्तारण भी किया जा रहा है नगर निगम ने प्लास्टिक प्रदूषण रोकने के लिए प्लास्टिक एक्सचेंज अभियान भी शुरू किया है. इसके तहत श्रद्धालुओं से प्रतिबंधित सिंगल यूज प्लास्टिक पॉलीथीन लेकर उन्हें निशुल्क कम्पोस्टेबल बैग उपलब्ध कराए जा रहे हैं. निगम की टीमें लोगों को प्लास्टिक से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान और उसके विकल्पों के बारे में भी जागरूक कर रही हैं. इसके लिए लाउडस्पीकर का सहारा लिया जा रहा है. E-कचरे की रीसाइक्लिंग में भारत के लिए कई बड़ी चुनौतियां हैं। हालांकि, भारत भारत इस स्थिति से निपटने के लिए कई बड़े कदम उठा रहा है। भारत सरकार ने ‘विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी’ को मजबूत किया है, जिसमें उत्पादकों को अपने उत्पादों के अंतिम जीवन की जिम्मेदारी लेनी होती है।दिल्ली में देश का पहला ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग पार्क बन रहा है, जो सालाना 51,000 टन प्रोसेस करने की क्षमता रखेगा। CPCB रजिस्टर्ड रिसाइक्लर्स बढ़ रहे हैं, लेकिन असंगठित क्षेत्र अभी भी हावी है। कुछ कंपनियां EPR नियमों को चुनौती दे रही हैं, क्योंकि लक्ष्य (80% तक) मुश्किल लगते हैं और लागत बढ़ती है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











