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उत्तराखंड में भी हो सकता है अहमदाबाद जैसा हादसा

15/07/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
चार धाम यात्रा पर उत्तराखंड आने वाले श्रद्धालुओं को केदारनाथ धाम तक पहुंचने वाली हेली कंपनियां, अधिक लाभ कमाने के फेर में सुरक्षा मनको की अनदेखी कर यात्रियों को लगातार खतरे में डाल रही हैं।अगर समय रहते जिम्मेदार न जागे तो उत्तराखंड में भी अहमदाबाद जैसे हादसे की पुनरावृति हो सकती है। हेली कंपनियों की मनमानी पर जिम्मेदारों की अब तक चली आ रही चुप्पी बेहद आश्चर्यजनक है।चालू सीजन में चार धाम यात्रा आरंभ होने से अब तक यात्रा क्षेत्र में चार हेलिकॉप्टर दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। इन दुर्घटनाओं में दौरान छह लोग अपनी जान भी गंवा चुके हैं। बावजूद इसके सरकारी सिस्टम हेली कंपनियों द्वारा सुरक्षा मानकों की अनदेखी और अन्य सुरक्षात्मक उपायों को लेकर उदासीन बना हुआ है। याद दिलाना होगा कि पिछले महीने की 8 तारीख को उत्तरकाशी के गंगनानी के समीप एक सात सीटर चार्टर्ड हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इसमें पायलट रोबिन सहित छह लोगों की मौत हो गई थी,वहीं 12 मई को बदरीनाथ हेलिपैड पर थंबी एविएशन का हेलिकॉप्टर रपट गया था। इसमें पायलट सहित छह लोग सवार थे।शुक्र है कि हेलिकॉप्टर ने उस समय उड़ान नहीं भरी थी। इस घटना चंद दिन बाद ही केदारनाथ में हेली एंबुलेंस की टेल रोटर टूटने की वजह से इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी थी। गनीमत है कि इस दौरान पायलट सहित सभी तीन लोग सुरक्षित रहे। केदारनाथ हाल ही में केस्ट्रल कंपनी के एक हेलीकॉप्टर को अचानक सिरसी बडासू में सड़क पर ही लैंड करना पड़ा था यह। जिस समय हेलीकॉप्टर की इमरजेंसी लैंडिंग हुई थी, सौभाग्यवश उस समय कोई वाहन वहां से नहीं गुजर रहा था।हालांकि, सड़क पर लैंडिंग के दौरान हेलीकॉप्टर की रोटर टेल सड़क किनारे खड़े एक वाहन से टकरा गई, लेकिन हेलीकॉप्टर में सवार सभी लोग बाल बाल बचने में सफल रहे।इन हादसों का तकनीकी कारण जो भी रहा हो, पर लेकिन जिस तरह से पहाड़ की संकरी घाटियों में हेलिकॉप्टर धड़ल्ले से उड़ान भर रहे हैं, उससे निरंतर दुर्घटना का खतरा बना रहता है।पहाड़ी क्षेत्र में पल-पल बदलते मौसम, ऊंची पहाड़ियां, सघन वन क्षेत्र और संकरी घाटियों के बीच हेलिकॉप्टरों की सुरक्षित उड़ान के लिए नागरिक उîóयन विभाग ने कोई विशेष प्रयास नहीं किए हैं। यहां तक कि संवेदनशील केदारनाथ और बदरीनाथ धाम में भी हेलिकॉप्टर की सुरक्षित उड़ान के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए हैं। गौर तलब है कि पर्यावरण की दृष्टि से अति संवेदनशील केदारनाथ घाटी में हेलीकॉप्टर 11 हजार फीट ऊंचाई पर एक संकरी घाटी से उड़ान भरते हैं।पिछले 12 सालों में इस घाटी क्षेत्र में 10 दुर्घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें तकरीबन 30 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। बावजूद इसके इस बार यहां एयर ट्रैफिक इतना ज्यादा है कि औसतन हर ढाई मिनट में एक हेलीकॉप्टर गुप्तकाशी, फाटा और सिरसी से उड़ान भर रहा है। ज्ञात हो कि यात्रा को सर्व सुलभ और सरल बनाने के लिए वर्ष 2004 में अगस्तमुनि से हेली सेवा की शुरुआत की गई थी। वर्ष 2012 तक चार हेली कंपनियां सेवाएं देती थी। अब इनकी संख्या नौ हो चुकी है। इतने अधिक एयर ट्रैफिक के बावजूद उत्तराखंड सिविल एविएशन डेवलपमेंट अथॉरिटी ;यूकाड़ाद्ध ने इस क्षेत्र में कोई एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर नहीं लगाया है और ना ही हवा का दबाव और दिशा बताने वाला कोई सिस्टम विकसित किया है। कहने की जरूरत नहीं की ऐसी खामियों के चलते किसी दिन देवभूमि में भी अहमदाबाद जैसी कोई हृदयविदारक खबर सामने आ सकती है। राज्य में सामने आ रही हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं पर का ने रुख अब बेहद सख्त हो चला है। सीएम ने उत्तराखंड में सेवाएं दे रही सभी हेली सेवा प्रदाताओं और ऑपरेटरों को कड़ी चेतावनी दी है। सीएम ने कहा कि हेली सेवा लेने वाले यात्रियों की अधिक संख्या को लेकर अत्यधिक उत्साहित और हड़बड़ी ना करते हुए सुरक्षा मानकों पर विशेष ध्यान देना होगा। उत्तराखंड में सेवाएं दे रहे सभी हेलीकॉप्टर सेवा प्रदाताओं और ऑपरेटरों, यूसीएडीए, एएआईबी और डीजीसीए के साथ सीएमआवास में राज्य की हेली सेवा सेवाओं की समीक्षा करते हुए सीएम ने स्पष्ट किया कि, हेली सेवाओं के सुरक्षा मानकों से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। इस हादसे की राष्ट्रीय के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहन जांच हो रही है। इसी के साथ जो प्रश्न उठे हैं, उनके घेरे में एअर इंडिया प्रबंधन, टाटा समूह, डीजीसीए, एयरपोर्ट अथारिटी और भारत सरकार आदि के साथ बोइंग कंपनी भी है। इस हादसे के बाद बोइंग के अलावा एअर इंडिया में भागीदार सिंगापुर एयरलाइंस (एसआइए) के साथ कुछ अन्य एयरलाइंस के शेयर भी गिरे। अहमदाबाद में हवाई हादसे के बाद से भारत समेत दुनिया भर में विमानों के संचालन में छोटी-बड़ी खामी मिलने, उड़ान रद होने, रोके जाने के समाचार थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। इनमें ड्रीमलाइनर समेत अन्य विमान भी हैं।निर्माण के दौरान अपने विमानों के सेफ्टी सिस्टम की अनदेखी के कारण बोइंग गंभीर सवालों के घेरे में रही है। इस कंपनी के ‘व्हिसिलब्लोअर’ इंजीनियर सैम सालेहपोर ने ड्रीमलाइनर एवं अन्य विमानों के निर्माण में जानबूझकर लापरवाही बरतने का आरोप मढ़ा था। इसके चलते बोइंग की खूब बदनामी हुई थी। बोइंग ने इस इंजीनियर के आरोप खारिज करते हुए कहा था कि वह अपने सभी विमानों के निर्माण में जरूरी सावधानी बरतती है, पर शायद उसने ऐसा नहीं किया। 2021 में अमेरिकी फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन ने ड्रीमलाइनर की डिलीवरी रोक दी थी।बोइंग के बदनाम हुए मैक्स विमान इस्तेमाल कर रही इंडोनेशिया और इथोपिया एयरलाइंस के नए विमान 2018-19 में पांच महीने के अंतराल पर दुर्घटनाग्रस्त हुए थे। इनमें कुल 346 लोग मारे गए थे। इन हवाई हादसों की जांच में यह सामने आया था कि बोइंग ने धोखाधड़ी की। उसके मैक्स विमानों के साफ्टवेयर में खामी थी और इस खामी को दूर कर सकने वाले जिन उपायों से विमान के लैस होने का उसने वादा किया था, वे उनमें थे ही नहीं। इसके चलते बोइंग की साख को धक्का तो लगा ही, इन दोनों हादसे में मारे गए लोगों के स्वजनों से अदालत के बाहर समझौता करने के बाद भी बोइंग को भारी भरकम हर्जाना देना पड़ा। इससे उसे तगड़ी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी।बोइंग की पोल खोलने का काम उसके कई औऱ अधिकारी कर चुके हैं। ये भी ‘व्हिसिलब्लोअर’ कहलाए। इनके भी ऐसे आरोप थे कि बोइंग विमानों को आनन-फानन बनाने के लिए शार्टकट इस्तेमाल करती है और इससे विमानों की सुरक्षा खतरे में पड़ती है। बोइंग अपने कर्मियों के असंतोष औऱ उनकी हड़ताल का भी सामना कर चुकी है। इसके चलते उसके विमानों का उत्पादन प्रभावित हुआ और वह कहीं कम आर्डर की सप्लाई कर पा रही है। फिर भी एअर इंडिया समेत अन्य एयरलाइंस उसके विमान खरीदने के आर्डर देती रहती हैं। ऐसा करना उनकी मजबूरी भी हो सकती है। जो भी हो, बोइंग का इतिहास बहुत दागदार है।टाटा एयरलाइंस की स्थापना भारत में सिविल एविएशन के जनक जेआरडी टाटा ने की थी। बाद में सरकार ने इसका अधिग्रहण कर लिया और नाम कर दिया एअर इंडिया। एअर इंडिया को कुप्रबंधन और घाटे से उबारने के लिए मोदी सरकार ने उसे निजी कंपनी को बेचने का फैसला लिया। स्वाभाविक रूप से पहली पसंद टाटा समूह बना। 2022 में एअर इंडिया उसके हाथों में चली गई। नाम एअर इंडिया ही रहा। इससे दुनिया में कुछ लोग इसे भारत सरकार की एयरलाइंस समझते हों तो हैरानी नहीं। टाटा समूह के हाथ में जाने के बाद माना यह गया कि अब इसका संचालन सुगम एवं सुरक्षित तरीके से होगा, लेकिन अहमदाबाद का हादसा संकेत कर रहा है कि संभवतः ऐसा नहीं हो सका है। उस पर विमान संचालन में पर्याप्त सजगता न बरतने के आरोप में जुर्माना भी लग चुका है। उसे सुविधाओं में कमी- अनदेखी के आरोप से भी दो-चार होना पड़ा है। एक बार तो केंद्रीय मंत्री ही शिकायत कर चुके हैं।अहमदाबाद हादसे पर एअर इंडिया प्रबंधन के साथ टाटा समूह स्वाभाविक रूप से दुखी और गंभीर है, लेकिन एअर इंडिया में भागीदार सिंगापुर एयरलाइंस के बारे में कुछ कहना कठिन है। एसआइए में सिंगापुर सरकार की भी हिस्सेदारी है। वहां के पीएम ने तो अहमदाबाद हादसे पर दुख जताया, पर एसआइए के एक्स(ट्विटर) हैंडल पर संवेदना का एक शब्द नहीं दिखा। अहमदाबाद हादसे को लेकर जो सवाल उठे हैं, उनका उसे भी तो जवाब देना होगा। यदि यह समय एअर इंडिया के लिए परीक्षा की घड़ी है तो एसआइए के लिए भी।निःसंदेह समय के साथ विमान यात्रा सुरक्षित हुई है, लेकिन हर हवाई हादसे पर विमानों के सुरक्षित संचालन पर वैसे ही सवाल भी उठते हैं, जैसे इन दिनों उठ रहे हैं। अहमदाबाद हादसे के बाद उत्तराखंड में एक और जानलेवा हेलीकाप्टर हादसे के चलते ये सवाल और अधिक चिंता का कारण बन गए हैं। अब अपने देश में विमान और हेलीकाप्टर सेवाओं का उपयोग बड़ी संख्या में आम आदमी कहे जाने वाले लोग भी करते हैं, क्योंकि हवाई यात्रा जरूरत बन गई है। इसीलिए कहा जाता है कि हमारे देश के हवाई चप्पल पहनने वाले भी हवाई यात्रा कर रहे हैं।यह एक हद तक सच भी है। हवाई यात्रा सुरक्षित हो, यह एयरलाइंस और नियामक संस्थाओं के साथ भारत सरकार को भी सुनिश्चित करना होगा। आज के युग में आम और खास के लिए हवाई यात्रा जरूरी भी है और मजबूरी भी। किसी कारण लोगों की जान जोखिम में पड़े, यह अस्वीकार्य है। हम इसकी भी अनदेखी नहीं कर सकते कि अपने देश में रेल और सड़क यात्रा विकसित देशों के मुकाबले जोखिम भरी है। सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या तो घटने का नाम ही नहीं ले रही है।।. *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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